<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>The Bhopal Post &#187; Music</title>
	<atom:link href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/category/music/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://www.thebhopalpost.com</link>
	<description>Global Warning!</description>
	<lastBuildDate>Thu, 06 Oct 2011 14:49:32 +0000</lastBuildDate>
	<language>en</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<generator>http://wordpress.org/?v=3.2.1</generator>
		<item>
		<title>&#8230;ख़ुदा ख़ैर करे</title>
		<link>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/08/kabban-mirza/</link>
		<comments>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/08/kabban-mirza/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 29 Aug 2010 02:24:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[Cinema]]></category>
		<category><![CDATA[Flashback]]></category>
		<category><![CDATA[Music]]></category>
		<category><![CDATA[आपस की बात]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी पोस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[Jan Nisar Akhtar]]></category>
		<category><![CDATA[Kabban Mirza]]></category>
		<category><![CDATA[Kamal Amrohi]]></category>
		<category><![CDATA[Khayyam]]></category>
		<category><![CDATA[Nida Fazli]]></category>
		<category><![CDATA[Razia Sultan]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.thebhopalpost.com/?p=572</guid>
		<description><![CDATA[&#8230;ख़ुदा ख़ैर करे राजकुमार केसवानी &#160; &#160; एक मान्यता के अनुसार इस सृष्टि में एक ऐसी आत्मा मौजूद है जो हर नए पैदा हुए बच्चे के कान में बारी-बारी से एक हंसाने वाली और एक रुलाने वाली बात कहती है. इसी वजह से हर नया पैदा हुआ बच्चा कभी हंसता और कभी रोता है. मुझे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="...ख़ुदा ख़ैर करे" link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/08/kabban-mirza/"><p><strong>&#8230;ख़ुदा ख़ैर करे</strong><strong> </strong></p>
<p><em>राजकुमार केसवानी <a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/08/razia-sultan.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-573" title="razia sultan" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/08/razia-sultan-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a></em></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>एक मान्यता के अनुसार इस सृष्टि में एक ऐसी आत्मा मौजूद है जो हर नए पैदा हुए बच्चे के कान में बारी-बारी से एक हंसाने वाली और एक रुलाने वाली बात कहती है. इसी वजह से हर नया पैदा हुआ बच्चा कभी हंसता और कभी रोता है. मुझे लगता है इस मान्यता में एक कमी है. वह कमी यह है कि कि वह आत्मा सिर्फ बच्चपन के उस झूले से बाहर भी ज़िन्दगी में हर जगह इसी तरह हंसाती-रुलाती है. आपकी ज़िन्दगी में भी इस बात को मानने के हज़ार कारण मौजूद होंगे और मेरे पास भी हैं ही. कुच्छ अपने, कुच्छ पराए.</p>
<p>ऐसी ही दो कहानियां आज मैं आपको सुनाना चाहता हूं. दोनो कहानियों का पहला हिसा कहते खुशी होती है और दूसरा कहता आंसू बहते हैं. खैर ! शुरू करता हूं. एक थे कब्बन मिर्ज़ा. नहीं, जल्दी न करें. ज़रा सब्र से काम लें. हां, तो कब्बन मिर्ज़ा के नाम से विविध  भारती सुनने वाले लोग तो एक ज़माने से इस नाम से बखूबी वाकिफ होंगे ही मगर बाकी सब भी कमाल अमरोही की फिल्म ‘रज़िया सुल्तान’ के दो अमर गीत ‘ आई ज़ंजीर की झंकार,खुदा खैर करे’ और ‘तेरा हिज्र मेरा नसीब है’ नहीं भूले होंगे. खैयाम साहब के मदहोश कर देने वाले संगीत के साथ दिल की अंतिम गहराई से गूंजकर निकलती हुई एक अनोखी, रुवाबदार और कड़क आवाज़ है जो सीधे आपके दिल की उसी गहराई में जा पहुंचती है, जिस गहराई से वह निकली थी. यह कब्बन मिर्ज़ा साहब की आवाज़ है.</p>
<p>कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ मेरे बचपन या कहूं लड़कपन ( याद ही नहीं आता कब बचपन से लड़कपन की देहरी लांघी और कब इस इस उम्र तक आ पहुंचा. हर गुज़रा हुआ दिन लगता है बचपन का दिन था. हर दिन कुच्छ नादानी अब भी होती है. अगले दिन खुद को बच्चा समझकर माफ कर देता हूं. खैर. ये कहानी फिर सही) की यादों के साथ इस कदर जुड़ी है कि उसके बिना कुच्छ पूरा होता ही नहीं. क्योंकि अब तक की तमाम उम्र रेडियो के साथ ही गुज़री है. आज के दौर में अगर कमल शर्मा,अहमद वसी,ममता शर्मा और यूनुस खान की आवाज़ें हैं तो उस ज़माने में कब्बन मिर्ज़ा के साथ बृजमोहन,दीनानाथ,विनोद शर्मा,देवकीनदन पांडे जैसी खूबसूरत आवाज़ें थीं. संगीत सरिता,हवा महल और छाया गीत जैसे कार्यक्रम दीवाना बनाए रहते थे. उस वक़्त इन आवाज़ों को किसी और तरह या और जगह सोच नहीं पाया था. लेकिन इनमें से कम से कम दो आवाज़ें बाहर भी सुनाई दीं. विनोद शर्मा फिल्म और विज्ञापन में और कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ फिल्मी गीत में. और वो भी ऐसा गीत कि सुनने वाला अगर सोता हो तो चौंककर उठ जाए, जागता हो तो उसे लगने लगे कि उसकी आत्मा ने ही गाना शुरू कर दिया है.</p>
<p>कमाल अमरोही की फिल्में देखने वाले जानते ही हैं कि वे किस कदर दीवानगी में डूबकर फिल्में बनाते थे. कहीं भी एक राई-रती की कमी उन्हें मंज़ूर न होती. सो खैयाम साहब को इल्तमश और रज़िया सुल्तान के ज़माने का पूरा इतिहास पढ़ा डाला. उस दौर में बजने वाले सारे साज़ों की फहरिस्त थमा दी. खैयाम साहब खुद भी कुच्छ कम नहीं थे. सो कदम-कदम पर मेहनत थी. जब सवाल आया कि फिल्म में रज़िया सुल्तान (हेमा मालिनी) के ग़ुलाम और फिर आशिक़ याकूब (धर्मेद्र)  वाला गीत कौन गाए तो गुत्थी ज़रा उलझ गई. कमाल साहब को उस वक़्त मौजूद कोई मरदाना आवाज़ इस काबिल न लगती थी. कि यह गीत गा सके,लिहाज़ा आवाज़ की तलाश 50 से भी ज़्यादा गायको का आडीशन हुआ. नतीजा फिर भी न निकला.</p>
<div id="attachment_574" class="wp-caption aligncenter" style="width: 235px"><em><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/08/Kabban-Mirza.jpg"><img class="size-medium wp-image-574" title="Kabban Mirza" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/08/Kabban-Mirza-225x300.jpg" alt="" width="225" height="300" /></a></em><p class="wp-caption-text">कब्बन मिर्ज़ा</p></div>
<p>इसी नाउम्मीदी के दौर में किसी ने कब्बन मिर्ज़ा का नाम सुझाया. इन साहब ने उन्हें मोहर्रम के दौरान मर्सिये और नोहे (हज़रत इमाम हुस्सैन की शहादत के शोक में में गाए जाने वाले गीत. इसे गाने वाले को नोहेख्वां कहा जाता है). गाते हुए सुना था. तीर एक्दम निशाने पर लगा था. कब्बन मिर्ज़ा को संगीत की बहुत अच्छी समझ थी. वे गाते तो थे ही, बरसो हर सुबह दुनिया को संगीत सरिता के ज़रिए किसी गुणी के साथ संगीत की बारीकियॉ पर चर्चा भी करते ही थे. और सबसे बड़ी बात तो ये कि उनके पास वो आवाज़ ठीक जो किसी गाने वाले के पास न ठीक और न शायद है.</p>
<p>सो पहले एक और फिर दूसरा गाना रिकार्ड हुआ. पहला गीत लिखा जांनिसार अख्तर ने और दूसरा निदा फाज़ली ने. दोनो गीत जब बाज़ार में आए तो धूम मचा दी. कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ का जादू चारों तरफ फैल गया. शायद नौकरी के फेर में उन्हें वक़्त न मिल पाया कि वे फिल्मों में बहुत गा पाते या फिर इस तरह की आवाज़ सिर्फ पार्श्व गीतों में ही काम आ सकती थी. सो जब नौकरी से फुर्सत हुई तो शायद उस आत्मा ने कान. में ऐसी बात कही कि उस पर सिवाय रोने के कुच्छ न कहा जा सके. कब्बन मिर्ज़ा को गले का कैंसर हो गया.</p>
<p>पहली बार जसलोक अस्पताल में इलाज हुआ. फायदा हुआ. घर लौटे. बीमारी भी लौट आई. इस बार आवाज़ ही चली गई. और एक दिन वे खुद भी खामोशी के साथ चले गए.</p>
<p>मुझे अब तक उनकी मौत की सही तारीख नहीं मालूम. सो नहीं लिख रहा. हां, इतना ज़रूर मालूम है कि मीडिया में उनकी कभी खास बात नही हुई. शायद मौत की खबर भी न छपी. कम से कम मैने तो नहीं पढ़ी. एक बार 2003 में ‘इंडियन एक्स्प्रेस्’ ने ज़रूर एक रिपोर्ट  छापी थी. तब वे आवाज़ खो चुके थे और दीवार से टिके घर की छत को आसमान समझकर देखते रहते थे. जब रिपोर्टर उनके घर से लौट रहा था तब कब्बन मिर्ज़ा ने एक पर्ची पर लिखकर दिया था कि उन्होने फिल्म ‘शीबा’ मे अपने गाए गीत के बोल लिखकर बताया कि इस गीत की क्रेडिट में उनका नाम नहीं दिया गया था. मुझे यकीन है बिना उस गीत के भी ऊपर कब्बन मिर्ज़ा के खाते में बहुत सारा क्रेडिट होगा. इतना तो ज़रूर हे कि उनको जन्नत में जगह मिल सके.</p>
<p><strong>(पुनश्च: बहुत खोजबीन के बाद कब्बन मोर्ज़ा की आवाज़ में एक और गीत तलाश पाया हूं. 1964 में रिलीज़ हुई स्टंट फिल्म ‘कैप्टन आज़ाद’ में – आज उनके पा-ए-नाज़ पे सजदा करेंगे हम / उनके बग़ैर जी के भला क्या करेंगे हम.’ इस फिल्म में पीटर-नवाब का संगीत था.)</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><em>(दैनिक भास्कर की रविवारीय पत्रिका ‘रसरंग’ में कालम ‘आपस की बात’ के अंतर्गत 7 अक्टोबर 2007 को प्रकाशित) </em><em> </em></p>
</div>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/08/kabban-mirza/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>9</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>Two unreleased songs of Mohd. Rafi composed by Madan Mohan</title>
		<link>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/unreleased-songs-rafi-madan-mohan/</link>
		<comments>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/unreleased-songs-rafi-madan-mohan/#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 29 Jul 2010 12:32:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[Cinema]]></category>
		<category><![CDATA[Music]]></category>
		<category><![CDATA[News]]></category>
		<category><![CDATA[Madan Mohan]]></category>
		<category><![CDATA[Mohd. Rafi]]></category>
		<category><![CDATA[Tere Bagair]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.thebhopalpost.com/?p=480</guid>
		<description><![CDATA[]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="Two unreleased songs of Mohd. Rafi composed by Madan Mohan " link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/unreleased-songs-rafi-madan-mohan/"><p><img src="file:///C:/DOCUME~1/ADMINI~1/LOCALS~1/Temp/moz-screenshot-2.png" alt="" /><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/mmrafi1.gif"></a><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/mmrafi1.gif"><img class="aligncenter size-medium wp-image-481" title="mmrafi1" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/mmrafi1-300x62.gif" alt="" width="300" height="62" /><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/Rafi-MM.jpg"><img class="aligncenter size-medium wp-image-489" title="Rafi-MM" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/Rafi-MM-300x234.jpg" alt="" width="300" height="234" /></a></a><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/mmrafi2.gif"><img class="aligncenter size-medium wp-image-482" title="mmrafi2" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/mmrafi2-300x162.gif" alt="" width="300" height="162" /></a><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/mmrafi3.gif"><img class="aligncenter size-medium wp-image-483" title="mmrafi3" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/mmrafi3-300x99.gif" alt="" width="300" height="99" /></a><br />
<a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/mmrafi4.gif"><img class="aligncenter size-medium wp-image-484" title="mmrafi4" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/mmrafi4-300x136.gif" alt="" width="300" height="136" /></a><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/mmrafi5.gif"><img class="aligncenter size-medium wp-image-485" title="mmrafi5" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/mmrafi5-300x125.gif" alt="" width="300" height="125" /></a></p>
<p><img src="file:///C:/DOCUME%7E1/ADMINI%7E1/LOCALS%7E1/Temp/moz-screenshot-1.png" alt="" /></p>
