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	<title>The Bhopal Post &#187; Flashback</title>
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		<title>&#8230;ख़ुदा ख़ैर करे</title>
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		<pubDate>Sun, 29 Aug 2010 02:24:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[&#8230;ख़ुदा ख़ैर करे राजकुमार केसवानी &#160; &#160; एक मान्यता के अनुसार इस सृष्टि में एक ऐसी आत्मा मौजूद है जो हर नए पैदा हुए बच्चे के कान में बारी-बारी से एक हंसाने वाली और एक रुलाने वाली बात कहती है. इसी वजह से हर नया पैदा हुआ बच्चा कभी हंसता और कभी रोता है. मुझे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="...ख़ुदा ख़ैर करे" link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/08/kabban-mirza/"><p><strong>&#8230;ख़ुदा ख़ैर करे</strong><strong> </strong></p>
<p><em>राजकुमार केसवानी <a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/08/razia-sultan.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-573" title="razia sultan" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/08/razia-sultan-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a></em></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>एक मान्यता के अनुसार इस सृष्टि में एक ऐसी आत्मा मौजूद है जो हर नए पैदा हुए बच्चे के कान में बारी-बारी से एक हंसाने वाली और एक रुलाने वाली बात कहती है. इसी वजह से हर नया पैदा हुआ बच्चा कभी हंसता और कभी रोता है. मुझे लगता है इस मान्यता में एक कमी है. वह कमी यह है कि कि वह आत्मा सिर्फ बच्चपन के उस झूले से बाहर भी ज़िन्दगी में हर जगह इसी तरह हंसाती-रुलाती है. आपकी ज़िन्दगी में भी इस बात को मानने के हज़ार कारण मौजूद होंगे और मेरे पास भी हैं ही. कुच्छ अपने, कुच्छ पराए.</p>
<p>ऐसी ही दो कहानियां आज मैं आपको सुनाना चाहता हूं. दोनो कहानियों का पहला हिसा कहते खुशी होती है और दूसरा कहता आंसू बहते हैं. खैर ! शुरू करता हूं. एक थे कब्बन मिर्ज़ा. नहीं, जल्दी न करें. ज़रा सब्र से काम लें. हां, तो कब्बन मिर्ज़ा के नाम से विविध  भारती सुनने वाले लोग तो एक ज़माने से इस नाम से बखूबी वाकिफ होंगे ही मगर बाकी सब भी कमाल अमरोही की फिल्म ‘रज़िया सुल्तान’ के दो अमर गीत ‘ आई ज़ंजीर की झंकार,खुदा खैर करे’ और ‘तेरा हिज्र मेरा नसीब है’ नहीं भूले होंगे. खैयाम साहब के मदहोश कर देने वाले संगीत के साथ दिल की अंतिम गहराई से गूंजकर निकलती हुई एक अनोखी, रुवाबदार और कड़क आवाज़ है जो सीधे आपके दिल की उसी गहराई में जा पहुंचती है, जिस गहराई से वह निकली थी. यह कब्बन मिर्ज़ा साहब की आवाज़ है.</p>
<p>कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ मेरे बचपन या कहूं लड़कपन ( याद ही नहीं आता कब बचपन से लड़कपन की देहरी लांघी और कब इस इस उम्र तक आ पहुंचा. हर गुज़रा हुआ दिन लगता है बचपन का दिन था. हर दिन कुच्छ नादानी अब भी होती है. अगले दिन खुद को बच्चा समझकर माफ कर देता हूं. खैर. ये कहानी फिर सही) की यादों के साथ इस कदर जुड़ी है कि उसके बिना कुच्छ पूरा होता ही नहीं. क्योंकि अब तक की तमाम उम्र रेडियो के साथ ही गुज़री है. आज के दौर में अगर कमल शर्मा,अहमद वसी,ममता शर्मा और यूनुस खान की आवाज़ें हैं तो उस ज़माने में कब्बन मिर्ज़ा के साथ बृजमोहन,दीनानाथ,विनोद शर्मा,देवकीनदन पांडे जैसी खूबसूरत आवाज़ें थीं. संगीत सरिता,हवा महल और छाया गीत जैसे कार्यक्रम दीवाना बनाए रहते थे. उस वक़्त इन आवाज़ों को किसी और तरह या और जगह सोच नहीं पाया था. लेकिन इनमें से कम से कम दो आवाज़ें बाहर भी सुनाई दीं. विनोद शर्मा फिल्म और विज्ञापन में और कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ फिल्मी गीत में. और वो भी ऐसा गीत कि सुनने वाला अगर सोता हो तो चौंककर उठ जाए, जागता हो तो उसे लगने लगे कि उसकी आत्मा ने ही गाना शुरू कर दिया है.</p>
