अफसाने हक़ीकत में इस तरह बदलते हैं…
मुग़ल-ए-आज़म-1
अफसाने हक़ीकत में इस तरह बदलते हैं…
राजकुमार केसवानी
फिल्म ‘मुग़ल-ए-आज़म’ में एक संवाद है ‘वो तीर ही क्या संगतराश, जो दिल के पार न हो. वो बुत ही क्या जिसके आगे मग़रूर सर खुद न झुक जाएं.’
संगतराश – ‘तो फिर मैं एक ऐसा बुत बनाऊंगा, जिसके क़दमों में सिपाही अपनी तलवार, शहंशाह अपना ताज और इंसान अपना दिल निकालकर रख दे.’
मैं आज ‘मुग़ल-ए-आज़म’ की बात करने वाला हूं. मेरे पास न तो कोई ताज है और न तलवार सो बख़ुशी अपना दिल निकालकर पेश करना चाहता हूं. के.आसिफ नाम के एक जुनूनी इंसान सचमुच एक ऐसे शाहकार के ख़ालिक हैं जिसे देखकर कहा जा सकता है – ‘अफसाने हक़ीक़त में इस तरह बदले जाते हैं.’
50 साल गुज़र चुके हैं और शायद क़यामत से पहले के कुछ हज़ार बरस बाकी हैं. मुझे यकीन है कि जब तलक इस दुनिया-ए-फानी का वजूद रहेगा, तब तलक के.आसिफ का यह अज़ीम-ओ-शान शाहकार, हिन्दुस्तानी सिनेमा के तख्ते-ताऊस पर काबिज़ रहेगा.
आपने देखा ‘मुग़ल-ए-आज़म’ का जादू ? मैं अपनी औक़ात भूलकर बादशाहों की ज़बान बोलने की कोशिश करने लगा. मगर इस फिल्म का नशा ही ऐसा है कि जो चढ़े तो यूं चढ़े कि न चढ़कर उतरे. मेरा तो नहीं उतरता. और न ही कभी उतरेगा. चाहता भी नहीं हूं कि ये उतरे.
सो बस आज की बात इसी आलम में शुरू करता हूं. नशे में आदमी बहुत बोलता है, सो बहुत बोलूंगा. आज भी बोलूंगा. कल भी बोलूंगा. परसों भी बोलूंगा. पता नहीं कब तक बोलूंगा. मगर एक मिनट… पहले शुरू तो करूं.
हां तो पहले अनारकली की बात करें कि के.आसिफ की ? या फिर पहले फिल्म की ही बात कर लें ? पता नहीं. चलिए, फिल्म से ही शुरू कर देते हैं. और क्या. फिल्म की बात करते-करते ही एक-एक कर सारे लोगों की बात भी हो ही जाएगी.
इस फिल्म के बनने की कहानी असल में शुरू होती है 1922 से. यही वो साल है जिस साल मशहूर ड्रामा नवीस इम्तियाज़ अली ‘ताज’ ने एक नाटक लिखा ‘अनारकली’. हालांकि उर्दू जगत में ‘ताज’ अपने एक मज़ाहिया नाटक ‘चाचा छक्कन’ के लिए बहुत मशहूर हैं लेकिन ‘अनारकली’ पर इतनी फिल्में बनी कि उनका नाम हमेशा के लिए उसी के साथ चस्पा हो गया.
1928 में सबसे पहले निदेशक प्रफुल राय और चारू राय ने इस नाटक पर आधारित मूक फिल्म बनाई ‘द लव्ज़ आफ अ मुग़ल प्रिंस’. इस फिल्म में अनारकली थीं सीता देवी, शहज़ादा सलीम थे सावन सिंह् और अकबर की भूमिका में थे ख़ुद ‘ताज’.