</div>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/unreleased-songs-rafi-madan-mohan/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>4</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी</title>
		<link>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/nazia-hassan/</link>
		<comments>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/nazia-hassan/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 26 Jul 2010 02:21:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>rkeswani</dc:creator>
				<category><![CDATA[Cinema]]></category>
		<category><![CDATA[Flashback]]></category>
		<category><![CDATA[Music]]></category>
		<category><![CDATA[आपस की बात]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी पोस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[Biddu]]></category>
		<category><![CDATA[Feroz Khan]]></category>
		<category><![CDATA[Nazia Hassan]]></category>
		<category><![CDATA[Qurbani]]></category>
		<category><![CDATA[Zoheb Hassan]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.thebhopalpost.com/?p=439</guid>
		<description><![CDATA[छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी राजकुमार केसवानी आज एक गुड़िया की बात करते हैं. एक नन्ही-मुन्नी, छोटी सी-प्यारी सी गुड़िया. गुड़िया गाती थी. खूब प्यारा-प्यारा गाती थी. जब दुनिया ने पहली बार उसका गाना सुना तो बिना गले वाले भी गाने लगे. नाच का ना तक न जानने वाले भी नाचने लगे. 1980 के [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी" link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/nazia-hassan/"><p><strong>छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी</strong></p>
<p>राजकुमार केसवानी<a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/nazia-hassan-2.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-440" title="nazia hassan -2" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/nazia-hassan-2-243x300.jpg" alt="" width="243" height="300" /></a></p>
<p>आज एक गुड़िया की बात करते हैं. एक नन्ही-मुन्नी, छोटी सी-प्यारी सी गुड़िया. गुड़िया गाती थी. खूब प्यारा-प्यारा गाती थी. जब दुनिया ने पहली बार उसका गाना सुना तो बिना गले वाले भी गाने लगे. नाच का ना तक न जानने वाले भी नाचने लगे. 1980 के इस साल में चारों तरफ उसका गीत भीनी-भीनी ख़ुशबू बनकर हर घर में महकने लगा. लोग जब एक दूसरे से दुआ-सलाम करते तो यह ख़ुशबू फिर से गीत बनकर गूंजने लगती ‘आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी मे आए, तो बात बन जाए’.</p>
<p>बिल्कुल सही. मैं नाज़िया हसन की ही बात कर रहा हूं. 1980 में फिरोज़ ख़ान की फिल्म ‘क़ुरबानी’ के सर्वाधिक सफल गीत की गायिका. उम्र 15 साल. शक्लो-सूरत उस गुड़िया से मिलती-जुलती जिसे बचपन में कभी एच.सी.जरीवाला के बड़े से शो रूम में कांच की दीवार के साथ बस हमेशा दूर से ही देखता रहा. आवाज़ ऐसी कि सुनकर लगे कि बस अब सारे सपने सच होने वाले हैं.</p>
<p>ऐसी माया और ऐसी काया लेकर अवतरित हुई नाज़िया का छोटा सा जीवन सचमुच इस संसार की सरंचना की कई परतों को खोलकर दिखा देता है. एक तरफ इतनी छोटी सी उम्र में इतनी बड़ी सफलता तो दूसरी तरफ उसी जीवन के अगले ही कदम पर जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी से सामना. नाकाम शादी , उस पर फेफड़े का कैंसर और भरी जवानी मे मौत. ऐसे जीवन के लिए ईश्वर को धन्यवाद दें या फिर सवाल करें कि आख़िर इस खेल से तुझे हासिल क्या होता है?</p>
<p><strong>‘&#8230;लेकिन मेरा दि</strong><strong>ल, मेरा दिल रो रहा है’</strong></p>
<p>मुझे माफ कीजिएगा लेकिन मेरा दिल नाज़िया को नाज़िया से ज़्यादा गुड़िया की तरह याद करता है, सो मुंह से बार-बार गुड़िया ही निकलता है. तो ख़ैर, किस्सा यूं कि नाज़िया का जन्म हुआ 3 अप्रेल 1965 को कराची, पाकिस्तान में. पिता बशीर हसन पाकिस्तान के एक बड़े कारोबारी तो मां मुनीज़ा हसन समाजी कामों के लिए खासी मशहूर औरत थीं.<br />
नाज़िया कच्ची उम्र से ही गीत-संगीत की दुनिया से जुड़ गई. अपने घर-आंगन में छोटॆ भाई ज़ोहेब के साथ गाती-गुनगुनाती नाज़िया इसी दौर में टेलीविज़न के पर्दे पर जा पहुंची. पाकिस्तान के मक़बूल संगीतकार सुहैल  राणा 1968 से पाकिस्तान टीवी (पीटीवी) पर बच्चों का एक संगीत शो ‘कलियों की माला’ के नाम से चलाते थे. 1972 में महज़ सात साल की उम्र से ही भाई-बहन की इस जोड़ी को सुहैल राणा जैसे बड़े संगीतकार की सरपरस्ती मिल गई.</p>
<p>संगीत को लेकर घर में कोई रोक-टोक की बात तो न थी लेकिन पढ़ाई-लिखाई को लेकर मां-बाप और बच्चे ख़ुद भी बहुत ज़्यादा सजग थे. सो संगीत के साथ ही पढाई भी डटकर चलती रही. वह भी लन्दन में. जब दुनिया नाज़िया हसन के डिस्को गीत गा-गा कर दीवानी हो रही थी, यह गुड़िया, ख़ामोश एक कोने मे बैठी अपनी पढ़ाई कर रही थी. इसी लगन के नतीजे मे उसने मास्टर्स डिग्री के साथ ही साथ कानून की पढ़ाई की और  ला की डिग्री भी हासिल की.</p>
<p>यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि 1980 में जब फिल्म ‘क़ुरबानी’ रिलीज़ हुई और नाज़िया का गीत ‘आप जैसा कोई’ बाज़ार मे आया उस समय गुड़िया की उम्र कुल मिलाकर 15 साल की थी और वह लन्दन के एक स्कूल मे पढ़ रही थी.</p>
<p>हुआ कुछ यूं था कि फिरोज़ ख़ान उन दिनो फिल्म ‘क़ुरबानी’ बना रहे थे. लन्दन में एक पार्टी के दौरान नाज़िया से उनकी मुलाक़ात हुई. उसकी आवाज़ सुनकर वे बहुत प्रभावित हुए. हालांकि फिल्म में संगीत कल्याणजी-आनन्दजी का था फिर भी एक गीत के लिए फिरोज़ खान ने भारतीय मूल के संगीतकार बिड्डू को अनुबन्धित कर लिया था. लिहाज़ा उन्होने बिड्डू और नाज़िया की जोड़ी बना दी. और इस जोड़ी ने मिलकर जो कुछ किया वह इतिहास है.</p>
<p>बिड्डू अप्पैया मूलत: कर्नाटक के रहने वाले हैं. संगीत में अपनी मह्तवाकान्क्षाओं को साथ लेकर लन्दन में जा बसे थे. कामयाबी भी ख़ूब हासिल हुई. 70 के दशक में उन्होने टीना चर्ल्स, जिम्मी जेम्स और कार्ल डग्लस जैसे प्रसिद्ध गायकों के लिए गीत रचकर अपनी धाक जमा ली थी. डिस्को संगीत के लिए वे खासे मशहूर थे.</p>
<p>फिल्म ‘क़ुरबानी’ में यूं तो लगभग सभी गीत हिट थे लेकिन इस ‘आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आए, तो बात बन जाए’ जैसी मक़बूलियत और शोहरत किसी दूसरे गीत को नहीं मिली. इस एक गीत से गीतकार इन्दीवर को भी एक नई इमेज मिली. फिरोज़ खान को आशा से ज़्यादा सफलता. भारत और पाकिस्तान के लोगों को एक साथ, एक सुर में गाते हुए, एक दूसरे को प्यार से देखने की वजह मिली. पाप गीतों को समाज में इज़्ज़त और डिस्को वालों को बेहतर बिज़नेस मिला. ढेर सारे नए गायकों को उम्मीद की नई किरण दिखाई दे गई. इसी के नतीजे में कोई एक दर्जन नए गायक अपनी-अपनी तरह के डिस्को गीत लेकर मंज़र पर उभर आए.</p>
<p>और नाज़िया ? नाज़िया तो शायद यह गिन भी नहीं पा रही थी कि आख़िर वो सातवें आस्मान पर पहुंच गई है या ग्यारहवें पर. लेकिन उसे इतना पत्ता था कि उसकी दुनिया ज़मीन पर ही है लिहाज़ा आस्मान को उसने कभी अपने वज़न का अहसास तक न होने दिया. पन्द्रह साल की स्कूली बच्ची ने अपनी किताबें थामे-थामे, गीत गाते-गाते अपने सफर को आगे बड़ाया.</p>
<p>‘आप जैसा कोई’ की रिकार्डिंग लन्दन में ही हुई थी. भारतीय फिल्म इतिहास का यह पहला गीत था जिसकी रिकार्डिंग 24 ट्रैक पर हुई थी. बिड्डू ने इस गीत के साथ हिन्दी सिने संगीत में एक नई बीट और एक नई रिदम का तोहफा दिया. नाज़िया को इस गीत के लिए उस साल का फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला.</p>
<p>इस अप्रत्याशित सफलता के फौरन बाद ही बिड्डू और नाज़िया की टीम ने एक और एल्बम पेश कर दिया. इस बार नाज़िया के साथ उसका भाई ज़ोहेब भी था. ज़ोहेब ने इस एल्बम के आधे गीतों की धुने बनाईं, कुछ गाए और कुछ लिखे भी थे. 1981 में जारी इस एल्बम का नाम था – डिस्को दीवाने. इस एल्बम ने हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में बिक्री के सारे रिकार्ड तोड़ डाले. ख़ासकर नाज़िया का गाया टाईटल गीत ‘डिस्को दीवाने हैं ‘ तो घर-घर, गली-गली और डिस्को-डिस्को गूंज रहा था.</p>
<p>इस एल्बम में कुल जमा दस गीत थे. ‘आओ ना डांस करें’, ‘डिस्को दीवाने हैं’, ‘तेरे कदमों को चूमूंगा, मुझे तू पास आने दे’ और ‘मुझे चाहे न चाहे’ (ज़ोहेब के साथ), ‘दिल मेरा कहता है ये तुम मेरे हो’ वग़ैरह. लेकिन इस एल्बम में मेरा सबसे पसन्दीदा गीत रहा है ‘लेकिन मेरा दिल, मेरा दिल रो रहा है.’ इसमे लफ्ज़ों की अदायगी और धुन का कमाल है. पहले तो ‘लेकिन’ का उचारण जो अपने अर्थ की तरह ऊपर ले जाकर नीचे गिरा देता है. दूसरा ‘लेकिन मेरा दिल’ के बाद गिटार का एक तोड़ आकर ‘दिल रो रहा है’ को अलग भाव दे देता है.</p>
<p>इसी के पीछे-पीछे आई फिल्म ‘स्टार’ जिसके संगीतकार थे बिड्डू और गायक यही – भाई-बहन की जोड़ी. कुमार गौरव-रति अग्निहोत्री और पद्मिनी कोल्हापुरे को लेकर बनी यह फिल्म तो नहीं चली लेकिन इसके गीत खूब चले. ख़ासकर नाज़िया का गाया ‘बूम-बूम’. बहुत कमाल की धुन और कमाल की गायकी.</p>
<p>फिल्म की नाकामी से खुद को अलग करके इन सारे गीतों को ‘बूम-बूम’ नाम से एक एल्बम के रूप में बाज़ार मे उतारा गया. और यह भी खूब बिका. ख़ासकर इसका वीडियो. केन घोष के निदेशन मे बने इस वीडियो ने हिन्दी वीडियो बनाने वालों के लिए एक मानक और मार्गदर्शक का पद पा लिया. इसमें बिड्डू खुद भी मौजूद हैं.</p>
<p>इसके बाद आए 1984 में ‘यंग तरंग’. 1987 में ‘हाटलाईन’ और 1992 में आखिरी एल्बम ‘केमरा केमरा’. हालांकि इन एल्बम्स में गीत रचना वाले पक्ष में कुछ भी उलेखनीय नहीं है लेकिन अपनी बात कहने के लिए जिस तरह शब्दों को धुन की रस्सी से बांधा गया है वो काफी मज़ेदार है. मज़ेदार इसलिए कह रहा हूं कि यह कोशिश उन 20-22 साल के जवान बच्चों की है जो शायर नहीं हैं लेकिन अपनी बात कहना चाहते हैं. अब जैसे ‘हाटलाईन’ का यह गीत ‘देखा नहीं मैने कभी तुझको – टेलीफोन प्यार / तीन-तीन,दो-दो,चार-चार / मुझको हो  गया है तुमसे प्यार / तेरी आवाज़ ही, सुनू मैं बार-बार / मुझको हो गया है टेलीफोन प्यार’.</p>
<p>अच्छा एक मज़े की बात है. बात ये है कि नाज़िया और ज़ोहेब पाकिस्तान में भी कल्ट फिगर की तरह पूजे जाने लगे थे. हर तरफ उन्हीं की गूंज थी लेकिन उस समय मुल्क में जनरल ज़िया-उल-हक़ की हुकूमत थी जिसने लोगों के सामान्य जीवन पर भी अजब-अजब पाबंदियां लगा रखी थीं. ऐसी ही एक पाबन्दी थी औरतों के नाचने पर. पीटीवी पर किसी महिला गायिका को गाते समय नाचते या झूमते हुए दिखाने पर पाबन्दी थी.</p>
<p>उस समय नाज़िया का क्रेज़ ऐसा था कि उसे दबाया भी नहीं जा सकता था. ऐसे मे टीवी वालों ने नाज़िया को झूमते-नाचते हुए गाने सो तो नहीं रोका लेकिन कैमरा इस तरह पोज़ीशन किया कि उसके शरीर का सिर्फ ऊपरी हिस्सा ही दिखाई दे सके, नाचते हुए पांव नहीं.</p>
<p>लेकिन गुड़िया तो ठहरी गुड़िया. उसे अपने नाच-गाने से ज़्यादा ज़माने की खुशियां प्यारी थीं. सो गुड़िया ने एक संस्था बनाकर हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में ज़रूरतमन्द और शारीरिक रूप से अशक्त बच्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया था. आगे चलकर उसने ड्र्ग्स के नशे में डूबे युवाओं में जन-जागृति और नशा-मुक्ति के लिए भी एक संगठन बैन (बैन अगेन्स्ट नार्कोटिक्स) बनाकर काम शुरू कर दिया. उनका आख़िरी एल्बम ‘केमरा केमरा’ इसी उदेश्य से बनाया गया था.</p>
<p>यह सब उस वक़्त जब नाज़िया को फेफड़े का केंसर हो चुका था. इलाज के बाद डाक्टरों ने उसे स्वस्थ्य भी घोषित कर दिया लेकिन कुछ अर्से बाद यह ग़लीज़ बीमारी फिर आ धमकी.1995 में पाकिस्तान के एक प्रसिद्ध उद्योग घराने के चश्मे-चिराग इश्तियाक़ बेग से शादी भी कर ली. पति के अनुसार यह लव-मैरिज और मां के मुताबिक यह अरेंजड मेरिज थी.</p>
<p>इस विवाह के बाद नाज़िया का जीवन दुखों से भर गया. पति-पत्नि के बीच भारी मतभेद होने की वजह से बात तलाक़ तक जा पहुंची. लेकिन इस वक़्त तक उनके एक बेटा भी हो चुका था और साथ ही अन्दर कहीं छुपकर बैठी कैंसर ने भी अपनी गर्दन बाहर निकाल ली.</p>
<p>नाज़िया तलाक़ की अर्ज़ी लगाकर अस्पतालों में बीमारी से जूझती रही. कल तक ज़माने भर के लिए खुशियां बांटने वाली गुड़िया एक मुस्कराहट की मोहताज थी. और आख़िर 13 अगस्त 200 को महज़ 35 बरस की उम्र में मासूम सी गुड़िया ने आंखें बन्द कर लीं.</p>