<p>कमाल अमरोही की फिल्में देखने वाले जानते ही हैं कि वे किस कदर दीवानगी में डूबकर फिल्में बनाते थे. कहीं भी एक राई-रती की कमी उन्हें मंज़ूर न होती. सो खैयाम साहब को इल्तमश और रज़िया सुल्तान के ज़माने का पूरा इतिहास पढ़ा डाला. उस दौर में बजने वाले सारे साज़ों की फहरिस्त थमा दी. खैयाम साहब खुद भी कुच्छ कम नहीं थे. सो कदम-कदम पर मेहनत थी. जब सवाल आया कि फिल्म में रज़िया सुल्तान (हेमा मालिनी) के ग़ुलाम और फिर आशिक़ याकूब (धर्मेद्र)  वाला गीत कौन गाए तो गुत्थी ज़रा उलझ गई. कमाल साहब को उस वक़्त मौजूद कोई मरदाना आवाज़ इस काबिल न लगती थी. कि यह गीत गा सके,लिहाज़ा आवाज़ की तलाश 50 से भी ज़्यादा गायको का आडीशन हुआ. नतीजा फिर भी न निकला.</p>
<div id="attachment_574" class="wp-caption aligncenter" style="width: 235px"><em><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/08/Kabban-Mirza.jpg"><img class="size-medium wp-image-574" title="Kabban Mirza" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/08/Kabban-Mirza-225x300.jpg" alt="" width="225" height="300" /></a></em><p class="wp-caption-text">कब्बन मिर्ज़ा</p></div>
<p>इसी नाउम्मीदी के दौर में किसी ने कब्बन मिर्ज़ा का नाम सुझाया. इन साहब ने उन्हें मोहर्रम के दौरान मर्सिये और नोहे (हज़रत इमाम हुस्सैन की शहादत के शोक में में गाए जाने वाले गीत. इसे गाने वाले को नोहेख्वां कहा जाता है). गाते हुए सुना था. तीर एक्दम निशाने पर लगा था. कब्बन मिर्ज़ा को संगीत की बहुत अच्छी समझ थी. वे गाते तो थे ही, बरसो हर सुबह दुनिया को संगीत सरिता के ज़रिए किसी गुणी के साथ संगीत की बारीकियॉ पर चर्चा भी करते ही थे. और सबसे बड़ी बात तो ये कि उनके पास वो आवाज़ ठीक जो किसी गाने वाले के पास न ठीक और न शायद है.</p>
<p>सो पहले एक और फिर दूसरा गाना रिकार्ड हुआ. पहला गीत लिखा जांनिसार अख्तर ने और दूसरा निदा फाज़ली ने. दोनो गीत जब बाज़ार में आए तो धूम मचा दी. कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ का जादू चारों तरफ फैल गया. शायद नौकरी के फेर में उन्हें वक़्त न मिल पाया कि वे फिल्मों में बहुत गा पाते या फिर इस तरह की आवाज़ सिर्फ पार्श्व गीतों में ही काम आ सकती थी. सो जब नौकरी से फुर्सत हुई तो शायद उस आत्मा ने कान. में ऐसी बात कही कि उस पर सिवाय रोने के कुच्छ न कहा जा सके. कब्बन मिर्ज़ा को गले का कैंसर हो गया.</p>
<p>पहली बार जसलोक अस्पताल में इलाज हुआ. फायदा हुआ. घर लौटे. बीमारी भी लौट आई. इस बार आवाज़ ही चली गई. और एक दिन वे खुद भी खामोशी के साथ चले गए.</p>
<p>मुझे अब तक उनकी मौत की सही तारीख नहीं मालूम. सो नहीं लिख रहा. हां, इतना ज़रूर मालूम है कि मीडिया में उनकी कभी खास बात नही हुई. शायद मौत की खबर भी न छपी. कम से कम मैने तो नहीं पढ़ी. एक बार 2003 में ‘इंडियन एक्स्प्रेस्’ ने ज़रूर एक रिपोर्ट  छापी थी. तब वे आवाज़ खो चुके थे और दीवार से टिके घर की छत को आसमान समझकर देखते रहते थे. जब रिपोर्टर उनके घर से लौट रहा था तब कब्बन मिर्ज़ा ने एक पर्ची पर लिखकर दिया था कि उन्होने फिल्म ‘शीबा’ मे अपने गाए गीत के बोल लिखकर बताया कि इस गीत की क्रेडिट में उनका नाम नहीं दिया गया था. मुझे यकीन है बिना उस गीत के भी ऊपर कब्बन मिर्ज़ा के खाते में बहुत सारा क्रेडिट होगा. इतना तो ज़रूर हे कि उनको जन्नत में जगह मिल सके.</p>
<p><strong>(पुनश्च: बहुत खोजबीन के बाद कब्बन मोर्ज़ा की आवाज़ में एक और गीत तलाश पाया हूं. 1964 में रिलीज़ हुई स्टंट फिल्म ‘कैप्टन आज़ाद’ में – आज उनके पा-ए-नाज़ पे सजदा करेंगे हम / उनके बग़ैर जी के भला क्या करेंगे हम.’ इस फिल्म में पीटर-नवाब का संगीत था.)</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><em>(दैनिक भास्कर की रविवारीय पत्रिका ‘रसरंग’ में कालम ‘आपस की बात’ के अंतर्गत 7 अक्टोबर 2007 को प्रकाशित) </em><em> </em></p>