साइलेंट सिनेमा के इसी दौर में, इसी साल निदेशक रमाशंकर चौधरी ने सुलोचना (रूबी मेयर्स) को लेकर ‘अनारकली’ नाम से ही फिल्म बनाई. 7 बरस बाद 1935 में दुबारा इसे सवाक फिल्म में तब्दील करके बनाया. 1953 में निदेशक नन्दलाल जसवंतलाल की बेहद कामयाब फिल्म ‘अनारकली’ के नाम से आई. इसमें बीना राय अनारकली, प्रदीप कुमार शहज़ादा सलीम और मुबारक अकबर की भूमिका में थे. इस फिल्म में 1928 और 35 में अनारकली बनी सुलोचना रानी जोधा बाई की भूमिका में नज़र आईं.
अनारकली में संगीतकार सी.रामचन्द्र के संगीत ने ऐसी धूम मचाई कि एक औसत सी फिल्म भी बड़ी लगने लगी. बाक्स आफिस पर बरसते सिक्कों की खनखनाहट फिल्म के गीतों के लिए तालियों की तरह बजती रही. मगर इन सारी बातों से बेफिक्र अपनी धुन में डूबा एक शख्स इन सब से परे आसमान से टकराते हुए ख़्वाब देख रहा था. वो जानता था कि उसे अनारकली नहीं ‘मुग़ल-ए-आज़म’ बनानी है और ‘मुग़ल-ए-आज़म’ बस एक बार बनती है. अनारकली की तरह बार-बार नहीं.
अपने इस हसीन ख़्वाब में डूबे हुए इंसान का नाम था करीमउद्दीन आसिफ. उसके ख्वाब इम्तियाज़ अली ‘ताज’ के अफसाने से कहीं ज़्यादा बड़े और हक़ीक़त से कहीं ज़्यादा रंगीन थे. इसी बेनज़ीर ख्वाब का अंजाम है यह फिल्म, जो बनी तो लगभग 85 फीसदी ब्लैक एण्ड व्हाईट में फिर भी उसमे सारे रंग दिखाई देते थे.
के. आसिफ का जन्म हुआ उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में 14 जून 1922 को. घर में चारों तरफ ग़रीबी इस तरह पसरी हुई थी कि हर सांस के साथ उसका अहसास भी जिस्म में पहुंच जाता था. सो ऐसे में पढ़ना-लिखना तो क्या होता. सो नहीं हुआ. और नन्हे से करीम एक ज़माने तक दर्ज़ी का काम करते रहे. बड़े लोगों के कपड़े सीते-सीते, उसने बड़े-बड़े ख्वाब बुनना भी सीख लिया. और 1942 में बरसों से कान्धे पर सवार ग़रीबी का जुआ उतारकर, अपने हसीन ख्वाबों को लेकर वह बम्बई चल पड़ा.
बम्बई में मामू थे. निर्माता-निदेशक-अभिनेता एस.नज़ीर. रंजीत फिल्म स्टूडियो के ठीक सामने एक अहाते में फ्लैट लेकर रहते थे. भांजा पहुंचा तो एक बिस्तर और लग गया. मामा के साथ उनके असिस्टेंट बनकर फिल्म बनाने का हुनर भी सीखना शुरू कर दिया. और भी बहुत कुछ सीखा, लेकिन उसका ज़िक्र बाद में.
हां तो 1944 में आसिफ को फिल्म ‘फूल’ के निदेशन का मौका मिला. अपनी पहली ही फिल्म को मल्टी स्टारर बना दिया. पृथ्वीराज कपूर, मज़हर ख़ान, अशरफ ख़ान, दुर्गा खोटे,सुरैया, वीना और याकूब थे. फिल्म की कहानी थी कमाल अमरोही की. इसी फिल्म के निर्माण के दौरान ही आसिफ ने कमाल अमरोही से ‘अनारकली’ की कहानी सुनी.
आसिफ के ख्वाबों से इस कहानी का रंग इस क़दर यकसां था कि फौरन ही यह कहानी उसके ख्वाबों का हिस्सा बन गई. मगर इस कहानी का नाम आसिफ के ख़्वाबों से बहुत छोटा था – ‘अनारकली’. सो पहला काम हुआ इस कहानी को सपनो की ऊंचाई से मेल खाता नाम देने का –‘मुग़ल-ए-आज़म’.