<p>ज़माना अब तक गाता है ‘आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी मे आए, तो बात बन जाए’ लेकिन जैसा कि चचा ग़ालिब कह गए हैं ‘क्या बने बात जहां, बात बनाए न बने’.</p>
<p>गुड़िया, तुम जहां भी हो ख़ुश रहो. मेरे लिए तो यूं भी गुड़िया किसी दिन एक शो रूम में रखी दूर से देखने की चीज़ थी. यह गुड़िया दिखाए तो नहीं देती लेकिन सुनाई आज भी देती है.</p>
<p><strong>और&#8230; </strong></p>
<p>और अब बस. सिर्फ जय-जय.</p>
<p>(दैनिक भास्कर के रविवारीय परिशिष्ट &#8216;रसरंग&#8217; में २५ जुलाई २०१० को प्रकाशित)</p>
</div>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/nazia-hassan/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>12</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>जाता हूँ मैं, मुझे अब न बुलाना</title>
		<link>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/manohari-singh/</link>
		<comments>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/manohari-singh/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 19 Jul 2010 10:17:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[Cinema]]></category>
		<category><![CDATA[Music]]></category>
		<category><![CDATA[आपस की बात]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी पोस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[Basu Manohari]]></category>
		<category><![CDATA[Key Flute]]></category>
		<category><![CDATA[Madan Mohan]]></category>
		<category><![CDATA[Mandolin]]></category>
		<category><![CDATA[Manohari Singh]]></category>
		<category><![CDATA[Naushad]]></category>
		<category><![CDATA[O.P.Nayyar]]></category>
		<category><![CDATA[R.D.Burman]]></category>
		<category><![CDATA[S.D.Burman]]></category>
		<category><![CDATA[Salil chaudhry]]></category>
		<category><![CDATA[Saxophone]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.thebhopalpost.com/?p=433</guid>
		<description><![CDATA[जाता हूँ मैं, मुझे अब न बुलाना राजकमार केसवानी क्या अजब दुनिया है. आज रोने का दिन है और मुझे बात भी करनी है। आप जानते हैं न मनोहारी दादा नहीं रहे !  मशहूर सेक्सोफोन वादक मनोहरी सिंह। संगीतकार जोड़ी बासू-मनोहरी वाले मनोहारी दादा। आर.डी.बर्मन के सदा सहायक मनोहारी दादा । कितने हज़ार गीत होंगे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="Manohari Singh Saxophone" link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/manohari-singh/"><p><strong>जाता हूँ मैं, मुझे अब न बुलाना </strong><br />
<em>राजकमार  केसवानी</em><br />
<a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/Manohari-Singh-2.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-434" title="Manohari Singh" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/Manohari-Singh-2-300x232.jpg" alt="" width="300" height="232" /></a></p>
<p>क्या <span>अजब</span> <span>दुनिया</span> <span>है</span>. <span>आज</span> <span>रोने</span> <span>का</span> <span>दिन</span> <span>है</span> <span>और</span> <span>मुझे</span> <span>बात</span> <span>भी</span> <span>करनी</span> <span>है।</span> <span>आप</span> <span>जानते</span> <span>हैं</span> <span>न</span> <span>मनोहारी</span> <span>दादा</span> <span>नहीं</span> <span>रहे</span> !  <span>मशहूर</span> <span>सेक्सोफोन</span> <span>वादक</span> <span>मनोहरी</span> <span>सिंह।</span> <span>संगीतकार</span> <span>जोड़ी</span> <span>बासू</span>-<span>मनोहरी</span> <span>वाले</span> मनोहारी <span>दादा।</span> <span>आर</span>.<span>डी</span>.<span>बर्मन</span> <span>के</span> <span>सदा</span> <span>सहायक</span> <span>मनोहारी</span> <span>दादा</span> ।</p>
<p>कितने हज़ार गीत होंगे जिन्हें  हम सब  सुनकर मस्त होते रहते हैं।  संगीतकार,गायक,गीतकार की वाह-वाह करते  रहते हैं लेकिन इन कई  हज़ार गीतों में जादू पैदा  करने वालों में एक जादूगर  का नाम  है &#8211; मनोहारी सिंह। अपनी फ्ल्यूट  (स्टील की बांसुरी), सक्सोफोन और  मेंडोलिन के जारी उन्होंने हिन्दी  सिने संगीत में कितने रंग  भरे हैं. ज़रा याद कीजिए-  &#8216; जा रे, जा रे उड़  जा रे  पंछी, बहारों के देस जा  रे&#8217; (माया), &#8216;तुम्हे याद होगा  कभी हम मिले थे&#8217; (सट्टा  बाज़ार), &#8216;अजी रूठकर अब कहाँ  जाइयेगा&#8217;,और &#8216; बेदर्दी बालमा तुझको  मेरा मन याद करता है&#8217;  (आरजू), &#8216;अछा जी मैं हारी  चलो मान जाओ ना&#8217; (काला  पानी) , &#8216;रुक जा ओ जाने  वाली रुक जा&#8217; (कन्हैया), &#8216;आजकल तेरे मेरे प्यार  के चर्चे  हर ज़ुबान  परा (ब्रहमचारी), &#8216;शोख नज़र की  बिजलियाँ, दिल पे मेरे गिराए  जा&#8217; (वो कौन थी), &#8216;है  दुनिया उसी की , ज़माना उसी  का&#8217; (काश्मीर की कली)&#8217;, &#8216;हुजूरे  वाला, जो हो इजाज़त &#8216; (ये  रात फिर न आएगी), &#8216;गाता  रहे मेरा दिल&#8242; और &#8216;तेरे  मेरे सपने अब एक रंग  हैं&#8217;(गाईड), &#8216;जाग दिले-दीवाना,  रुत जागी वसले यार की&#8217;  (ऊंचे लोग), &#8216;जाता हूँ मैं  मुझे अब न बुलाना&#8217; (दादी  मां), &#8216;रात अकेली है&#8217; (ज्वेल  थीफ), &#8216;रूप तेरा मस्ताना&#8217; (आराधना),  और आर.डी. बर्मन  के तो  लगभग सारे संगीत में कहीं  वादक तो कहीं अरेंजर तो  कहीं किसी और रूप में  मौजूद हैं ही।</p>
<p>और अगर कुछ भी याद  न हो  तो सबसे  ताज़ा यादा है अभी थोड़े  दिन पहले ही सोनी टीवी  के शो  &#8216;इन्डियन आईडल ५&#8217; पर आशा  भोंसले के साथ भी मनोहारी  दा अपने  सक्सोफोन के साथ गुज़ारे दौर  का जादू  जगाते हुए दिखाई दिए थे।</p>
<p>मन हर  लीनो<br />
मनोहरी सिंह नेपाली मूल  के संगीतकार  थे। १९४१ में उनके दादा  नेपाल से आकर कलकत्ता में  बस गए  थे। वे ट्रम्पेट प्लेयर के  तौर पर ब्रिटिश फ़ौज की  बैंड के सदस्य के रूप  में यहाँ लाए गए थे।  थोड़े अरसे बाद पित्ता भी  यहीं आ गए और कलकत्ता  में ही पुलिस बैंड में  बतौर बैगपाईप और क्लार्नेट वादक  नौकरी पा गए।</p>
<p>८ मार्च १९३१ को जन्मे  मनोहरी की उम्र उस समय  १०-११  बरस की थी। मगर घर  में संगीत के माहौल के  चलते वे भी संगीत में  अभी से गोते लगाने लगे  थे। पित्ता घर पर अपने  शौक से फ्ल्यूट बजाते थे  सो मनोहरी  ने भी  उसे ठान लिया। फिर मेंडोलिन।</p>
<p>इसी तरह उम्र के बढ़ाते  पड़ाव के साथ शौक भी  बड़ता गया। सौभाग्य से मुलाक़ात  हो गई  जोसेफ न्यूमेन से। जोसेफ हंगरी  मूल के संगीतकार थे, जो  कलकत्ते में रह रहे थे,  उनके पित्ता सक्सोफोन बजाते थे।  मनोहरी सिंह भी इसी साज़  से दिल  लगा बैठे। और दिल लगाया  भी ऐसा  कि अस्थमा  के मर्ज़  के बावजूद  इसे ज़िंदगी भर फूंक-फूंक  कर ज़माने  भर में  इसकी सुगंध फैलाते रहे।</p>
<p>कलकते में यह संगीत का  एक ऐसा  दौर था कि यहाँ के  होटलों और नाईट क्लब्स में  बड़े नामी कलाकार काम कर  रहे थे। मनोहरी भी कलकत्ता  सिम्फनी आर्केस्ट्रा के साथ जुड़े  रहने के अलावा एक नाईट  क्लब &#8216;फिर्पो&#8217; के साथ १९५८ तक  काम करते रहे। यह वही  समय था जब संगीतकार नौशाद  ने मनोहरी  और उनके  साथ बासू चक्रवर्ती को एक  कार्यक्रम में बजाते देखा और  संगीतकार सलिल चौधरी को सलाह  डी कि  इन दोनों  कलाकारों को बंबई ले आएं।</p>
<p>आखिर १९५८ में सलिल दा  उन्हें बंबई ले गए। सलिल  दा के  पास उस समय बहुत काम  न था  सो उन्होंने  संगीतकार एस.डी.बर्मन  से मिलवाया। बर्मन दा  ने उन्हें  पहला मौक़ा दिया फिल्म &#8216;सितारों  से आगे&#8217;  में।<br />
बर्मन दा से पहली मुलाक़ात  के समय  ही मनोहारी  दा की  उनके बेटे आर.डी.बर्मन  उर्फ़ पंचम से भी मुलाक़ात  हो गई।  जिस समय सलिल दा मनोहारी  को लेकर  बाम्बे लैब पहुंचे जहां &#8216;सितारों  से आगे&#8217;  की रिकार्डिंग  हो रही  थी, तो वहां पंचम, जयदेव,  और लक्ष्मीकांत  भी मौजूद  थे। लक्ष्मीकांत उस समय बतौर  साज़िन्दा मेंडोलिन बजाते थे और  जयदेव बर्मन दा के सहायक  थे।</p>
<p>मनोहारी की यहाँ से जो  दोस्ती और मोहब्बत का रिश्ता  बना वो तमाम उम्र बना  रहा। &#8216;छोटे नवाब&#8217; से लेकर  पंचम की आख़िरी चर्चित फिल्म  &#8216;१९४२ अ लव स्टोरी&#8217; तक।  आप में  से जिसने  भी इन्डियन  आइडल ५ वाला शो देखा  होगा कि किस तरह आर.डी.बर्मन  के ज़िक्र  भर से  दादा भावुक हो उठे थे।  आर.डी.बर्मन की  शख्सियत का यही कमाल है  कि उनके  साथ काम करने वाले भाग्यशाली  लोगों की तो छोड़ दें,  हम जैसे  सिर्फ उनके गीत-संगीत से  उन्हें जानने वाले भी आज  तक उनकी  दीवानगी से बाहर नहीं आ  पाए हैं। बल्कि सच तो  यह है   कि ज्यों-ज्यों वक़्त  गुज़रता है त्यों-त्यों यह  दीवानगी बड़ती  ही जाती है।</p>
<p>मनोहारी सिंह ने लगभग सारे  बड़े संगीतकारों के साथ काम  किया। जैसा कि शरू में  जो मैंने  गीत  गिनाए थे, यह बात  उसी से ज़ाहिर हो जाती  है। अब जैसे मदन मोहन  जी के  साथ &#8216;वो कौन थी&#8217; के  अलावा मेरी यादाश्त से फिल्म   &#8216;हकीकत&#8217;  के मस्ती भरे गीत  &#8216;मस्ती में छेड़ के तराना  कोइ दिल का, आज लुटाएगा  खज़ाना कोइ दिल का&#8217; में  सेक्साफोन और &#8216;हंसते ज़ख्म&#8217; में  &#8216;तुम जो मिल गए हो&#8217;  में की फ्ल्यूट बजाया है।</p>
<p>शंकर-जयकिशन ने &#8216;ब्रहमचारी&#8217; और &#8216;आरजू&#8217; के अलावा  फिल्म &#8216;प्रोफ़ेसर&#8217; में क्या कमाल  का पीस   &#8216;आवाज़ दे के हमें तुम  बुलाओ, मोहब्बत में इतना न  हमको सताओ&#8217;  में बजाया है  कि गीत  याद करो तो बोलों से  ज़्यादा सेक्साफोन की लहराती-बलखाती  धुन ज़हन में गूजती रह  जाती है।</p>
<p>इसी तरह मनोहारी दादा ने  एक बार  दुबई में बसे मेरे अदभुत  संगीत प्रेमी मित्र डाक्टर चंद्रशेखर  से कहा  था कि  उनके साज़ का सबसे अदभुत  इस्तेमाल प्यारेलाल (लक्ष्मीकांत  प्यारेलाल) ने फिल्म &#8216;अमीर गरीब&#8217;  के गीत  &#8216;मैं आया हूँ ले के  साज़ हाथों में&#8217; में किया  है। वाह! सचमुच अगर किसी  को इस  साज़ की गहराई और छिपी  हुई ध्वनियों को जानना हो  तो इसे  सुनना चाहिए।</p>
<p>इसका मतलब यह नहीं कि  फिल्म &#8216;गाईड&#8217; के &#8216;तेरे मेरे  सपने अब एक रंग हैं&#8217;   में बजाया गया टुकड़ा  कुछ कमतर है। आप ज़रा  गौर से सुनकर देखें कैसे  सेक्साफोन धीमे से &#8216;मेरे तेरे  दिल का, तय था इक  दिन मिलना / जैसे बहार आने  पर तय  है फूल  का खिलना&#8217;  जैसी पंक्तियों को शब्द की  परछाईं बनकररूह अत्ता करता  है। या फिर अंतरे में  बिना शब्द सारे माहौल को  बयान करना। पूरे के पूरे  गीत में ही सेक्साफोन आत्मा  की तरह  प्रवाहित होता है।</p>
<p>ओ.पी.नैयर साहब के  लिए तो उन्होंने &#8216;है दुनिया  उसी की&#8217; में दुःख को  ऐसा सांगीतिक एक्सप्रेशन  दिया है मानो दुःख भी  इस दुःख  से तड़प  उठा हो।</p>
<p>कितने-कितने बेमिसाल गीत हैं  और क्या-क्या उसमें  कलाकारी हुई है। अब जैसे  जयपुर में बसे मेरे संगीत  प्रेमी मित्र पवन झा ने  आज ही  मुझे एक किस्सा सुनाया। फिल्म  &#8216;माया&#8217; में सलिल दा ने  एक गीत  रचा है &#8216;जा रे, जा  रे उड़  जा रे  पंछी&#8217;। इस गीत की शुरूआत  की फ्ल्यूट  के स्वरों  से होती  है और    कुछ सेकण्ड बाद ही सेक्साफोन  आ जाता  है। उस दिन रिकार्डिंग के लिए एक साजिन्दे  के न  आने की वजह से सलिल  दा ने  यह दोनों  साज़ मनोहारी दा को बजाने  की जिमेदारी  सौंपी। फ्ल्यूट जितनी हल्की-फुल्की,  सेक्साफोन उतनी ही भारी लेकिन  कुछ देर के रियाज़ के  बाद ही इस काम मनोहारी  सिंह ने बखूबी कर दिखाया।</p>
<p>आर.डी.बर्मन तो एक  ऐसी चीज़ थे जो हर  काम को अपने अलग अंदाज़  से करने  के आदी  थे। मनोहारी सिंह से लोग  फ्ल्यूट और सेक्साफोन बजवाते थे  लेकिन आर.डी। ने उनसे  सीटी भी बजवाई। फिल्म &#8216;कटी  पतंग&#8217; के गीत &#8216;ये शाम  मस्तानी, मदहोश किए जाय&#8217; की  सीटी याद हैं न ?</p>
<p>इसी तरह फिल्म &#8216;प्यार का  मौसम&#8217; में बजवाया मेंडोलिन। ज़रा  याद कीजिए &#8216;तुम बिन जाऊं  कहाँ, कि दुनिया में आ  के , कुछ न फिर चाहा  सनम, तुमको चाह के&#8217;। मोहम्मद  रफ़ी वाला वर्शन सुन लें।  मज़ा आ जाएगा। एक ऐसा  साज़ जिसके उस्ताद हुए या  तो महान  संगीतकार सज्जाद और उसके बाद  लक्ष्मीकांत, उसे मनोहारी दा ने  क्या बजाया है।</p>