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		<title>छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी</title>
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		<pubDate>Mon, 26 Jul 2010 02:21:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>rkeswani</dc:creator>
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		<description><![CDATA[छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी राजकुमार केसवानी आज एक गुड़िया की बात करते हैं. एक नन्ही-मुन्नी, छोटी सी-प्यारी सी गुड़िया. गुड़िया गाती थी. खूब प्यारा-प्यारा गाती थी. जब दुनिया ने पहली बार उसका गाना सुना तो बिना गले वाले भी गाने लगे. नाच का ना तक न जानने वाले भी नाचने लगे. 1980 के [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी" link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/nazia-hassan/"><p><strong>छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी</strong></p>
<p>राजकुमार केसवानी<a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/nazia-hassan-2.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-440" title="nazia hassan -2" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/nazia-hassan-2-243x300.jpg" alt="" width="243" height="300" /></a></p>
<p>आज एक गुड़िया की बात करते हैं. एक नन्ही-मुन्नी, छोटी सी-प्यारी सी गुड़िया. गुड़िया गाती थी. खूब प्यारा-प्यारा गाती थी. जब दुनिया ने पहली बार उसका गाना सुना तो बिना गले वाले भी गाने लगे. नाच का ना तक न जानने वाले भी नाचने लगे. 1980 के इस साल में चारों तरफ उसका गीत भीनी-भीनी ख़ुशबू बनकर हर घर में महकने लगा. लोग जब एक दूसरे से दुआ-सलाम करते तो यह ख़ुशबू फिर से गीत बनकर गूंजने लगती ‘आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी मे आए, तो बात बन जाए’.</p>
<p>बिल्कुल सही. मैं नाज़िया हसन की ही बात कर रहा हूं. 1980 में फिरोज़ ख़ान की फिल्म ‘क़ुरबानी’ के सर्वाधिक सफल गीत की गायिका. उम्र 15 साल. शक्लो-सूरत उस गुड़िया से मिलती-जुलती जिसे बचपन में कभी एच.सी.जरीवाला के बड़े से शो रूम में कांच की दीवार के साथ बस हमेशा दूर से ही देखता रहा. आवाज़ ऐसी कि सुनकर लगे कि बस अब सारे सपने सच होने वाले हैं.</p>
<p>ऐसी माया और ऐसी काया लेकर अवतरित हुई नाज़िया का छोटा सा जीवन सचमुच इस संसार की सरंचना की कई परतों को खोलकर दिखा देता है. एक तरफ इतनी छोटी सी उम्र में इतनी बड़ी सफलता तो दूसरी तरफ उसी जीवन के अगले ही कदम पर जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी से सामना. नाकाम शादी , उस पर फेफड़े का कैंसर और भरी जवानी मे मौत. ऐसे जीवन के लिए ईश्वर को धन्यवाद दें या फिर सवाल करें कि आख़िर इस खेल से तुझे हासिल क्या होता है?</p>
<p><strong>‘&#8230;लेकिन मेरा दि</strong><strong>ल, मेरा दिल रो रहा है’</strong></p>
<p>मुझे माफ कीजिएगा लेकिन मेरा दिल नाज़िया को नाज़िया से ज़्यादा गुड़िया की तरह याद करता है, सो मुंह से बार-बार गुड़िया ही निकलता है. तो ख़ैर, किस्सा यूं कि नाज़िया का जन्म हुआ 3 अप्रेल 1965 को कराची, पाकिस्तान में. पिता बशीर हसन पाकिस्तान के एक बड़े कारोबारी तो मां मुनीज़ा हसन समाजी कामों के लिए खासी मशहूर औरत थीं.<br />
नाज़िया कच्ची उम्र से ही गीत-संगीत की दुनिया से जुड़ गई. अपने घर-आंगन में छोटॆ भाई ज़ोहेब के साथ गाती-गुनगुनाती नाज़िया इसी दौर में टेलीविज़न के पर्दे पर जा पहुंची. पाकिस्तान के मक़बूल संगीतकार सुहैल  राणा 1968 से पाकिस्तान टीवी (पीटीवी) पर बच्चों का एक संगीत शो ‘कलियों की माला’ के नाम से चलाते थे. 1972 में महज़ सात साल की उम्र से ही भाई-बहन की इस जोड़ी को सुहैल राणा जैसे बड़े संगीतकार की सरपरस्ती मिल गई.</p>