इसके बाद शुरू हुई इस अफसाने को हक़ीक़त में बदलने की कहानी. फिल्म ‘फूल’ के निर्माता थे उस दौर के बेहद दौलतमन्द इंसान फेमस स्टूडियो और फेमस फिल्म्स के मालिक हकीम अली शीराज़ी. 1945 में जब ‘फूल’ रिलीज़ हुई तो आसिफ के काम की ख़ासी चर्चा हुई. इसी मौके का फायदा उठाकर आसिफ ने ‘मुग़ल-ए-आज़म’ का किस्सा हकीम साहब से छेड़ दिया.
आसिफ किसागोई के उस्ताद थे. उस्ताद लेखक सआदत हसन मंटो ने लिखा है ‘…कहानी सुनाने के दौरान वह मदारीपन करता है यानी हस्बे-ज़रूरत वाकियात के उतार-चढ़ाव के साथ ख़ुद भी उतरता-चढ़ता रहता है. अभी वह सोफे पर है, चन्द लम्हात के बाद उसकी पुश्त की दीवार पर. दूसरे लम्हे उसके सर के नीचे है और टांगे ऊपर और धम से नीचे फर्श पर. उसके फौरन बाद कुर्सी पर उकड़ूं बैठा है मगर फिर फौरन उठ खड़ा हुआ है. यूं मालूम होता है कि इलेक्शन में कोई आदमी वोट हासिल करने के लिए तक़रीर कर रहा है.’
अब उस्ताद भले ही आसिफ की इन अदाओं से मुतासिर न हुए हों लेकिन हकीम साहब ख़ूब हुए. उन्होने अपने साले के.अब्दुला के साथ मिलकर फिल्म बनाने का फैसला ले लिया. आसिफ, ज़ाहिर है उसके डायरेक्टर थे. बेहद शाहाना अन्दाज़ में फिल्म शुरू हुई. चन्द्रमोहन बने अकबर, नरगिस अनारकली और शहज़ादा सलीम थे सप्रू जो उस वक़्त खासे मशहूर हीरो थे. एक और अदाकारा की प्रमुख भूमिका थी जिनका नाम था वीणा. ‘फिल्म इंडिया’ के जनवरी 1946 के कवर पर छपे ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के विज्ञापन में नर्गिस और चन्द्रमोहन से पहले इन्हीं का नाम दिया गया है. वीणा की भूमिका मेरे अन्दाज़ से बाद में निगार सुल्ताना ने निभाई है.
फिल्म लगभग 8 रील ही बन पाई थी कि देश का बंटवारा हो गया. हकीम अली शीराज़ी ने पाकिस्तान जाना तय किया. इसकी ख़ास वजह उनका मुहम्मद अली जिन्ना से ख़ासा लगाव था. यहां अपने जमे-जमाए आलीशान कारोबार को छोड़कर जाना पड़ा. उनका फेमस स्टूडियो बिका रूंगटा सेठ के हाथ और लेनदारियां और देनदारियां पहुंचीं पारसी सेठ शापूरजी पालनजी मिस्त्री के पास.
जब तक बंटवारे के ग़र्दो-गुबार से आसमान साफ हुआ तब तक आसिफ का शहंशाह अकबर – चन्द्रमोहन (1949में) इस दुनिया को रुख्सत कह चला. सप्रू का बाज़ार मन्द पड़ चुका था. लेकिन आसिफ के सपने पर इन सारी चीज़ों की ज़रा भी आंच नहीं आई थी. वह फिल्म बनाने को बज़िद था.
इस सारे उथल-पुथल के वक़्फे में खुद ही एक फिल्म प्रोड्यूस कर डाली. 1951 में रिलीज़ हुई इस फिल्म ‘हलचल’ के निदेशक थे एस.के.ओझा और फिल्म की मुख्य भूमिकाओं में थे दिलीप कुमार, नर्गिस और सितारा.
इस फिल्म के फौरन बाद ही शापूरजी को साथ लेकर एक बार फिर से ‘मुग़ल-ए-आज़म’ पर काम शुरू कर दिया. इस बार बदले हुए हालात में नए सितारे थे अकबर की भूमिका में पृथ्वीराज कपूर,सलीम – दिलीप कुमार और मधुबाला आ गईं अनारकली बनकर.