<p>एक और बात। मनोहारी दा  ने अपने  दोस्त और आर.डी.बर्मन  के दूसरे  सहयोगी बासू चक्रवर्ती के साथ  मिलकर कुछ फिल्मों में संगीत  भी दिया।  १९७६ में महमूद की &#8216;सबसे  बड़ा रुपैया&#8217; में &#8216;ना बीबी  न बच्चा,  न बाप  बड़ा ना मैया&#8217;, &#8216;दरिया किनारे  इक बंगलो&#8217;  और &#8216;बही जइयो ना रानी  बही जइयो ना&#8217; तो अब  तक याद  है न।  इसके अलावा &#8216;चटपटी&#8217; (८१) और  ८३ में  &#8216;कन्हैया&#8217; बासू-मनोहारी की इस  जोड़ी  ने दी।</p>
<p>क्या-क्या याद करूं ? अब  तो हर  दिन ही सिर्फ याद करना  है। जब-जब कोई गीत  बजेगा, कान बेसब्री से उस  साज़ का इंतज़ार करेंगे जिनसे  मनोहारी दा की आवाज़ सुनाई  देगी।</p>
<p>और&#8230;</p>
<p>१३ जुलाई  २०१० को जब मनोहारी दा  की म्रत्यु  हुई उस समय उनकी उम्र  ७९ साल  की थी।  मगर कमाल यह है कि  उन्होंने अपनी तमाम उम्र में  कभी बजाना नहीं छोड़ा। २००३  की फिल्म  &#8216;चलते-चलते&#8217; के लिए भी  बजाया तो २००४ की फिल्म  &#8216;वीर जारा&#8217; में भी बजाया।</p>
<p>म्रत्यु से कुछ दिन पहले  ही उन्होंने  संगीतकार शंकर-जयकिशन की स्मृति  में आयोजित एक कार्यक्रम में  बाकायदा परफार्मेंस दिया था। ऐसे  जीवट के महान संगीतकार को  सौ-सौ  सलाम।</p>
<p>और हाँ। अब आपको भी  सलाम। मतलब अगले हफ्ते तक  की जय-जय।</p>
<p>(दैनिक  भास्कर  के साप्ताहिक  परिशिष्ट  &#8216;रसरंग&#8217;  में  १८ जुलाई २०१० को प्रकाशित)</p>
</div>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/manohari-singh/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>20</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>उमराव जान:अजब दास्ताँ है मेरी ज़िंदगी की&#8230;</title>
		<link>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/ajab-dastan-hai/</link>
		<comments>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/ajab-dastan-hai/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 09 Jul 2010 13:23:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[Cinema]]></category>
		<category><![CDATA[Flashback]]></category>
		<category><![CDATA[General]]></category>
		<category><![CDATA[Music]]></category>
		<category><![CDATA[आपस की बात]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी पोस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[Khayyam]]></category>
		<category><![CDATA[Mirza Hadi Ruswa]]></category>
		<category><![CDATA[Muzaffar Ali]]></category>
		<category><![CDATA[Ravi]]></category>
		<category><![CDATA[Rekha]]></category>
		<category><![CDATA[Umrao Jan]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.thebhopalpost.com/?p=350</guid>
		<description><![CDATA[अजब दास्ताँ है मेरी ज़िंदगी की&#8230; एक सदी – यानी सौ बरस. कितने सारे होते हैं ये सौ बरस ? इतने कि हम जिनसे मोहब्बत करते हैं तो उनकी लम्बी उम्र की दुआएं माँगते हुए कहते हैं – ‘आप सौ साल जिएं’. इस दौर में भी कभी-कभार ऐसी दुआएं सच हो ही जाती हैं. इसी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="उमराव जान:अजब दास्ताँ है मेरी ज़िंदगी की..." link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/ajab-dastan-hai/"><h3><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/Umrao-Jan.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-362" title="Umrao Jan" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/Umrao-Jan.jpg" alt="" width="180" height="320" /></a>अजब  दास्ताँ है मेरी ज़िंदगी की&#8230;</h3>
<p>एक  सदी – यानी सौ बरस. कितने सारे होते हैं ये सौ बरस ? इतने कि हम जिनसे  मोहब्बत करते हैं तो उनकी लम्बी उम्र की दुआएं  माँगते हुए कहते हैं – ‘आप  सौ साल जिएं’. इस दौर में भी कभी-कभार ऐसी दुआएं सच हो ही जाती हैं.</p>
<p>इसी  ख़्याल से सोचता हूं तो सोचता हूं आखिर किसने मांगी होगी उमराव जान के लिए  ऐसी दुआ. अब देखिए न उमराव की कहानी को सौ बरस के ऊपर हो चले हैं और यह न  अब तक सिर्फ ज़िन्दा है बल्कि दिन-ब-दिन उस पर जवानी आती जाती है. उम्र तो  बहुत सारे किस्सों और फसानों की उमराव से ज़्यादा है और वो अपनी पूरी  पुख्तगी के साथ हमारे साथ मौजूद हैं, मगर उमराव जान की बात थोड़ी अलग है.</p>
<p>मेरी  समझ से उमराव जान की इस जवानी का राज़ यह है कि उसकी पूरी कहानी अब तक किसी  खूबसूरत राज़ की तरह कुछ सामने है कुछ पसे-पर्दा है. वक़्त की हवाओं के  थपेड़े या फिर किसी दिले-आशिक़ की आह से इस राज़ से ज़रा पर्दा हटता है तो कभी  एक हक़ीक़त लगती है, कभी एक फसाना लगता है. और जो कुछ कसर बाकी थी उसे  मुज़फ्फर अली ने 1981 में रेखा को ‘उमराव जान’ बनाकर पूरा कर दिया.</p>
<p>कभी-कभी  कोई फनकार फसानों को भी हक़ीक़त की शक्ल दे देता है. रेखा ने यही काम ‘उमराव  जान’ के साथ किया है. अब इसके बाद तो कोई चाहकर भी यह नहीं चाहता कि कोई  इसे फसाना कहे.</p>
<p>मैं ख़ुद को भी उन्हीं में से एक गिनता हूं. और मुझे  ताज़ा दिलासा इस बात ने दिया है कि कुछ अर्सा पहले  उर्दू के नामवर प्रोफेसर  क़मर रईस साहब ने एक पत्रिका ‘ऐवाने-उर्दू’ में उमराव जान की एक असल फोटो  प्रकाशित की है. यह फोटो उन्हें हैदराबाद से किसी नवाब की लायब्रेरी से  मिली है. उस लायब्रेरी में रखी “उमराव जान ‘अदा&#8217; “ के पहले एडीशन के अन्दर  एक बहुत ही ज़र्द चेहरे वाला ख़स्ता हाल लिफाफा मिला जिसके अन्दर कैमरे से  खींची गई यह फोटो मौजूद थी.</p>
<p>यह बात पहले ही ज़माने पर ज़ाहिर है कि जब  १९०५ में मिर्ज़ा हादी रुस्वा की यह किताब पहली बार छपकर लोगों तक पहुंची  तो उसके फौरन बाद ही इस किताब के जवाब में एक दूसरी किताब आ गई थी ‘जुनूने  इंतज़ार याने फसाना-ए-मिर्ज़ा रुस्वा’. माना जाता है कि यह किताब उमराव जान  ने रुस्वा से नाराज़ होकर जवाब में लिखी थी. इसके बावजूद अब तक इस बात पर  बहस जारी है कि मिर्ज़ा रुस्वा ने अपनी निजी अनुभवों को ‘उमराव जान’ नाम का  एक किरदार घड़कर बड़ी कामयाबी से पेश किया है. इतनी कामयाबी से कि वह कदम-कदम  पर असल लगता है.</p>
<p>अब हक़ीक़त जो हो लेकिन यह सही है मिर्ज़ा हादी  रुस्वा की बदौलत हम सब को कुछ खूबसूरत ग़ज़लें, कुछ बेहतरीन संगीत और कुछ  फिल्में मिल गईं.</p>
<p>इतना सब कह चुकने के बाद यह ठीक नहीं है कि मिर्ज़ा  रुस्वा और उमराव के बारे में कोई और बात ही न करें. मिर्ज़ा मुहम्मद हादी  रुस्वा (1857 से 1931) उर्दू,अरबी,फारसी, अंग्रेज़ी,लैटिन और दूसरी कई  ज़बानों के जानकार थे. लखनऊ में पैदा हुए,पले,बड़े. शायरी का शौक़ लगा तो उस  दौर के मशहूर उस्ताद दबीर ने मदद की.</p>
<p>यूं तो उन्होने कई किताबें  लिखीं और अंग्रेज़ी किताबों के उर्दू मे अनुवाद किए लेकिन  ‘उमराव जान अदा’  उनकी अकेली पहचान है.</p>
<p><strong>कि बचपन किसी का, जवानी किसी की </strong></p>
<p>मुज़फ्फर अली की ‘उमराव जान’के संगीत और रेखा की बेमिसाल अदाकारी  ने इस कहानी को इसी एक फिल्म के साथ जोड़ कर रख दिया. हक़ीक़त यह है कि इसी  कहानी पर सबसे पहले निदेशक एस.एम.यूसुफ ने 1958 में एक फिल्म बनाई थी  ‘मेहंदी’. पाकिस्तान में भी 1972 में ‘उमराव जान अदा’ के नाम से फिल्म बनी  और 2003 में जियो टीवी ने इसे सीरियल के रूप में पेश किया. लेकिन पाकिस्तान  में भी 1981 वाली ‘उमराव जान’ ही ज़्यादा प्रसिद्ध है. 2006 में भी  जे.पी.दत्ता ने अभिषेक और ऎश्वर्या को लेकर फिल्म बनाई मगर वो शहीद हो गई.</p>
<p>जब  ज़रा ‘उमराव जान’ में ख़य्याम साहब की लासानी बन्दिशों, आशा भोंसले की मद्धम  पर आकर इठलाती गायकी और शहरयार की खूबसूरत शायरी की छांव से ज़रा बाहर  निकलकर पीछे देखता हूं तो मुझे 1958 की ‘मेहंदी’ नज़र आती है. फिल्म में  नवाब  सुल्तान वाली भूमिका अजीत ने और अमीरन उर्फ उमराव जान  की भूमिका में  थीं जयश्री. जयश्री मतलब  वी.शांताराम की पत्नी और अभिनेत्री राजश्री की  मां. पति से अलग होने के बाद यह उनकी पहली फिल्म थी.</p>
<p>यह फिल्म अभिनय  और मेकिंग के लिहाज़ से 1981 की फिल्म से काफी कमज़ोर पड़ती है लेकिन इसका  संगीत और शायरी अपनी तरह से बहुत लाजवाब है. यह शायद संगीतकार रवि की  बेहतरीन फिल्मों में से एक है. ख़ुमार बाराबंकवी की लाजवाब शायरी ने उमराव  जान की पीड़ा को बेहद खूबसूरत लफ्ज़ दिये हैं.</p>
<p>इस फिल्म में ज़्यादातर  गीत लता मंगेशकर के गाए हुए हैं. मुझे यकीन है आपको भी याद होंगे. ‘<strong>अजब दास्तां है  मेरी ज़िन्दगी की, कि बचपन किसी का, जवानी किसी की / मुक़द्दर ने मुझसे ये क्या दिल्लगी की / कि बचपन  किसी का, जवानी किसी की</strong>’. उमराव पर फिल्माई गई लगभग हर ग़ज़ल के  मतले मतलब आखिरी शेर में ख़ुमार साहब ने बहुत खूबसूरती से शायर की जगह  उमराव के तख़ल्लुस ‘अदा’ का इस्तेमाल भी किया है. आख़िर को उसे फिल्म में एक  शायरा के तौर पर भी दिखाया गया है. <strong>‘सिखाया गया है इशारों पे चलना / निगाहें  बदलना, दिलों को मसलना / ‘अदा’ हर अदा है मेरी बेक़सी की’. </strong></p>
<p>दूसरा गीत भी क्या गीत है  भई वाह.<strong> ‘अपने किये पे कोई पशेमान हो गया / लो और मौत का सामान हो गया’</strong>. और  फिर आखिर में अदा. ‘<strong>’ये बहकी-बहकी बातें, भरी बज़्म में अदा / ये आज क्या  तुझे अरे नादान हो गया’.</strong></p>
<p>दो और खूबसूरत नगीने. <strong>‘प्यार की दुनिया लुटेगी हमें मालूम न था / दिल की दिल ही में रहेगी, हमें मालूम न था’</strong>. दूसरा है ‘<strong>अदाओं मे शोखी, निगाहों में मस्ती / लड़कपन मुझे दे गया जाते-जाते’</strong>. इसी के आखिर में है कि ‘ <strong>अदा कोई अपना नहीं है जो समझे, मेरे दिल की धड़कन, मेरे दिल की बातें / किसी के न कानो में आवाज़  पहुंची, ज़ुबां थक गई है सुनाते-सुनाते’. </strong></p>
<p>इन सबके ऊपर मेरे दिल में  जिस चीज़ न अपने लिए एक ख़ास जगह बनाई है वह क़ामिल रशीद की लिखी हुई है.  अन्दाज़ साहिर लुधियानवी वाला है. ज़रा देखिए.</p>
<p><strong>ये अफसाना नहीं है सुनने वालों दिल की बाते हैं</strong></p>
<p><strong> सियाही ग़म की है वैसे बड़ी रंगीन रातें हैं</strong></p>
<p>यूं  तो बहुत लम्बी नज़्म है लेकिन कम से कम एक हिस्सा और सुन लीजिए.</p>
<p><strong>है गुस्ताख़ी मगर कहना है कुछ दुनिया से, </strong></p>
<p><strong>मर्दों से   शरीफों, मनचलों, मुल्लां से, आवारगर्दों से </strong></p>
<p><strong> है बेपर्दा मगर ताने दिए जाते हैं पर्दों से </strong></p>
<p><strong>ये अफसाना नहीं है&#8230; </strong></p>
<p>अगर आपने ‘उमराव जान’  (1981) देखी है तो आपके लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि फिल्म फिल्म  ‘मेहन्दी’ में उस्ताद जी का रोल ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के संगतराश – कुमार ने निभाया  था जिसे बाद में भारत भूषण ने निभाया. इस फिल्म में उन पर हेमंत कुमार का  गाया एक गीत भी फिल्माया गया है – ‘<strong>बेदर्द ज़माना तेरा दुश्मन है  तो क्या है / दुनिया में नहीं जिसका कोई उसका ख़ुदा है</strong>’.</p>
<p>इस सारी बात का लबो-लुब्बाब  यह है कि ‘उमराव जान’ के नाम के साथ अकेली एक फिल्म को याद किया जाता है  जबकि ‘मेहंदी’ भी इसी उपन्यास पर आधारित थी और इसमें खूबसूरत संगीत था.  फिल्म की छोड़िए पर हो सके तो आप इसका संगीत ज़रूर सुनिये और मुझे भी बताइये  कि आपको यह कैसा लगा.</p>
<p>एक बात और. उमराव जान ख़ुद एक अछी शायरा थीं.  पुस्तक में उसकी शायरी के कुछ खूबसूरत नमूने मौजूद हैं.</p>
<p>किसको  सुनाएं हाल दिले-ज़ार ऎ ‘अदा’  आवारगी में हमने ज़माने की सैर की</p>
<p>***</p>
<p>शब-ए-फुरकत  बसर नहीं होती   नहीं होती, सहर नहीं होती   शोर-ए-फरयाद अर्श तक पहुंचा   मगर उसको ख़बर नहीं होती</p>
<p>लीजिए  जिस बात की ‘उसको’ तब ख़बर नहीं हुई उस बात की ख़बर अब सारे ज़मने में है.  इसी लिए तो चचा ग़ालिब ने कहा है कि ‘आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक’.</p>
<p>और&#8230;</p>
<p>इस  नफे-नुकसान की गणित से चलती दुनिया में जब कोई लाभ-हानि से हटकर सोचता है  तो बहुत प्यारा लगता है. फिल्म ‘ब्लू अम्ब्रेला’ को देखे काफी दिन बीत चुके  हैं पर पंकज कपूर की बात अब तक साथ चल रही है.</p>
<p>फिल्म में पंकज कपूर  का दिल  एक नीले रंग के खूबसूरत छते पर आ जाता है जो कि एक बच्ची के पास  है. जब तमाम प्रलोभनों के बावजूद वह बच्ची नन्दू (पंकज कपूर) को छाता बेचने  से इंकार कर देती है तो वह चोरी पर उतारू हो जाता है.</p>
<p>जब उसे  समझाइश दी जाती है कि ऐसा नहीं करना चाहिए और आखिर एक मामूली से छाते के  लिए यह सब करने से क्या फायदा. तब ज़रा उसका सवालों से भरा जवाब देखिये.</p>