<p>संगीत को लेकर घर में कोई रोक-टोक की बात तो न थी लेकिन पढ़ाई-लिखाई को लेकर मां-बाप और बच्चे ख़ुद भी बहुत ज़्यादा सजग थे. सो संगीत के साथ ही पढाई भी डटकर चलती रही. वह भी लन्दन में. जब दुनिया नाज़िया हसन के डिस्को गीत गा-गा कर दीवानी हो रही थी, यह गुड़िया, ख़ामोश एक कोने मे बैठी अपनी पढ़ाई कर रही थी. इसी लगन के नतीजे मे उसने मास्टर्स डिग्री के साथ ही साथ कानून की पढ़ाई की और  ला की डिग्री भी हासिल की.</p>
<p>यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि 1980 में जब फिल्म ‘क़ुरबानी’ रिलीज़ हुई और नाज़िया का गीत ‘आप जैसा कोई’ बाज़ार मे आया उस समय गुड़िया की उम्र कुल मिलाकर 15 साल की थी और वह लन्दन के एक स्कूल मे पढ़ रही थी.</p>
<p>हुआ कुछ यूं था कि फिरोज़ ख़ान उन दिनो फिल्म ‘क़ुरबानी’ बना रहे थे. लन्दन में एक पार्टी के दौरान नाज़िया से उनकी मुलाक़ात हुई. उसकी आवाज़ सुनकर वे बहुत प्रभावित हुए. हालांकि फिल्म में संगीत कल्याणजी-आनन्दजी का था फिर भी एक गीत के लिए फिरोज़ खान ने भारतीय मूल के संगीतकार बिड्डू को अनुबन्धित कर लिया था. लिहाज़ा उन्होने बिड्डू और नाज़िया की जोड़ी बना दी. और इस जोड़ी ने मिलकर जो कुछ किया वह इतिहास है.</p>
<p>बिड्डू अप्पैया मूलत: कर्नाटक के रहने वाले हैं. संगीत में अपनी मह्तवाकान्क्षाओं को साथ लेकर लन्दन में जा बसे थे. कामयाबी भी ख़ूब हासिल हुई. 70 के दशक में उन्होने टीना चर्ल्स, जिम्मी जेम्स और कार्ल डग्लस जैसे प्रसिद्ध गायकों के लिए गीत रचकर अपनी धाक जमा ली थी. डिस्को संगीत के लिए वे खासे मशहूर थे.</p>
<p>फिल्म ‘क़ुरबानी’ में यूं तो लगभग सभी गीत हिट थे लेकिन इस ‘आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आए, तो बात बन जाए’ जैसी मक़बूलियत और शोहरत किसी दूसरे गीत को नहीं मिली. इस एक गीत से गीतकार इन्दीवर को भी एक नई इमेज मिली. फिरोज़ खान को आशा से ज़्यादा सफलता. भारत और पाकिस्तान के लोगों को एक साथ, एक सुर में गाते हुए, एक दूसरे को प्यार से देखने की वजह मिली. पाप गीतों को समाज में इज़्ज़त और डिस्को वालों को बेहतर बिज़नेस मिला. ढेर सारे नए गायकों को उम्मीद की नई किरण दिखाई दे गई. इसी के नतीजे में कोई एक दर्जन नए गायक अपनी-अपनी तरह के डिस्को गीत लेकर मंज़र पर उभर आए.</p>
<p>और नाज़िया ? नाज़िया तो शायद यह गिन भी नहीं पा रही थी कि आख़िर वो सातवें आस्मान पर पहुंच गई है या ग्यारहवें पर. लेकिन उसे इतना पत्ता था कि उसकी दुनिया ज़मीन पर ही है लिहाज़ा आस्मान को उसने कभी अपने वज़न का अहसास तक न होने दिया. पन्द्रह साल की स्कूली बच्ची ने अपनी किताबें थामे-थामे, गीत गाते-गाते अपने सफर को आगे बड़ाया.</p>
<p>‘आप जैसा कोई’ की रिकार्डिंग लन्दन में ही हुई थी. भारतीय फिल्म इतिहास का यह पहला गीत था जिसकी रिकार्डिंग 24 ट्रैक पर हुई थी. बिड्डू ने इस गीत के साथ हिन्दी सिने संगीत में एक नई बीट और एक नई रिदम का तोहफा दिया. नाज़िया को इस गीत के लिए उस साल का फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला.</p>
<p>इस अप्रत्याशित सफलता के फौरन बाद ही बिड्डू और नाज़िया की टीम ने एक और एल्बम पेश कर दिया. इस बार नाज़िया के साथ उसका भाई ज़ोहेब भी था. ज़ोहेब ने इस एल्बम के आधे गीतों की धुने बनाईं, कुछ गाए और कुछ लिखे भी थे. 1981 में जारी इस एल्बम का नाम था – डिस्को दीवाने. इस एल्बम ने हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में बिक्री के सारे रिकार्ड तोड़ डाले. ख़ासकर नाज़िया का गाया टाईटल गीत ‘डिस्को दीवाने हैं ‘ तो घर-घर, गली-गली और डिस्को-डिस्को गूंज रहा था.</p>