बम्बई के उपनगर अन्धेरी में मोहन स्टूडियोज़ में 1951 में दो फ्लोर पर अगले नौ साल तक इस सर्वकालिक महान हिन्दुस्तानी फिल्म पर काम चलता रहा. बन-बनकर बिगड़ती बातों के बीच आख़िर 1960 में जाकर बात बन ही गई. 4 अगस्त 1960 की शाम बम्बई के नए-नए खुले थियेटर मराठा मन्दिर में प्रीमियर हुआ और उसके बाद से आज तक उस एक इंसान का सपना करोड़ों-करोड़ आंखों में लगातार पल रहा है – एक हक़ीक़त की तरह.
और…
1951 से 1960 के लम्बे वक़्फे में इतना कुछ घटा कि हर दिन के लिए एक पन्ना भी लिखा जाए तो तीन हज़ार सफे हो जाएंगे. अब तीन हज़ार सफे न सही, तीन हज़ार लफ्ज़ तो कहे ही जाने चाहियें. सो अगली बार घूमेंगे इन नौ सालों के बीच. देखेंगे किस तरह आसिफ ने दुनिया की तमाम मुश्किलों के बरअक्स अपने पुख्ता इरादों से मोहब्बत की इस बेमिसाल दास्तान को उम्मर खय्याम की शायरी में बदल डाला.
जाते-जाते एक छोटा सा किस्सा सुनाऊं ?……… सुन लो भाई.
याद है, फिल्म में नादिरा यानी अनारकली की एक छोटी बहन सुरैया का रोल था. इस रोल को एक बेहद ख़ूबसूरर लड़की शीला दलाई ने निभाया. शीला उस वक़्त इन्दौर में कालेज की छात्रा थी. वो शूटिंग के समय बुलावे पर बम्बई चली जाती थी. इस वजह से उसके लेक्चर मिस हो जाते थे.
इस मुश्किल से उबरने का तरीका उसने यह खोज निकाला कि वह अपनी ‘आपा’ मधुबाला से हर बार वापसी के वक़्त उनके ढेर सारे आटोग्राफ वाले फोटो ले आती और अपने टीचर्स और उन सहेलियों में बांट देती जो उसकी ग़ैर मौजूदगी में उसके नोटस बनाकर रखती थीं.
दिलीप कुमार ने एक बार उसे छेड़ते हुए पूछा था कि वो उनसे कभी फोटो नहीं मांगती. अब इसका जवाब शीला ने क्या दिया, मुझे नहीं मालूम. मुझे तो बस इतना मालूम है कि इस वक़्त मेरा पेट बहुत ज़ोर से दुख रहा है और अगले एक हफ्ते, या क्या पत्ता कई हफ्ते दुखता रहेगा. मतलब जब तक यह बात पूरी नहीं होगी तो ऐसा तो होना ही है न.
हैं जी ?
जय-जय.
(दैनिक भास्कर की रविवारीय पत्रिका ‘रसरंग’ में 22अगस्त 2010 को प्रकाशित)

















संगतराश – ‘तो फिर मैं एक ऐसा बुत बनाऊंगा, जिसके क़दमों में सिपाही अपनी तलवार, शहंशाह अपना ताज और इंसान अपना दिल निकालकर रख दे.’संगतराश ने वोह बुत बनाया भी.
अब आपकी कलाम ने महान कालजयी और अमर शाहकार मुजल ए आज़म पर लिखना शुरू किया है . सुंदरता और सहजता से लिखे गए प्रथम भाग पढ़ने से तो यही अंदाज़ा हुआ के मुगले आज़म की अजमत से नाइंसाफी नहीं होगी.
मुगले आज़म के ५०वें जन्मवर्ष पर आपके द्वारा दिए जा रहा तोहफे का दिली स्वागत है
bahut khub sir…aapke pass filmy kisso or knowladge ki puri librery hai…!!
very interesting story