<p>‘ बारिश के पानी में नाव दौड़ाने से कोई फायदा होता है क्या ? सूरज को उस पहाड़ी के पीछे डूबते हुए देखने से कोई  फायदा है क्या ? आत्मा की ख़ुशी के लिए फायदा-नुकसान नहीं देखा जाता.’<br />
है न सौ टंच सची बात ? बस तो इस  घड़ी तो मैं चला अगले हफ्ते फिर करेंगे वही आत्मा की खुशी की बात – आपस की  बात .<br />
जय-जय.</p>
<p>(दैनिक भास्कर के रविवारीय &#8216;रसरंग&#8217; में प्रकाशित १५  नवम्बर २००९ )</p>
<p>rkeswani100@gmail.com</p>
</div>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/ajab-dastan-hai/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>‘मैं ज़िंदा हूं यह मुश्तहर कीजिये&#8230;’ (साहिर-4)</title>
		<link>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir4/</link>
		<comments>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir4/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 03 Jul 2010 11:30:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[Cinema]]></category>
		<category><![CDATA[General]]></category>
		<category><![CDATA[Music]]></category>
		<category><![CDATA[आपस की बात]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी पोस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[Firaq Gorakhpuri]]></category>
		<category><![CDATA[Nida Fazli]]></category>
		<category><![CDATA[Sahir]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.thebhopalpost.com/?p=293</guid>
		<description><![CDATA[‘मैं ज़िंदा हूं यह मुश्तहर कीजिये&#8230;’ राजकुमार केसवानी आज फिर मौका है कि अपने एक राज़ को आपके साथ बांटकर बात शुरू करूं. वो राज़ यह है कि दिल इस ख़याल भर से उदास है कि आज आख़िरी बार साहिर की बात करनी है. यह जानते हुए भी कि इस आख़िरी का मतलब शायद बिल्कुल [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="‘मैं ज़िंदा हूं यह मुश्तहर कीजिये...’ (साहिर-4)" link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir4/"><p><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/sahir-ludhianvi.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-295" title="sahir ludhianvi" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/sahir-ludhianvi.jpg" alt="" width="320" height="217" /></a></p>
<p>‘<strong>मैं ज़िंदा हूं यह मुश्तहर कीजिये&#8230;</strong>’</p>
<p><em>राजकुमार केसवानी </em><em></em></p>
<p>आज फिर मौका है कि अपने एक राज़ को आपके साथ बांटकर बात शुरू करूं. वो राज़ यह है कि दिल इस ख़याल भर से उदास है कि आज आख़िरी बार साहिर की बात करनी है. यह जानते हुए भी कि इस आख़िरी का मतलब शायद बिल्कुल आख़िरी नहीं है फिर भी दिल तो दिल है. बकौल ग़ालिब ‘ <strong>दिल ही तो है न संगो-ख़िश्त</strong><strong>, </strong><strong>दर्द से भर न आए क्यों / रोयेंगे हम हज़ार बार</strong><strong>, </strong><strong>कोई हमे सताए क्यों</strong>’.</p>
<p>पिछले दो दिन से लगातार 78 आर.पी.एम. का एक रिकार्ड सुने जा रहा हूं. साहिर की आवाज़ में साहिर की शायरी. एक तरफ ‘<strong>कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है</strong>’ और दूसरी तरफ ‘<strong>मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझको’</strong>. एच.एम.वी. ने जिस ज़माने में इसे रिलीज़ किया था उस वक़्त इसकी कीमत चंद रुपए थी, आज यह बेशकीमती है.</p>
<p>आप कभी आज़मा कर देखें, अपने किसी अज़ीज़ की आवाज़ को उसकी ग़ैर-मौजूदगी में किसी टेप, किसी सी.डी. पर सुन लें. आपको लगेगा, वो अपना यहीं मौजूद है. आप उससे बात करने लगेंगे. बात हो भी जाएगी. ये मेरा आज़माया हुआ नुस्ख़ा है. अब जैसे दो दिन से मैं इसी फार्मूले से साहिर साहब से बात कर रहा हूं. आप सब की तरफ से बात कर रहा हूं, सो उसे सुनाना भी तो आप ही को है.</p>
<p>‘साहिर साहब, मैं आपसे नाराज़ हूं. आपके नाम का मतलब अगर जादूगर हुआ तो क्या आप जब चाहे आवाज़ बन जाएंगे ? जब चाहे सिर्फ एक ख़ामोश तस्वीर हो जाएंगे ? जब जी चाहेगा, मर जाएंगे ?’</p>
<p>‘मैं ज़िन्दा हूं यह मुश्तहर कीजिए / मेरे क़ातिलों को ख़बर कीजिए’.</p>
<p>ये क्या ? मैने सवाल आवाज़ से किया था और जवाब किताब से आया ! इस दुनिया का यही कमाल है. सवाल कभी अकेले पैदा नहीं होते, जवाब भी उनके साथ ही पैदा होते हैं. इतना ज़रूर होता है कि पैदा होती ही दोनो को कोई अलग-अलग जगह छुपा देता है. इन दोनो के बीच फासला सिर्फ सच का होता है. सवाल करने वाले की आवाज़ में ज़रा सच्चाई हुई तो जवाब इस कायनात के किसी भी ज़र्रे से आवाज़ बनकर सामने आ जाता है. मगर होता अक्सर ऐसा है कि हम जवाब की उम्मीद में अपने कान उसी दिशा में लगा लेते हैं जिधर मुंह करके सवाल किया होता है. नतीजा – जवाब, कई बार, अपनी पूरी आवाज़ के साथ भी एक सवाल भर रह जाता है.</p>
<p>ख़ैर! मेरे सवाल का जवाब तो मुझे मिल गया है. साहिर ज़िन्दा हैं. साहिर के ‘क़ातिलों’ को ख़बर रहे. सच कहूं तो पिछले चार हफ्ते में आप सबने भी जितनी ज़ोर से अपनी आवाज़ बुलन्द करके मुझे यह ख़बर दी है उसके बाद मैं बेहद मुतमईन हूं कि ज़िन्दगी ने भले साहिर से धोखा किया हो लेकिन वक़्त आज भी उसी के साथ है.</p>
<p>सच मानिए ज़िन्दगी ने साहिर के साथ बड़ा ज़लील धोखा किया. वो तो जीना चाहता था. पंजाबी के अज़ीम शायर शिवकुमार बटालवी की भरी जवानी में मौत की ख़बर सुनकर साहिर ने कहा था ‘ &#8230;<strong>वो शिव</strong><strong>, </strong><strong>फूल बन गया होगा या तारा. हम जो मरेंगे तो करेले का फूल ही बनेंगे. क्योंकि जवानी में तो हम मरने वाले नहीं’</strong>.</p>
<p>अब कोई बताए कि आख़िर साहिर से अज़ीमो-शान शायर के लिए महज़ 59 साल की उम्र, जवानी में मौत नहीं तो क्या है ?</p>
<p>लेकिन इतना तय है कि साहिर जब तक जिए , ख़ूब जिए. जितना ख़ुद के लिए जिए, उससे कहीं ज़्यादा समाज के लिए जिए. अपने लिए बस शामें सजाईं. ज़माने को अपनी शायरे दी. ऐसी शायरी जो नौजवानी के अरमानों की बात करती है. ऐसी शायरी जो ज़माने की ख़ुशियों से महरूम लोगों के हक़ की बात करती है. शायरी जो औरत को ख़ुदा का दर्जा देती है.</p>
<p>ज़रा ग़ौर फरमाएं, साहिर जब अपनी बात करते हैं तो कहते हैं ‘मैं पल दो पल का शायर हूं’ अपने दुनियावी व्यवहार में भले ही अखड़पन और अहंकार दिखाते हों लेकिन जब शायर बनकर अपनी बात करते तो कहते ‘<strong>मैं पल दो पल का शायर हूं</strong><strong>, </strong><strong>पल दो मेरी हस्ती है</strong><strong>, </strong><strong>पल दो पल मेरी कहानी है</strong>’ यहां ख़ुदनुमाई से इतनी दूरी कि उनकी ग़ज़लों के मक़्ते में आपको शायद ही कभी उनका तखल्लुस ‘साहिर’ मिले.</p>
<p>दिमाग़ में चाहे जितनी दौलत की गर्मी रहे लेकिन दिल इंसानी अहसास से इस क़दर लबरेज़ कि छलक-छलक पड़ता था. इसकी एक मिसाल निदा फाज़ली के एक किस्से से बख़ूबी समझ आती है. यह उस दौर की बात है जब निदा बम्बई में स्ट्र्गल कर रहे थे.</p>
<p>‘&#8230;अक्सर मेरी रातें जांनिसार अख़्तर के घर या साहिर लुधियानवी की ‘परछाइयां’ में बीततीं. साहिर साहब शाही मिजाज़ के आदमी थे. उनकी यह शहंशाहियत उन्हें विरासत में मिली थी&#8230; (वहां) बड़िया खानो व महंगी शराबों का लुत्फ उठाता था. &#8230;एक रात शायद मुझे नशा ज़्यादा हो गया था, और उस नशे में मैं प्रेक्टीकल होने के बजाय किताबी ज़्यादा हो गया था’.</p>
<p>निदा साहब ने नशे की उसी झोंक में साहिर के सामने ही साहिर की शायरी के मुकाबले फिराक़ गोरखपुरी और फैज़ अहमद ‘फैज़’ की तारीफ कर दी. नाराज़ होकर साहिर ने निदा को दस-बीस सुनाई और बाहर निकल जाने का हुक्म दे दिया. इस बीच साहिर की मां भी बाहर निकल आईं थी. अब मैं फिर से निदा को ही कोट कर रहा हूं, बस ज़रा ग़ौर से सब कुछ देखिएगा और तय कीजिएगा.</p>
<p>“मां जी, देखा. मैने इसकी हालत पर तरस खाया और नतीजे में यह पाया. मेरे सामने ही मेरी बुराई कर रहा है’ दूसरों की तारीफ को वह अपनी बुराई मानते थे.</p>
<p><strong>मैं मेज़ से उठकर दरवाज़े की तरफ बढ़ा ही था कि देखा</strong><strong>, </strong><strong>साहिर मेरे कन्धे पर हाथ रखकर कह रहे हैं</strong><strong>,</strong><strong> ‘</strong><strong>नौजवान</strong><strong>,</strong><strong> इतनी रात को जा रहे हो&#8230;खाना नहीं खा रहे हो</strong><strong>, </strong><strong>तो ये रुपए रख लो.’</strong><strong> वह मुझे कुछ देना चाहते थे लेकिन मैने नहीं लिया और तेज़ क़दमों से नीचे उतर आया”</strong><strong>. </strong></p>
<p>ऐसा था बच्चों की तरह रूठ जाने वाला और इंसानों की तरह इंसानों की सोचने वाला साहिर लुधियानवी.</p>
<p><strong>आस्मां पे है ख़ुदा और ज़मीं पे हम </strong></p>
<p>साहिर ने लिखा था ‘ <strong>आस्मां पे है ख़ुदा और ज़मीं पे हम / आजकल वो इस तरफ देखता है कम</strong>’(फिर सुबह होगी). मुझे यकीन है कि हम सब इस बात को तहे-दिल से मानते हैं. मैं इसे न सिर्फ मानता हूं बल्कि इस बात पर मेरा ‘उससे’ झगड़ा भी है. आख़िर को जिस ज़मीन पर हमें भेज दिया वहां किसी तरह का इंसाफ की पाबंदी वाला  एक निज़ाम तो हो. अगर ये मुमकिन नहीं तो फिर ये जहां क्यों हो ?</p>
<p>साहिर ने तमाम उम्र इसी नाइंसाफी, ग़ैर बराबरी, वहशत और दहशत के ख़िलाफ आवाज़ बुलन्द की. संगीतकार ख़य्याम, जिनके साथ साहिर ने ‘फिर सुबह होगी’, ‘कभी-कभी’ और ‘शगुन’ जैसी फिल्में की, कहते हैं – ‘<strong>क्या हम इस बात की कल्पना भी कर सकते है कि साहिर के अलावा किसी दिन</strong><strong>, </strong><strong>किसी गीत में ‘</strong><strong> मैं देखूं तो सही दुनिया तुम्हे कैसे सताती है / कोई दिन के लिए</strong><strong>, </strong><strong>अपनी निगहबानी मुझे दे दो’</strong><strong>(शगुन) जैसी बात कोई दूसरा कह सकेगा </strong><strong>?</strong><strong> </strong></p>
<p>यह बात इसलिए ज़्यादा मह्त्वपूर्ण है क्योंकि यह बात नायक से उसकी प्रेमिका कह रही है. वह भी उस दौर में जिस दौर में औरत को ‘अबला’ की पहचान दी गई थी. लेकिन साहिर की ‘अबला’ ज़माने को चुनौती देती है कि उसकी निगहबानी में मुश्किल में फंसे ‘मर्द’ को छूकर दिखा दे.</p>
<p>इन्ही वजहों से यश चौपड़ा जैसे फिल्मकार कहते हैं कि ‘साहिर के गीतों से पूरी फिल्म का मय्यार ऊंचा हो जाता था’. यही वजह थी कि बी.आर.चौपड़ा की लगभग सारी फिल्मों के गीतकार साहिर ही रहे, भले ही संगीतकार एन.दत्ता हों, ओ.पी.नैयर हो या फिर रवि.</p>
<p>यश जी ने तो अपनी फिल्म ‘कभी कभी’ (76) में साहिर के गीतों के सहारे बना ली लेकिन 1980 में साहिर की मौत के बाद भी वो उनके दिलो-दिमाग से परे न हुए.सो 1998 में उन्होने साहिर की ज़िन्दगी पर एक फिल्म बनाने का इरादा ज़ाहिर किया था. फिल्म में अमिताभ बच्चन को साहिर की भूमिका, शबाना आज़मी को अमृता प्रीतम की भूमिका के लिए चुन भी लिया था और इस त्रिकोण की दूसरी नायिका का चयन के लिए कई नाम थे. इस दूसरी नायिका का चरित्र गायिका सुधा मल्होत्रा पर आधारित था.</p>
<p>अब मैं आता हूं उस ऊपर वाली बात पर वापस कि ‘&#8230;आजकल वो इस तरफ देखता है कम’. उसने साहिर को फन और कामयाबी दोनो दिए लेकिन उसके बदले में उससे क्या-क्या न छीना गया. बचपन में बाप का साया. जवानी में दर्जन भर नाकाम इश्क़ और तन्हाई. तन्हा-तन्हा सांसों के साथ मां का आंचल थामे-थामे जीते रहे.</p>
<p>1978 में मां के देहांत के बाद साहिर टूट गए. इसी के बाद उन्हें पहली बार हार्ट अटैक हुआ. दो साल बाद वे अपने टूटे हुए दिल के साथ ख़ुद भी इस दुनिया को अलविदा कह चले.</p>
<p>गोया कि जीते जी हुए ज़ुल्म काफी न थे, सो मरने के बाद भी यह सिलसिला बना हुआ है. 1970 में उन्होने बेहद शौक़ से एक विशाल घर बनाया था, जिसका नाम है ‘परछाइयां’. इस नाम की उनकी एक बेहद ख़ूबसूरत नज़्म भी है.</p>
<p>आज उस घर का कोई वारिस नहीं है सो कई लोगों ने उस पर कब्ज़ा जमा रखा है. साहिर के उस ड्राइंग रूम मेंजहां हर शाम बेहतरीन स्काच और लज़ीज़ ख़ानों की दावतें होती थीं, कुछ बिल्डरों की निगाह में है. सैंकड़ों अप्रकाशित गीत,ग़ज़ल रद्दी में तुलकर बिक चुके हैं.</p>
<p>मौत के बाद उन्हें जुहू के कब्रिस्तान में एक जगह मिली थी वह भी अब बुलडोज़रों की ज़द में आकर मिट चुकी है.</p>
<p>साहिर के लिए यह नया नहीं है. 1947 के बंटवारे के बाद साहिर मां की वजह से लाहौर में रुक गए थे. उस समय वे पत्रिका ‘सवेरा के सम्पादक थे. जब तक वे वापस हिन्दुस्तान आते तब तक कस्टोडियन ने लुधियाना में उनके मकान को भी भारत छोड़कर जाने वालो में शुमार करके राजसात कर किसी और के नाम कर दिया. तमाम कोशिशो के बाद भी साहिर उस मकान को वापस हासिल न कर सके.</p>
<p>और&#8230;</p>