<p>इस एल्बम में कुल जमा दस गीत थे. ‘आओ ना डांस करें’, ‘डिस्को दीवाने हैं’, ‘तेरे कदमों को चूमूंगा, मुझे तू पास आने दे’ और ‘मुझे चाहे न चाहे’ (ज़ोहेब के साथ), ‘दिल मेरा कहता है ये तुम मेरे हो’ वग़ैरह. लेकिन इस एल्बम में मेरा सबसे पसन्दीदा गीत रहा है ‘लेकिन मेरा दिल, मेरा दिल रो रहा है.’ इसमे लफ्ज़ों की अदायगी और धुन का कमाल है. पहले तो ‘लेकिन’ का उचारण जो अपने अर्थ की तरह ऊपर ले जाकर नीचे गिरा देता है. दूसरा ‘लेकिन मेरा दिल’ के बाद गिटार का एक तोड़ आकर ‘दिल रो रहा है’ को अलग भाव दे देता है.</p>
<p>इसी के पीछे-पीछे आई फिल्म ‘स्टार’ जिसके संगीतकार थे बिड्डू और गायक यही – भाई-बहन की जोड़ी. कुमार गौरव-रति अग्निहोत्री और पद्मिनी कोल्हापुरे को लेकर बनी यह फिल्म तो नहीं चली लेकिन इसके गीत खूब चले. ख़ासकर नाज़िया का गाया ‘बूम-बूम’. बहुत कमाल की धुन और कमाल की गायकी.</p>
<p>फिल्म की नाकामी से खुद को अलग करके इन सारे गीतों को ‘बूम-बूम’ नाम से एक एल्बम के रूप में बाज़ार मे उतारा गया. और यह भी खूब बिका. ख़ासकर इसका वीडियो. केन घोष के निदेशन मे बने इस वीडियो ने हिन्दी वीडियो बनाने वालों के लिए एक मानक और मार्गदर्शक का पद पा लिया. इसमें बिड्डू खुद भी मौजूद हैं.</p>
<p>इसके बाद आए 1984 में ‘यंग तरंग’. 1987 में ‘हाटलाईन’ और 1992 में आखिरी एल्बम ‘केमरा केमरा’. हालांकि इन एल्बम्स में गीत रचना वाले पक्ष में कुछ भी उलेखनीय नहीं है लेकिन अपनी बात कहने के लिए जिस तरह शब्दों को धुन की रस्सी से बांधा गया है वो काफी मज़ेदार है. मज़ेदार इसलिए कह रहा हूं कि यह कोशिश उन 20-22 साल के जवान बच्चों की है जो शायर नहीं हैं लेकिन अपनी बात कहना चाहते हैं. अब जैसे ‘हाटलाईन’ का यह गीत ‘देखा नहीं मैने कभी तुझको – टेलीफोन प्यार / तीन-तीन,दो-दो,चार-चार / मुझको हो  गया है तुमसे प्यार / तेरी आवाज़ ही, सुनू मैं बार-बार / मुझको हो गया है टेलीफोन प्यार’.</p>
<p>अच्छा एक मज़े की बात है. बात ये है कि नाज़िया और ज़ोहेब पाकिस्तान में भी कल्ट फिगर की तरह पूजे जाने लगे थे. हर तरफ उन्हीं की गूंज थी लेकिन उस समय मुल्क में जनरल ज़िया-उल-हक़ की हुकूमत थी जिसने लोगों के सामान्य जीवन पर भी अजब-अजब पाबंदियां लगा रखी थीं. ऐसी ही एक पाबन्दी थी औरतों के नाचने पर. पीटीवी पर किसी महिला गायिका को गाते समय नाचते या झूमते हुए दिखाने पर पाबन्दी थी.</p>
<p>उस समय नाज़िया का क्रेज़ ऐसा था कि उसे दबाया भी नहीं जा सकता था. ऐसे मे टीवी वालों ने नाज़िया को झूमते-नाचते हुए गाने सो तो नहीं रोका लेकिन कैमरा इस तरह पोज़ीशन किया कि उसके शरीर का सिर्फ ऊपरी हिस्सा ही दिखाई दे सके, नाचते हुए पांव नहीं.</p>
<p>लेकिन गुड़िया तो ठहरी गुड़िया. उसे अपने नाच-गाने से ज़्यादा ज़माने की खुशियां प्यारी थीं. सो गुड़िया ने एक संस्था बनाकर हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में ज़रूरतमन्द और शारीरिक रूप से अशक्त बच्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया था. आगे चलकर उसने ड्र्ग्स के नशे में डूबे युवाओं में जन-जागृति और नशा-मुक्ति के लिए भी एक संगठन बैन (बैन अगेन्स्ट नार्कोटिक्स) बनाकर काम शुरू कर दिया. उनका आख़िरी एल्बम ‘केमरा केमरा’ इसी उदेश्य से बनाया गया था.</p>
<p>यह सब उस वक़्त जब नाज़िया को फेफड़े का केंसर हो चुका था. इलाज के बाद डाक्टरों ने उसे स्वस्थ्य भी घोषित कर दिया लेकिन कुछ अर्से बाद यह ग़लीज़ बीमारी फिर आ धमकी.1995 में पाकिस्तान के एक प्रसिद्ध उद्योग घराने के चश्मे-चिराग इश्तियाक़ बेग से शादी भी कर ली. पति के अनुसार यह लव-मैरिज और मां के मुताबिक यह अरेंजड मेरिज थी.</p>
<p>इस विवाह के बाद नाज़िया का जीवन दुखों से भर गया. पति-पत्नि के बीच भारी मतभेद होने की वजह से बात तलाक़ तक जा पहुंची. लेकिन इस वक़्त तक उनके एक बेटा भी हो चुका था और साथ ही अन्दर कहीं छुपकर बैठी कैंसर ने भी अपनी गर्दन बाहर निकाल ली.</p>