<p>और जाते-जाते, पिछली बार ‘इश्क़-इश्क़’ में ‘कोहे-तूर’ की जगह ‘कोहे-नूर’ छप गया है सो ठीक कर लें. दूसरी बात आपने साहिर के बहुत सारे गीत शामिल करने की फरमाइश की थी पर एक भी नहीं कर पाया. मैं खुद भी उन गीतों के साथ ही साहिर की शायरी, उनकी और ढेरों बातें कहना चाहता था लेकिन वही न कि अपना सोचा हुआ सब होता कहां है.</p>
<p>तीसरी और आज की आख़िरी बात. लगातार चार हफ्ते साहिर की बात करते-करते मैं इतना साहिरमय हो चुका हूं कि अब अगली बार किसी दूसरे गीतकार की बात तो नहीं ही कर पाऊंगा. कुछ एंड-बेंड करके दिमाग को ज़रा हल्का करूंगा. और फिर जब होश में आया तो इस गीतकारों वाले सिलसिले को दुबारा शुरू करेंगे. नहीं, मतलब, अपनी तो आपस की बात है न तो छुपाने की क्या ज़रूरत, खुल के कहो, ख़ुश रहो.</p>
<p>तो बस फिर मिलते हैं अगले हफ्ते. तब तक. जय-जय.</p>
<p>(<strong><em>दैनिक भास्कर</em></strong><em> के रविवारीय परिशिष्ट <strong>रसरंग</strong> में 2 मई 2010 को प्रकाशित</em>)</p>
<h5>&#8216;<a title="Sahir - 2" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-1/" target="_blank">तुम्हारे शहर में आए हैं हम, साहिर कहां हो तुम</a> (साहिर-1)</h5>
<h5>&#8216;<a title="Sahir - 2" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-2/" target="_blank">तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा</a>&#8216; (साहिर-2)</h5>
<h5>&#8216;<a title="Sahir - 3" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-3/" target="_blank">अल्ला तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम</a>&#8216; (साहिर-3)</h5>
<h5><a title="Sahir-4" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir4/" target="_blank">मैं ज़िंदा हूं यह मुश्तहर कीजिये</a>…(साहिर-4)</h5>
</div>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir4/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>“अल्ला तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम&#8230;” (साहिर-3)</title>
		<link>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-3/</link>
		<comments>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-3/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 03 Jul 2010 11:05:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[Cinema]]></category>
		<category><![CDATA[General]]></category>
		<category><![CDATA[Music]]></category>
		<category><![CDATA[आपस की बात]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी पोस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[Iqbal]]></category>
		<category><![CDATA[Kavi Pradeep]]></category>
		<category><![CDATA[Parody]]></category>
		<category><![CDATA[Sahir]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.thebhopalpost.com/?p=285</guid>
		<description><![CDATA[“अल्ला तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम&#8230;” राजकुमार केसवानी देखा आपने, पिछली बार पूरा का पूरा ‘ तू हिंदू बनेगा, न मुसलमान बनेगा’ सुना दिया लेकिन अपनी धुन में फिल्म का नाम तक नहीं बताया. ख़ैर, आप में से बहुत लोग जानते ही हैं कि यह 1959 में रिलीज़ हुई बी.आर. फिल्म्स की ‘धूल का फूल’ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="“अल्ला तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम...” (साहिर-3) " link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-3/"><p><strong>“</strong><strong>अल्ला तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम&#8230;</strong><strong>”</strong></p>
<p><em>राजकुमार केसवानी<a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/Sahir-2.jpeg"><img class="alignright size-full wp-image-286" title="Sahir-2" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/Sahir-2.jpeg" alt="" width="129" height="119" /></a></em><em></em></p>
<p>देखा आपने, पिछली बार पूरा का पूरा ‘ तू हिंदू बनेगा, न मुसलमान बनेगा’ सुना दिया लेकिन अपनी धुन में फिल्म का नाम तक नहीं बताया. ख़ैर, आप में से बहुत लोग जानते ही हैं कि यह 1959 में रिलीज़ हुई बी.आर. फिल्म्स की ‘धूल का फूल’ का गीत है फिर भी मेरा फर्ज़ बनता है बताना. सो बता दिया.</p>
<p>एन. दत्ता के साथ यूं तो ‘चन्द्रकांता’(56), ‘दीदी’ (59), ‘धर्मपुत्र’ (61), ‘चान्दी की दीवार’ (64) और ‘नया रास्ता’ (70) जैसी कई फिल्मों में गीत लिखे और क्या ख़ूब लिखे.</p>
<p>इसी तरह उन्होने संगीतकार रवि , रोशन , जयदेव और ख़य्याम के साथ भी बेहतरीन काम किया लेकिन सोचता हूं कि संगीतकार के साथ वाली बात को यहीं छोड़ दूं. वजह यह कि मुझे लगता है कि जोड़ी की बजाय इस बात को जानना ज़रूरी है कि साहिर के पास अभिव्यक्ति की कितनी अदभुत विविधता थी.</p>
<p>अब जैसे उनके उस रंग से शुरू करें जिसके लिए वह बेहतर जाने जाते हैं. इंक़लाबी शायर, समाजी मसलों का शायर, ग़रीब-मज़दूर-किसान के हक़ में कलम उठाने वाला कामरेड. <strong>‘</strong><strong>जिन्हे नाज़ है हिन्द पर वो कहां है’</strong> (प्यासा-57), <strong>‘</strong><strong>वो सुबह कभी तो आएगी</strong>’ (फिर सुबह होगी-58), <strong>‘</strong><strong>साथी हाथ बड़ाना साथी रे’</strong> (नया दौर-57), <strong>‘</strong><strong>समाज को बदल डालो</strong><strong>, </strong><strong>ज़ुल्म और लूट के रिवाज को बदल डालो’</strong>(समाज को बदल डालो-70),‘<strong>पोंछ कर अश्क अपनी आंखों से मुस्कराओं तो कोई बात बने</strong><strong>, </strong><strong>सर झुकाने से कुछ नहीं होगा</strong><strong>, </strong><strong>सर उठाओ तो कोई बात बने’</strong><strong> </strong>(नया रास्ता-73) वग़ैरह.</p>
<p>इस बात को ज़रा एक बार सोचकर देखियेगा. साहिर ने समाज के पीड़ित-शोषित वर्ग की आवाज़ को अपने गीतों के ज़रिये जिस बुलंदी के साथ घर-घर पहुंचाया, उसकी कोई दूसरी मिसाल, सिनेमा या सिनेमा के बाहर भी नहीं है.</p>
<p>साहिर जैसे ऊंचे पाए के शायर ने अन्याय के विरुद्ध अपने आक्रोश को व्यक्त करने के लिए पैरोडी का सहारा लेने से गुरेज़ नहीं किया. उन्होने महाकवि अल्लामा इक़बाल की मशहूर नज़्म ‘<strong>सारे जहां से अछा हिन्दोस्तां हमारा’</strong> को बेघर, फुटपाथ पर सोने वालों के हक़ में इसे बदल कर कहा ‘<strong>चीनो-अरब हमारा</strong><strong>, </strong><strong>हिन्दोस्तां हमारा / रहने को घर नहीं है सारा जहां हमारा</strong>’. कवि प्रदीप ने फिल्म ‘नास्तिक’ (54) में गीत लिखा ‘<strong>देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान</strong><strong>, </strong><strong>कितना बदल गया इंसान’</strong>. साहिर ने मदन मोहन के साथ मिलकर फिल्म ‘रेल्वे प्लेटफार्म’ (55) में इसकी पैरोडी बना दी – ‘<strong>देख तेरे भगवान की हालत क्या हो गई इंसान</strong><strong>, </strong><strong>कितना बदल गया भगवान’</strong><strong>. </strong></p>
<p>इंक़लाब-ज़िन्दाबाद के साथ अपनी भी एक छोटी-मोटी, भले ही नाकाम सी आवाज़ तो हमेशा रही है सो साहिर की इंक़लाबी शायरी ने तो हमेशा ही मन को झकझोरा लेकिन अपने बारे में एक राज़ की बात और बताता हूं. नाकामियों ने बहुत लड़कपन में ही दामन थाम लिया था. न जाने क्यों दो वक़्त की पूरी रोटी मिलने के बावजूद रूह की भूख हमेशा बनी रहती थी. बल्कि बनी ही रहती है. सो नादानी की उस उम्र में भी दिल को तड़पाने वाले ‘दर्दी गीत’ बहुत अछे लगते थे.</p>
<p>मोहल्ले में जलील भाई पीठे वाले ने एक एक्सीडेंटशुदा बेडफोर्ड ट्रक का बिना इंजन का ढांचा गली में पटक रखा था. उसके ठीक बगल में बिजली का खम्बा था, जिसका बल्ब हमेशा ख़राब रहता था. सो बस उसी अन्धेरे में बिना कहीं पहुंचने वाली उस गाड़ी में बैठकर अकेले में अक्सर जो गीत गाता था, आगे चलकर पता चला वो साहिर लुधियानवी के हैं. ख़ासकर ‘<strong>मैने चान्द और सितारों की तमन्ना की थी</strong><strong>, </strong><strong>मुझको रातों की स्याही की सिवा कुछ न मिला’</strong>.(चन्द्रकांता-56).</p>
<p>आगे चलकर जब-जब दर्द ने पनाह ढूंढी, अकेलेपन और तन्हाई की टीस ने ज़बान मांगी तो ज़्यादातर साहिर की शायरी ने आ-आ कर सहारा दिया. ‘<strong>जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला / हमने तो जब कलियां मांगी</strong><strong>, </strong><strong>कांटो का हार मिला’</strong> (प्यासा), <strong>‘</strong><strong>तेरी दुनिया में जीने से तो बेहतर है कि मर जाएं’</strong><strong>(</strong>हाऊस नम्बर 44), ‘<strong>दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना</strong><strong>,</strong><strong> जहां नहीं चैना</strong><strong>, </strong><strong>वहां नहीं रहना</strong><strong>’</strong> (फंटूश-56), ‘<strong>अश्कों में जो पाया है</strong><strong>, </strong><strong>वो गीतों में दिया है / उस पर भी सुना है कि ज़माने को गिला है’</strong> (चान्दी की दीवार-64) टाईप के पच्चीसों गीत.</p>
<p>और हां, इन सबसे ऊपर. ‘<strong>चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनो’</strong>. ऐसी ही रचनाएं होती हैं जो अपने से जुड़े हर शख्स को ऊंचा उठा देती हैं. कहते हैं – ‘<strong>तारुफ रोग हो जाए</strong><strong>, </strong><strong>तो उसको भूलना बेहतर / तालुक बोझ बन जाए</strong><strong>,</strong><strong> तो उसको तोड़ना अछा / वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाआ न हो मुमकिन / उसे इक ख़ूबसूरत मोड़ देकर तोड़ना अछा’</strong><strong>. </strong></p>
<p>और जब मस्ती का रंग हो तो साहिर फिर कमाल कर जाते हैं. ‘<strong>ऎ मेरी टोपी पलट के आ</strong><strong>, </strong><strong>न अपने फंटूश को सता’</strong> (फंटूश), ‘<strong>सर जो तेरा चकराए’</strong><strong> (प्यासा)</strong><strong>,</strong><strong> ‘</strong><strong>चाहे कोई ख़ुश हो</strong><strong>, </strong><strong>चाहे गालियां हज़ार दे / मस्तराम बनके ज़िन्दगी के दिन गुज़ार दे’</strong><strong>.</strong></p>
<p>साहिर तब और भी इंसान नज़र आते हैं जब वो इंसानी रिश्तों को ऐसे मकाम पर पहुंचा देते हैं जहां से बाकी सारी चीज़ें छोटी नज़र आने लगती हैं. अब जैसे फिल्म ‘काजल’ में एक बहन कहती है – ‘<strong>मेरे भैया</strong><strong>, </strong><strong>मेरे चन्दा मेरे अनमोल रतन / तेरे बदले मे ज़माने की कोई चीज़ न लूं’</strong>. दूसरी बहन कहती है ‘<strong>मेरे भैया को सन्देसा पहुंचाना</strong><strong>, </strong><strong>रे चन्दा तेरी जोत बड़े’</strong> (दीदी).</p>
<p>मोहब्बत को इंसान की ज़िन्दगी की सबसे कीमती और सबसे आला तरीन नियामत बताने वाले इंसानियत के आशिक़ इस शायर ने फिल्म ‘बरसात की रात’(60) की अपनी महान क़व्वाली ‘<strong>ये इश्क़</strong><strong>,</strong><strong>इश्क़ है इश्क़</strong><strong>,</strong><strong>इश्क़’</strong><strong> में कहा है ‘</strong><strong>इश्क़ आज़ाद है</strong><strong>, </strong><strong>हिन्दू न मुसलमान है इश्क़ / आप ही धर्म और आप ही ईमान है इश्क़ / अल्लाह और रसूल का फरमान इश्क़ है / यानी हदीस इश्क़ और क़ुरान इश्क़ है / गौतम का और मसीह का अरमान इश्क़ है / इंतेहा ये है कि बन्दे को ख़ुदा करता है इश्क़’</strong><strong>. </strong></p>
<p>इश्क़ के इस पुजारी की रुमानियत में कितने ख़ूबसूरत रंग कितनी भीनी-भीनी महक थी. ‘<strong>छू लेने दो नाज़ुक होंठों को</strong><strong>, </strong><strong>कुछ और नहीं हैं जाम हैं ये</strong><strong>, </strong><strong>कुदरत ने जो हमको बक्शा है</strong><strong>, </strong><strong>वो सबसे हसीं ईनाम है ये’</strong> (काजल-65), ‘ और फिर वही ‘<strong>हम आपकी आंखों मे इस दिल को बसा दें तो’</strong> (प्यासा), ‘बरसात की रात’ में ‘ ‘<strong>ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात/ एक अंजान हसीना से मुलाक़ात की रात’</strong> और ‘<strong>मैने शायद तुम्हे पहल भी कहीं देखा है’</strong>. या फिर ‘ताज महल’ (63) के ‘<strong>जुर्मे उल्फत पे हमें लोग सज़ा देते हैं / कैसे नादान हैं</strong><strong>, </strong><strong>शोलों को हवा देते हैं’</strong><strong>,</strong><strong> ‘</strong><strong>पांव छू लेने दो फूलों को इनायत होगी’</strong><strong> और ‘</strong><strong>जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा’</strong>, और न जाने कितने-कितने. और हां, वो नायाब गीत जिसे सुनकर आज भी प्यार-मोहब्बत के आगे उम्र के सारे बन्धन टूटते नज़र आते हैं. ‘<strong>ऎ मेरी ज़ोहरा जबीं</strong><strong>, </strong><strong>तुहे मालूम नहीं / तू अभी तक है हसीं</strong><strong>, </strong><strong>और मैं जवान तुझपे कुरबान मेरी जान</strong><strong>, </strong><strong>मेरी जान’</strong>. (वक़्त- 65).</p>
<p>एकदम कोमल भावनाओ वाला गीत देखना हो तो ये गीत ज़रूर सुन देखें. संगीतकार मदन मोहन मोहन और साहिर ने बहुत कम फिल्में साथ की लेकिन जो कीं क्या कमाल कीं. लत्ता की आवाज़ में ये गीत उसी का एक नमूना है. ‘<strong>चान्द मद्धम है</strong><strong>, </strong><strong>आस्मां चुप है / नीन्द की गोद में जहां चुप है </strong>(रेल्वे प्लैटफार्म-55). ‘<strong>बस्ती-बस्ती पर्बत-पर्बत गाते जाए बंजारा’</strong> भी इसी फिल्म का गीत है.</p>
<p>आज के दौर में नई पीढ़ी के लिए यह समझना थोड़ा मुश्किल होगा कि किस तरह गुज़रे दौर में साहिर ने औरत हक़ में अपनी कलम को नश्तर बनाकर समाज को उस वक़्त चुभोया है, जब सारा समाज ‘मर्दानगी’ के नशे में चूर था. ये साहिर के बस की ही बात थी कि उसने अपनी कालजयी नज़्म ‘चकले’ में कोठे पर बैठ पेशा करने को मजबूर तवायफ को यशोदा, राधा और ज़ुलेख़ा के साथ खड़ा कर दिखाया. ‘<strong>मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी / यशोदा की हम-जिंस (सजातीय)</strong><strong>,</strong><strong> राधा की बेटी / पयम्बर की उम्मत (अनुयायी)</strong><strong>, </strong><strong>ज़ुलेख़ा की बेटी / सना-ख़्वाने-तक़दीसे-माशरिक कहां हैं (जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां हैं). </strong></p>
<p>दुनिया से चाहे जितने नाराज़ी हो. चाहे कहते हों कि ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’ लेकिन इस अज़ीम शायर का दिल बच्चों को देखकर उम्मीदों से भर जाता है. उसे लगता है कि इस बच्चे के ज़रिये आने व कल को बेहतर बनाया जा सकता है. ‘<strong>बच्चों तुम तक़दीर हो कल के हिन्दुस्तान </strong><strong>की</strong><strong> / बापू के वरदान की</strong><strong>, </strong><strong>नेहरू के अरमान की’</strong>(दीदी). ‘<strong>भारत मां की आंख के तारों</strong><strong>,</strong><strong> नन्हे-मुन्ने राज दुलारों / जैसे मैने तुमको संवारा</strong><strong>, </strong><strong>वैसे ही तुम देश संवारों</strong>’ (बहू बेटी), ‘<strong>बच्चे मन के सच्चे</strong><strong>, </strong><strong>सारे जग की आंख के तारे / ये वो नन्हे फूल हैं जो भगवान को लगते प्यारे’</strong> (दो कलियां -68).</p>
<p>भक्ति रस की बात हो तो ‘<strong>तोरा मनवा क्यों घबराए रे / लाखों दीन दुखियारे प्राणी / जग में मुक्ति पाएं/ रे राम जी के द्वार से’</strong><strong> </strong>(साधना), ‘<strong>आना है तो आ राह में कुछ देर नहीं है / भगवान के घर देर है अन्धेर नहीं है’</strong> (नया दौर). मेरी नज़र में हमारी दुनिया की सबसे खूबसूरत प्रार्थना भी साहिर ने ही लिखी है. ‘<strong>अल्ला तेरो नाम</strong><strong>, </strong><strong>ईश्वर तेरो नाम / सबको सन्मति दे भगवान’</strong> (हम दोनो).</p>
<p>अध्यात्म की पकड़ ऊंचाई देखनी हो तो सर्वकालिक महान गीत ‘<strong>मन रे तू काहे न धीर धरे / वो निर्मोही</strong><strong>, </strong><strong>मोह न जाने</strong><strong>, </strong><strong>जिनका मोह करे’</strong><strong> यह अन्याय होगा अगर इस गीत को भी बस दो बोल देकर छोड़ दूं. बहुत अर्थवान बाते हैं</strong><strong>, </strong><strong>सो पूरा ही सुन लें. ‘</strong><strong> इस जीवन की चढ़ती-ढलती</strong><strong>, </strong><strong>धूप को किसने बान्धा / रंग पे किसने पहरे डाले</strong><strong>, </strong><strong>रूप को किसने बान्धा / काहे ये जतन करे / मन रे&#8230;</strong><strong> </strong><strong> / उतना ही उपकार समझ कोई</strong><strong>, </strong><strong>जितना साथ निभा दे / जनम-मरन का खेल है सपना </strong><strong>, </strong><strong>ये सपना बिसरा दे / कोई न संग मरे / मन रे&#8230;</strong>’</p>
<p>दार्शनिकता की इतनी गहरी समझ है कि सामान्य से पार्टी में गाए गए गीत के शब्द हो जाते हैं ‘<strong>आगे भी जानी न तू</strong><strong>, </strong><strong>पीछे भी जाने न तू / जो भी है</strong><strong>, </strong><strong>बस यही इक पल है’</strong>. (वक़्त). कोई दूसरा गीतकार फिल्म ‘नीलकमल’ कबाड़ी बनकर गीत गाते महमूद के लिए क्या लिखता, पता नहीं, लेकिन साहिर ने की पत्ते के बात – ‘<strong>ख़ाली डब्बा</strong><strong>, </strong><strong>ख़ाली बोतल</strong><strong>, </strong><strong>ले ले मेरे यार</strong><strong>, </strong><strong>ख़ाली से मत नफरत करना</strong><strong>, </strong><strong>ख़ाली सब संसार’</strong><strong>. </strong></p>
<p>इसी तरह फिल्म ‘पैसा या प्यार’ में तनूजा जब गीत गाती बेर बेचने निकलती है तो वह गीत एक बड़ी सच्चाई भी याद दिलाता है. ‘<strong>बेर लियो-3</strong><strong>, </strong><strong>हां</strong><strong>, </strong><strong>मेवा ग़रीबों का</strong><strong>, </strong><strong>तेरे मेरे नसीबों का’</strong>. आपने और भी सामान बेचने वाले या वाली के पात्र फिल्मों में गीत गाकर सामान बेचते देखे होंगे लेकिन उन गीतों में ऐसी कोई बात दिखाई दी क्या ?</p>
<p>मेरे एक दोस्त ने एक बार मेरी इस बात पर ऐतराज़ करते हुए कहा कि ‘ यार वो बेर वाली होकर ऐसे फलसफे की बात करती हज़म नहीं होती’. मैने पूछा ‘ मैने कहा, ओये यारा. सड़क पर बेर बेचती या चने बेचती लड़की लता और आशा की ख़ूबसूरत आवाज़ में, नाचती,गाती हज़म हो जाती है ? और आख़िर, यह बात किसने तय कर दी है कि अपने दम-ख़म पर दुनिया में जीने निकला इंसान अक्ल से भी कमतर होता है ?</p>
<p>और&#8230;</p>
<p>और तो यह कि बात तो आज भी खत्म नहीं हुई. एक और फाईनल बात तो बनती है बास. अब आख़िर को आप ही के बार-बार के इसरार की वजह से ही तो फुल बात कर रहा हूं. तो चलिए अगली बार हाज़िर होता हूं साहिर साहब की एकदम फुल ऎंड फाईनल बात के साथ. तब तक. जय-जय.</p>
<p><em>(<strong>दैनिक भास्कर </strong>के रविवारीय परिशिष्ट &#8216;रसरंग&#8217; में 25 अप्रेल 2010 को प्रकाशित) </em></p>
<h5>&#8216;<a title="Sahir - 2" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-1/" target="_blank">तुम्हारे शहर में आए हैं हम, साहिर कहां हो तुम</a> (साहिर-1)</h5>
<h5>&#8216;<a title="Sahir - 2" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-2/" target="_blank">तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा</a>&#8216; (साहिर-2)</h5>
<h5>&#8216;<a title="Sahir - 3" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-3/" target="_blank">अल्ला तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम</a>&#8216; (साहिर-3)</h5>
<h5><a title="Sahir-4" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir4/" target="_blank">मैं ज़िंदा हूं यह मुश्तहर कीजिये</a>…(साहिर-4)</h5>
</div>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-3/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>3</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>&#8216;तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान  बनेगा&#8217; (साहिर-2)</title>
		<link>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-2/</link>
		<comments>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-2/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 03 Jul 2010 09:25:17 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[Cinema]]></category>
		<category><![CDATA[Music]]></category>
		<category><![CDATA[आपस की बात]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी पोस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[B.R.Chopra]]></category>
		<category><![CDATA[Devdas]]></category>
		<category><![CDATA[Gulzar]]></category>
		<category><![CDATA[N.Dutta]]></category>
		<category><![CDATA[Pyasa]]></category>
		<category><![CDATA[S.D.Burman]]></category>
		<category><![CDATA[Sahir]]></category>
		<category><![CDATA[Taxi Driver]]></category>
		<category><![CDATA[Yash Chopra]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.thebhopalpost.com/?p=280</guid>
		<description><![CDATA[&#8216;तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान  बनेगा&#8216; राजकुमार केसवानी हां जी, तो पिछले हफ्ते की बात में साहिर लुधियानवी साहब बम्बई पहुंच चुके थे. फिल्मों में गीत लिखने का सिलसिला शुरू हो चुका था. ‘ठंडी हवाएं, लहरा के आएं’ (लत्ता-नौजवान-1951) के साथ ही साहिर की ज़िन्दगी की जदोजहद की तपिश में पुरसुकून ठंडक ने दस्तक दी. [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="  'तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान  बनेगा' (साहिर-2) " link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-2/"><p><strong>&#8216;तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान  बनेगा</strong>&#8216;<a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/1980_Sahir_Ludhianvi.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-281" title="Sahir_Ludhianvi" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/1980_Sahir_Ludhianvi.jpg" alt="" width="185" height="265" /></a></p>
<p><em>राजकुमार केसवानी </em></p>
<p>हां जी, तो पिछले हफ्ते की बात में साहिर लुधियानवी साहब बम्बई पहुंच चुके थे. फिल्मों में गीत लिखने का सिलसिला शुरू हो चुका था. ‘ठंडी हवाएं, लहरा के आएं’ (लत्ता-नौजवान-1951) के साथ ही साहिर की ज़िन्दगी की जदोजहद की तपिश में पुरसुकून ठंडक ने दस्तक दी.</p>
<p>‘नौजवान’ से संगीतकार एस.डी.बर्मन के साथ साहिर का सफर शुरू हुआ तो इस जोड़ी ने मिलकर ऐसे अमर गीत रचे कि आज तक बेजान रूहों को हयात करने का दम रखते हैं. ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले’, ‘ये कौन आया कि मेरे दिल की दुनिया में बहार आई’ (गीता दत्त-बाज़ी-51), ‘ये रात ये चान्दनी फिर कहां, सुन जा दिल की दास्तां’ (हेमंत कुमार-लत्ता-जाल-52), ‘जाएं तो जाए कहां, समझेगा कौन यहां / दर्द भरे दिल की ज़ुबां’, ‘दिल जले तो जले, ग़म पले तो पले / किसी की न सुन गाए जा’, ‘दिल से मिलाके दिल चार कीजिए’, ‘चाहे कोई ख़ुश हो चाहे गालियां हज़ार दे / मस्तराम बनके ज़िन्दगी के दिन गुज़ार दे’ (टैक्सी ड्राईवर-54), ‘जिसे तू कबूल कर ले वो अदा कहां से लाऊं’ (लत्ता-देवदास-55), ‘तेरी दुनिया में जीने तो बेहतर है कि मर जाएं’ , ‘फैली हुई हैं सपनों की बाहें, आजा चल दें कहीं दूर’ (हाऊस न.44), ‘जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला, हमने तो जब कलियां मांगीं कांटो का हार मिला’, ‘जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहां हैं’, ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’, (प्यासा-57).</p>
<p>साहिर ने इन गीतों के ज़रिये एक कमाल कर दिखाया. बिना अपने कवि तत्व को खोए, सरल और सुबोध भाषा में गीतों की रचना की. फिल्म की किसी ख़ास सिचुएशन के लिए लिखे जाने के बावजूद, साहिर के गीतों में एक अदभुत सार्वजनिक व्यापकता और ऊंचे मयार की शायरी है. अब ज़रा मिसाल के तौर पर इस गीत पर ग़ौर फरमाएं. ‘ये रात ये चान्दनी फिर कहां, सुन जा दिल की दास्तां’ अंतरे में सादा लफ्ज़ और ख़ूबसूरत शायरी देखिये.</p>
<p><strong>‘</strong><strong>हे</strong><strong>, </strong><strong>लहरों के होंठों पे धीमा-धीमा राग है / भीगी हवाओं में ठंडी-ठंडी आग है / इस हसीन आग में तू भी जल के देख ले / ज़िन्दगी के गीत की धुन बदल के देख ले / खुलने दे अब धड़कनों की ज़ुबां’</strong><strong> </strong><strong> </strong><strong>या फिर ‘</strong><strong> फैली हुई हैं सपनो की बाहें’</strong><strong> के अंतरे में पंजाबी के एक लफ्ज़ ‘</strong><strong>धनक’</strong><strong> (इन्द्रधनुष) को कितनी खूबसूरती से इस्तेमाल करके एक हसीन ख़याल को शक्ल दी है ‘</strong><strong> झूला धनक का धीरे-धीरे हम झूलें / अम्बर तो क्या है तारों के भी लब छू लें’</strong><strong>. </strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p>गुलज़ार साहब की व्याख्या में<strong> ‘</strong><strong>&#8230;साहिर के गीतों पर शायरी के वक़ार और ऊंचाई की मुहर है ‘ </strong>वे मानते हैं कि उनके गीतों में ऐसे लफ्ज़ों का इस्तेमाल हुआ है जो अपने आप में संगीत से भरे हुए हैं. मिसाल के तौर पर 1952 की फिल्म ‘जाल’ में लता जी का गाया गीत ‘पिघला है सोना दूर गगन पर / फैल रहे हैं शाम के साये’. या फिर इसी फिल्म से हेमंत कुमार की आवाज़ में ‘ ये रात ये चान्दनी फिर कहां / सुन जा दिल की दातां’ के अंतरे में ‘ पेड़ों की शाखों पर, सोई-सोई चान्दनी / और थोड़ी देर में थक के लौट जाएगी’.</p>