<p>नाज़िया तलाक़ की अर्ज़ी लगाकर अस्पतालों में बीमारी से जूझती रही. कल तक ज़माने भर के लिए खुशियां बांटने वाली गुड़िया एक मुस्कराहट की मोहताज थी. और आख़िर 13 अगस्त 200 को महज़ 35 बरस की उम्र में मासूम सी गुड़िया ने आंखें बन्द कर लीं.</p>
<p>ज़माना अब तक गाता है ‘आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी मे आए, तो बात बन जाए’ लेकिन जैसा कि चचा ग़ालिब कह गए हैं ‘क्या बने बात जहां, बात बनाए न बने’.</p>
<p>गुड़िया, तुम जहां भी हो ख़ुश रहो. मेरे लिए तो यूं भी गुड़िया किसी दिन एक शो रूम में रखी दूर से देखने की चीज़ थी. यह गुड़िया दिखाए तो नहीं देती लेकिन सुनाई आज भी देती है.</p>
<p><strong>और&#8230; </strong></p>
<p>और अब बस. सिर्फ जय-जय.</p>
<p>(दैनिक भास्कर के रविवारीय परिशिष्ट &#8216;रसरंग&#8217; में २५ जुलाई २०१० को प्रकाशित)</p>
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		<title>उमराव जान:अजब दास्ताँ है मेरी ज़िंदगी की&#8230;</title>
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		<pubDate>Fri, 09 Jul 2010 13:23:10 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[अजब दास्ताँ है मेरी ज़िंदगी की&#8230; एक सदी – यानी सौ बरस. कितने सारे होते हैं ये सौ बरस ? इतने कि हम जिनसे मोहब्बत करते हैं तो उनकी लम्बी उम्र की दुआएं माँगते हुए कहते हैं – ‘आप सौ साल जिएं’. इस दौर में भी कभी-कभार ऐसी दुआएं सच हो ही जाती हैं. इसी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="उमराव जान:अजब दास्ताँ है मेरी ज़िंदगी की..." link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/ajab-dastan-hai/"><h3><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/Umrao-Jan.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-362" title="Umrao Jan" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/Umrao-Jan.jpg" alt="" width="180" height="320" /></a>अजब  दास्ताँ है मेरी ज़िंदगी की&#8230;</h3>
<p>एक  सदी – यानी सौ बरस. कितने सारे होते हैं ये सौ बरस ? इतने कि हम जिनसे  मोहब्बत करते हैं तो उनकी लम्बी उम्र की दुआएं  माँगते हुए कहते हैं – ‘आप  सौ साल जिएं’. इस दौर में भी कभी-कभार ऐसी दुआएं सच हो ही जाती हैं.</p>
<p>इसी  ख़्याल से सोचता हूं तो सोचता हूं आखिर किसने मांगी होगी उमराव जान के लिए  ऐसी दुआ. अब देखिए न उमराव की कहानी को सौ बरस के ऊपर हो चले हैं और यह न  अब तक सिर्फ ज़िन्दा है बल्कि दिन-ब-दिन उस पर जवानी आती जाती है. उम्र तो  बहुत सारे किस्सों और फसानों की उमराव से ज़्यादा है और वो अपनी पूरी  पुख्तगी के साथ हमारे साथ मौजूद हैं, मगर उमराव जान की बात थोड़ी अलग है.</p>
<p>मेरी  समझ से उमराव जान की इस जवानी का राज़ यह है कि उसकी पूरी कहानी अब तक किसी  खूबसूरत राज़ की तरह कुछ सामने है कुछ पसे-पर्दा है. वक़्त की हवाओं के  थपेड़े या फिर किसी दिले-आशिक़ की आह से इस राज़ से ज़रा पर्दा हटता है तो कभी  एक हक़ीक़त लगती है, कभी एक फसाना लगता है. और जो कुछ कसर बाकी थी उसे  मुज़फ्फर अली ने 1981 में रेखा को ‘उमराव जान’ बनाकर पूरा कर दिया.</p>
<p>कभी-कभी  कोई फनकार फसानों को भी हक़ीक़त की शक्ल दे देता है. रेखा ने यही काम ‘उमराव  जान’ के साथ किया है. अब इसके बाद तो कोई चाहकर भी यह नहीं चाहता कि कोई  इसे फसाना कहे.</p>
<p>मैं ख़ुद को भी उन्हीं में से एक गिनता हूं. और मुझे  ताज़ा दिलासा इस बात ने दिया है कि कुछ अर्सा पहले  उर्दू के नामवर प्रोफेसर  क़मर रईस साहब ने एक पत्रिका ‘ऐवाने-उर्दू’ में उमराव जान की एक असल फोटो  प्रकाशित की है. यह फोटो उन्हें हैदराबाद से किसी नवाब की लायब्रेरी से  मिली है. उस लायब्रेरी में रखी “उमराव जान ‘अदा&#8217; “ के पहले एडीशन के अन्दर  एक बहुत ही ज़र्द चेहरे वाला ख़स्ता हाल लिफाफा मिला जिसके अन्दर कैमरे से  खींची गई यह फोटो मौजूद थी.</p>
<p>यह बात पहले ही ज़माने पर ज़ाहिर है कि जब  १९०५ में मिर्ज़ा हादी रुस्वा की यह किताब पहली बार छपकर लोगों तक पहुंची  तो उसके फौरन बाद ही इस किताब के जवाब में एक दूसरी किताब आ गई थी ‘जुनूने  इंतज़ार याने फसाना-ए-मिर्ज़ा रुस्वा’. माना जाता है कि यह किताब उमराव जान  ने रुस्वा से नाराज़ होकर जवाब में लिखी थी. इसके बावजूद अब तक इस बात पर  बहस जारी है कि मिर्ज़ा रुस्वा ने अपनी निजी अनुभवों को ‘उमराव जान’ नाम का  एक किरदार घड़कर बड़ी कामयाबी से पेश किया है. इतनी कामयाबी से कि वह कदम-कदम  पर असल लगता है.</p>
<p>अब हक़ीक़त जो हो लेकिन यह सही है मिर्ज़ा हादी  रुस्वा की बदौलत हम सब को कुछ खूबसूरत ग़ज़लें, कुछ बेहतरीन संगीत और कुछ  फिल्में मिल गईं.</p>
<p>इतना सब कह चुकने के बाद यह ठीक नहीं है कि मिर्ज़ा  रुस्वा और उमराव के बारे में कोई और बात ही न करें. मिर्ज़ा मुहम्मद हादी  रुस्वा (1857 से 1931) उर्दू,अरबी,फारसी, अंग्रेज़ी,लैटिन और दूसरी कई  ज़बानों के जानकार थे. लखनऊ में पैदा हुए,पले,बड़े. शायरी का शौक़ लगा तो उस  दौर के मशहूर उस्ताद दबीर ने मदद की.</p>
<p>यूं तो उन्होने कई किताबें  लिखीं और अंग्रेज़ी किताबों के उर्दू मे अनुवाद किए लेकिन  ‘उमराव जान अदा’  उनकी अकेली पहचान है.</p>
<p><strong>कि बचपन किसी का, जवानी किसी की </strong></p>
<p>मुज़फ्फर अली की ‘उमराव जान’के संगीत और रेखा की बेमिसाल अदाकारी  ने इस कहानी को इसी एक फिल्म के साथ जोड़ कर रख दिया. हक़ीक़त यह है कि इसी  कहानी पर सबसे पहले निदेशक एस.एम.यूसुफ ने 1958 में एक फिल्म बनाई थी  ‘मेहंदी’. पाकिस्तान में भी 1972 में ‘उमराव जान अदा’ के नाम से फिल्म बनी  और 2003 में जियो टीवी ने इसे सीरियल के रूप में पेश किया. लेकिन पाकिस्तान  में भी 1981 वाली ‘उमराव जान’ ही ज़्यादा प्रसिद्ध है. 2006 में भी  जे.पी.दत्ता ने अभिषेक और ऎश्वर्या को लेकर फिल्म बनाई मगर वो शहीद हो गई.</p>
<p>जब  ज़रा ‘उमराव जान’ में ख़य्याम साहब की लासानी बन्दिशों, आशा भोंसले की मद्धम  पर आकर इठलाती गायकी और शहरयार की खूबसूरत शायरी की छांव से ज़रा बाहर  निकलकर पीछे देखता हूं तो मुझे 1958 की ‘मेहंदी’ नज़र आती है. फिल्म में  नवाब  सुल्तान वाली भूमिका अजीत ने और अमीरन उर्फ उमराव जान  की भूमिका में  थीं जयश्री. जयश्री मतलब  वी.शांताराम की पत्नी और अभिनेत्री राजश्री की  मां. पति से अलग होने के बाद यह उनकी पहली फिल्म थी.</p>
<p>यह फिल्म अभिनय  और मेकिंग के लिहाज़ से 1981 की फिल्म से काफी कमज़ोर पड़ती है लेकिन इसका  संगीत और शायरी अपनी तरह से बहुत लाजवाब है. यह शायद संगीतकार रवि की  बेहतरीन फिल्मों में से एक है. ख़ुमार बाराबंकवी की लाजवाब शायरी ने उमराव  जान की पीड़ा को बेहद खूबसूरत लफ्ज़ दिये हैं.</p>
<p>इस फिल्म में ज़्यादातर  गीत लता मंगेशकर के गाए हुए हैं. मुझे यकीन है आपको भी याद होंगे. ‘<strong>अजब दास्तां है  मेरी ज़िन्दगी की, कि बचपन किसी का, जवानी किसी की / मुक़द्दर ने मुझसे ये क्या दिल्लगी की / कि बचपन  किसी का, जवानी किसी की</strong>’. उमराव पर फिल्माई गई लगभग हर ग़ज़ल के  मतले मतलब आखिरी शेर में ख़ुमार साहब ने बहुत खूबसूरती से शायर की जगह  उमराव के तख़ल्लुस ‘अदा’ का इस्तेमाल भी किया है. आख़िर को उसे फिल्म में एक  शायरा के तौर पर भी दिखाया गया है. <strong>‘सिखाया गया है इशारों पे चलना / निगाहें  बदलना, दिलों को मसलना / ‘अदा’ हर अदा है मेरी बेक़सी की’. </strong></p>
<p>दूसरा गीत भी क्या गीत है  भई वाह.<strong> ‘अपने किये पे कोई पशेमान हो गया / लो और मौत का सामान हो गया’</strong>. और  फिर आखिर में अदा. ‘<strong>’ये बहकी-बहकी बातें, भरी बज़्म में अदा / ये आज क्या  तुझे अरे नादान हो गया’.</strong></p>
<p>दो और खूबसूरत नगीने. <strong>‘प्यार की दुनिया लुटेगी हमें मालूम न था / दिल की दिल ही में रहेगी, हमें मालूम न था’</strong>. दूसरा है ‘<strong>अदाओं मे शोखी, निगाहों में मस्ती / लड़कपन मुझे दे गया जाते-जाते’</strong>. इसी के आखिर में है कि ‘ <strong>अदा कोई अपना नहीं है जो समझे, मेरे दिल की धड़कन, मेरे दिल की बातें / किसी के न कानो में आवाज़  पहुंची, ज़ुबां थक गई है सुनाते-सुनाते’. </strong></p>
<p>इन सबके ऊपर मेरे दिल में  जिस चीज़ न अपने लिए एक ख़ास जगह बनाई है वह क़ामिल रशीद की लिखी हुई है.  अन्दाज़ साहिर लुधियानवी वाला है. ज़रा देखिए.</p>
<p><strong>ये अफसाना नहीं है सुनने वालों दिल की बाते हैं</strong></p>
<p><strong> सियाही ग़म की है वैसे बड़ी रंगीन रातें हैं</strong></p>
<p>यूं  तो बहुत लम्बी नज़्म है लेकिन कम से कम एक हिस्सा और सुन लीजिए.</p>
<p><strong>है गुस्ताख़ी मगर कहना है कुछ दुनिया से, </strong></p>
<p><strong>मर्दों से   शरीफों, मनचलों, मुल्लां से, आवारगर्दों से </strong></p>
<p><strong> है बेपर्दा मगर ताने दिए जाते हैं पर्दों से </strong></p>
<p><strong>ये अफसाना नहीं है&#8230; </strong></p>
<p>अगर आपने ‘उमराव जान’  (1981) देखी है तो आपके लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि फिल्म फिल्म  ‘मेहन्दी’ में उस्ताद जी का रोल ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के संगतराश – कुमार ने निभाया  था जिसे बाद में भारत भूषण ने निभाया. इस फिल्म में उन पर हेमंत कुमार का  गाया एक गीत भी फिल्माया गया है – ‘<strong>बेदर्द ज़माना तेरा दुश्मन है  तो क्या है / दुनिया में नहीं जिसका कोई उसका ख़ुदा है</strong>’.</p>
<p>इस सारी बात का लबो-लुब्बाब  यह है कि ‘उमराव जान’ के नाम के साथ अकेली एक फिल्म को याद किया जाता है  जबकि ‘मेहंदी’ भी इसी उपन्यास पर आधारित थी और इसमें खूबसूरत संगीत था.  फिल्म की छोड़िए पर हो सके तो आप इसका संगीत ज़रूर सुनिये और मुझे भी बताइये  कि आपको यह कैसा लगा.</p>
<p>एक बात और. उमराव जान ख़ुद एक अछी शायरा थीं.  पुस्तक में उसकी शायरी के कुछ खूबसूरत नमूने मौजूद हैं.</p>
<p>किसको  सुनाएं हाल दिले-ज़ार ऎ ‘अदा’  आवारगी में हमने ज़माने की सैर की</p>
<p>***</p>
<p>शब-ए-फुरकत  बसर नहीं होती   नहीं होती, सहर नहीं होती   शोर-ए-फरयाद अर्श तक पहुंचा   मगर उसको ख़बर नहीं होती</p>
<p>लीजिए  जिस बात की ‘उसको’ तब ख़बर नहीं हुई उस बात की ख़बर अब सारे ज़मने में है.  इसी लिए तो चचा ग़ालिब ने कहा है कि ‘आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक’.</p>
<p>और&#8230;</p>
<p>इस  नफे-नुकसान की गणित से चलती दुनिया में जब कोई लाभ-हानि से हटकर सोचता है  तो बहुत प्यारा लगता है. फिल्म ‘ब्लू अम्ब्रेला’ को देखे काफी दिन बीत चुके  हैं पर पंकज कपूर की बात अब तक साथ चल रही है.</p>
<p>फिल्म में पंकज कपूर  का दिल  एक नीले रंग के खूबसूरत छते पर आ जाता है जो कि एक बच्ची के पास  है. जब तमाम प्रलोभनों के बावजूद वह बच्ची नन्दू (पंकज कपूर) को छाता बेचने  से इंकार कर देती है तो वह चोरी पर उतारू हो जाता है.</p>
<p>जब उसे  समझाइश दी जाती है कि ऐसा नहीं करना चाहिए और आखिर एक मामूली से छाते के  लिए यह सब करने से क्या फायदा. तब ज़रा उसका सवालों से भरा जवाब देखिये.</p>
<p>‘ बारिश के पानी में नाव दौड़ाने से कोई फायदा होता है क्या ? सूरज को उस पहाड़ी के पीछे डूबते हुए देखने से कोई  फायदा है क्या ? आत्मा की ख़ुशी के लिए फायदा-नुकसान नहीं देखा जाता.’<br />
है न सौ टंच सची बात ? बस तो इस  घड़ी तो मैं चला अगले हफ्ते फिर करेंगे वही आत्मा की खुशी की बात – आपस की  बात .<br />
जय-जय.</p>
<p>(दैनिक भास्कर के रविवारीय &#8216;रसरंग&#8217; में प्रकाशित १५  नवम्बर २००९ )</p>
<p>rkeswani100@gmail.com</p>
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