<p>इस वक़्त जब मैं साहिर साहब के गीतों की ख़ूबी की बात कर रहा हूं, मुझे नरगिस जी का एक लेख याद आ रहा है. किसी ज़माने में उर्दू में छपा साहिर साहन पर उनके इस लेख में उन्होने कहा था. ‘ साहिर को हर लिहाज़ से महफूज़ रखना चाहिये – फिल्म इंडस्ट्री के लिए भी और उर्दू शायरी के लिये भी’. इस बात का खुलासा करते हुए कि उनका साहिर से उनका कभी कोई ख़ास तालुक़ नहीं रहा लेकिन उनकी शायरी की वे दीवानी है.</p>
<p>वे मानती थीं कि फिल्म ‘प्यासा’ का गीत ‘हम आपकी आंखों में इस दिल को बसा दें तो’ ऐसा रोमांटिक गीत है जिसे ‘&#8230;एक लड़की और एक लड़का अगर एक गीत के ज़रिये इज़हारे-मोहब्बत करना चाहें तो साहिर के लिखे इस गीत से मुख़्तलिफ कोई गीत नहीं गा सकते’. लेकिन साथ ही उनने यह भी बता दिया कि जब ‘&#8230;मैं अकेली, तन्हा होती हूं या अपने ख़यालों की दुनिया में डूबी होती हूं तो हमेशा गुनगुनाती हूं – ‘तंग आ चुके हैं कश्मकशे-ज़िन्दगी से हम / ठुकरा न दे जहां को कहीं, बेदिली से हम’</p>
<p>यह रचना असल में मोहम्मद रफी की आवाज़ में गुरूदत्त पर फिल्म ‘प्यासा’(57) में फिल्माई गई थी. एक साल बाद आशा भोंसले की आवाज़ में फिल्म ‘लाईट हाऊस’ (58) के लिए इसका मुखड़ा लेकर एक नया गीत बना दिया.रफी ने इसे बिना किसी साज़ या संगत के तरन्नुम में सुनाया है जबकि आशा जी के साथ पूरा आर्केस्ट्रा है.</p>
<p>इन गीतों ने साहिर को हिन्दी सिनेमा में एक ऐसे मकाम पर पहुंचा दिया जहां अकेले वे ही थे. अब वे काम सिर्फ अपनी शर्तों पर करने लगे थे और लोग उनकी शर्तें मानकर भी उन्हीं से गीत लिखवाना चाहते थे. उनकी शर्तों ने उस दौर के सारे फिल्मी निज़ाम को बदल डाला. अब तक रेडियो पर गीत के साथ सिर्फ गायक और संगीतकार का नाम लिया जाता था, साहिर ने गीतकार को भी जगह दिलाई. अगर लत्ता मंगेशकर ने रिकार्ड बनाने वाली कम्पनी एच.एम.वी. को गायक को रायलटी देने पर मजबूर किया तो साहिर ने गीतकार को ये हक़ दिलवाया. गिनती के दो-चार अपवादों को छोड़कर उन्होने धुन के हिसाब से गीत नहीं लिखे बल्कि पहले गीत लिखे और फिर धुनें बनीं.</p>
<p>उनकी एक और शर्त थी जिसकी वजह से बहुत सारे संगीतकार चाहकर भी उनके साथ काम करने से कतराते थे. वे गीत में शब्द को ज़्यादा महत्वपूर्ण मानते थे. या यूं कहें कि वे मानते थे कि गीतों की लोकप्रियता में संगीतकार से ज़्यादा उनके गीतों का योगदान था. इसी कारण वे अपनी फीस उस दौर के नामचीन संगीतकारों की फीस से एक रुपया ज़्यादा मांगते थे.</p>
<p>बाकी शर्ते तो ठीक, लिखने के लिए बाद में संगीतकार भी अपनी ही पसन्द का चाहते थे.निर्माता-निदेशक उनकी इस शर्त को मान लेते थे. यश चौपड़ा जैसे बड़े निर्माता-निदेशक ने भी ‘दाग़’(1973) के बाद जब ‘कभी कभी’ (76) शुरू की तो साहिर ने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जगह ख़य्याम को बतौर संगीतकार मांग लिया. यश जी के पास इसे मानने के अलावा कोई चारा न था. आख़िर को इस फिल्म के नायक का चरित्र भी साहिर की ज़िन्दगी से प्रेरित होकर लिखा गया था.</p>
<p>लेकिन यह कोई पहला मौका नहीं था. साहिर ने पचास के दशक में ही एस.डी.बर्मन के सहायक एन.दत्ता (दत्ता नायक) को बतौर स्वतंत्र संगीतकार स्थापित होने में बहुत मदद की. ढेरों फिल्मों में काम दिलाया और ख़ुद बिना फिल्म के बजट की फिक्र किए गीत भी लिखे. इस मोहब्बत का नतीजे में जो नगीने पैदा हुए ज़रा एक नज़र उन पर डाल लें. ए.दत्ता की पहली फिल्म ‘मिलाप’(1955) में लत्ता का गीत ‘चान्द तारों का समा, खो न जाए आ भी जा’, ‘बता ऎ आसमां वाले तेरे बन्दे किधर जाएं’ और ‘अब वो करम करे कि सितम, मैं नशे में हूं’ (मैरीन ड्राईव-55),</p>
<p>1958 में साहिर एन.दत्ता को बी.आर.चौपड़ा केम्प मे भी ले आए और पहली ही फिल्म ’साधना’ में धूम मचा दी. ‘औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया’, ‘कहोजी तुम क्या-क्या ख़रीदोगे, यहां तो हर चीज़ बिकती है’, ‘तोरा मनवा क्यों घबराए रे, लाखों दीन-दुखियारे प्राणी जग मे मुक्ति पाएं, हे राम जी के द्वार से’, ‘सम्भल ऎ दिल, तड़पने और तड़पाने से क्या होगा’ और ‘आज क्यों हमसे पर्दा है’.</p>
<p>अगले साल फिर इसी जोड़ी ने हिन्दुस्तानी समाज को एक गूंज से झकझोर डाला. ‘तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा’. मैं अपने तजुर्बे की बात करता हूं. मेरी उम्र उस वक़्त बमुश्किल 9 साल की होगी जब मैने यह फिल्म अपने पित्ता के साथ देखी थी. इसका पहला असर तो ये हुआ कि मनमोहन कृष्ण नाम का अदाकार जो मुझे अब तक नापसन्द था, अछा लगने लगा. क्योंकि पर्दे पर यह गीत वही गा रहा था. दूसरे यह कि इस दुनिया में अपने 9 साल के तजुर्बे में इस एक जुड़वां शब्द   ‘हिन्दू-मुसलमान’ के जो मायने समझे थे वो हमेशा ‘प्रचारित परिभाषा’ से टकराते थे. इस एक गीत ने उस कच्ची उम्र में मुझे इस उलझावे से निजात दिला दी.</p>
<p>पिछले 50 साल में न जाने कितने ऐसे मौके आए हैं जब दिल ने कहा कि देश के कोने-कोने में जाकर बार-बार इस गीत को बजाऊं. मुझे बहुत यकीन है ऐसे मूर्खतापूर्ण विचार इस सयानी दुनिया में आज़माए जाना बहुत ज़रूरी हैं.</p>
<p>ख़ैर, मेरे पास ज़िन्दगी में कभी न तो इतने साधन रहे और न कभी इतनी बड़ी हैसियत कि ऐसी ‘बुद्धू बातें’ दुनिया में कहीं लागू कर सकूं. आज मौका मिला है तो यह पूरा का पूरा गीत सुना तो ज़रूर दूंगा.</p>
<p><strong>अछा है कि अब तक तेरा कुछ नाम नहीं है</strong></p>
<p><strong>तुझको किसी मज़हब से कोई काम नहीं है</strong></p>
<p><strong>जिस इल्म ने इंसान को तक़्सीम किया है</strong></p>
<p><strong>उस इल्म का तुझ पर कोई इलज़ाम नहीं है</strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong>तू बदले हुए वक़्त की पहचान बनेगा</strong></p>
<p><strong>इंसान की औलाद है इंसान बनेगा</strong></p>
<p><strong>तू हिन्दू बनेगा न&#8230;</strong></p>
<p><strong>मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया</strong></p>
<p><strong>हमने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया</strong></p>
<p><strong>क़ुदरत ने तो बक्शी थी हमें एक ही धरती</strong></p>
<p><strong>हमने कहीं भारत कहीं ईरान बनाया</strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong>जो तोड़ दे हर बन्द वो तूफान बनेगा</strong></p>
<p><strong>इंसान की औलाद है&#8230;</strong></p>
<p><strong>नफरत जो सिखाए वो धरम तेरा नहीं है</strong></p>
<p><strong>इंसां को जो रौन्दे वो क़दम तेरा नहीं है</strong></p>
<p><strong>क़ुरआन न हो जिसमे वो मन्दर नहीं तेरा</strong></p>
<p><strong>गीत न हो जिसमें वो हरम तेरा नहीं है</strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong>तू अम्न का और सुलह का अरमान बनेगा</strong></p>
<p><strong>इंसान की औलाद है&#8230;</strong></p>
<p><strong>ये दीन के ताजिर(व्यापारी), ये वतन बेचने वाले</strong></p>
<p><strong>इंसान की लाशॉं का कफन बेचने वाले</strong></p>
<p><strong>ये महलों में बैठे हुए क़ातिल ये लुटेरे</strong></p>
<p><strong>कांटॉ के इवज़ रूहे-चमन बेचने वाले</strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong>तू इनके लिए मौत का पैग़ाम बनेगा</strong></p>
<p><strong>इंसान की औलाद है इंसान बनेगा</strong></p>
<p>और&#8230;</p>
<p>अपने जज़्बात की रौ में बहकर यहां तक आ गया और बहुत सारी बात बाकी है. सो अब क्या ? अब तो बात करने को एक बार और साहिर साहब की बात करनी होगी. सो करेंगे. मतलब अगले हफ्ते ‘आपस की बात’ में होगी फिर से ‘आपस की बात’.</p>
<p>जय-जय.</p>
<p><em>(<strong>दैनिक भास्कर</strong> के रविवारीय परिशिष्ट <strong>रसरंग </strong>में 18 अप्रेल 2010 को प्रकाशित</em>)</p>
<h5>&#8216;<a title="Sahir - 2" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-1/" target="_blank">तुम्हारे शहर में आए हैं हम, साहिर कहां हो तुम</a> (साहिर-1)</h5>
<h5>&#8216;<a title="Sahir - 2" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-2/" target="_blank">तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा</a>&#8216; (साहिर-2)</h5>
<h5>&#8216;<a title="Sahir - 3" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-3/" target="_blank">अल्ला तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम</a>&#8216; (साहिर-3)</h5>
<h5><a title="Sahir-4" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir4/" target="_blank">मैं ज़िंदा हूं यह मुश्तहर कीजिये</a>…(साहिर-4)</h5>
</div>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-2/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>‘तुम्हारे शहर में आए हैं हम, साहिर कहां हो तुम’ (साहिर-1)</title>
		<link>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-1/</link>
		<comments>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-1/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 03 Jul 2010 09:10:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[Cinema]]></category>
		<category><![CDATA[Music]]></category>
		<category><![CDATA[आपस की बात]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दी पोस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[A.R.Kardar]]></category>
		<category><![CDATA[Kaifi Azmi]]></category>
		<category><![CDATA[Prem Dhawan]]></category>
		<category><![CDATA[S.D.Burman]]></category>
		<category><![CDATA[Sahir Ludianvi]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.thebhopalpost.com/?p=275</guid>
		<description><![CDATA[‘तुम्हारे शहर में आए हैं हम, साहिर कहां हो तुम’ राजकुमार केसवानी  इस दुनिया के दस्तूर इस क़दर उलझे हुए हैं कि मैं ख़ुद को सुलझाने में अक्सर नाकाम हो जाता हूं. पता नहीं क्या सही है और क्या ग़लत. ऐसे में जब-जब अपने फैसले ग़लत क़रार दे दिए जाते हैं तो बस मुस्कराकर आस्मान [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="‘तुम्हारे शहर में आए हैं हम, साहिर कहां हो तुम’ (साहिर-1)" link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-1/"><p><strong>‘</strong><strong>तुम्हारे शहर में आए हैं हम, साहिर कहां हो तुम</strong><strong>’</strong></p>
<p>राजकुमार केसवानी <a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/sahir.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-276" title="sahir Ludhianvi " src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/sahir.jpg" alt="" width="300" height="207" /></a></p>
<p>इस दुनिया के दस्तूर इस क़दर उलझे हुए हैं कि मैं ख़ुद को सुलझाने में अक्सर नाकाम हो जाता हूं. पता नहीं क्या सही है और क्या ग़लत. ऐसे में जब-जब अपने फैसले ग़लत क़रार दे दिए जाते हैं तो बस मुस्कराकर आस्मान की तरफ देख लेता हूं.</p>
<p>लेकिन आज के मसले को लेकर मैं आपकी तरफ भी देखना चाहता हूं. बात ऐसी है कि मैं पिछले बहुत दिनों से परेशान सा हूं. कोई दो महीने पहले एक ख़बर सुनी कि मुम्बई में जुहू स्थित कब्रिस्तान में बने मधुबाला, मोहम्मद रफी,नौशाद और साहिर लुधियानवी के मकबरों को मिटा दिया गया है. वजह थी हर रोज़ आने वाले जनाज़ों के दफ्न के लिए जगह की कमी.</p>
<p>कब्रिस्तान के रख-रखाव के ज़िमेदार लोगों का जवाब है कि इस्लामी कानून के तहत यह जायज़ है. दूसरे सरकार से बार-बार के तक़ादे के बावजूद पास ही ख़ाली पड़ी ज़मीन उन्हें अलाट नहीं की जा रही है.</p>
<p>अब आप ही बताइये अपनी ज़िन्दगी के इन सहारों के निशानात तक उजड़ जाने की शिकायत किससे करूं ?</p>
<p>आस्मान से ?</p>
<p>वो तो करके देख चुका हूं. वहां से तो जवाब में भी एक मुस्कराहट ही मिली है, जिसका मतलब पता नहीं मैने क्या समझा है और पता नहीं है क्या.</p>
<p>ख़ैर. जैसी उसकी मर्ज़ी. मेरे पास सिवाय सब्र के कोई रास्ता नहीं. बल्कि सब्र के साथ अपने हिस्से का काम करने के. सो करता हूं.</p>
<p>.<strong>..जो ज़िन्दगी भर कम सोया</strong><strong> </strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p>अब से कोई 75 बरस पहले एक बहादुर औरत अपने 13 साल के बच्चे के साथ अपने पतित और अत्याचारी पत्ति का महलनुमा घर छोड़कर एक मामूली से मकान में रहने चली आई. यह घर रेल पटरी के पास था. जब कभी ट्रेन पटरी पर दौड़ती तो उसकी थरथराहट से सारा घर साथ ही कांपने लगता था. आसपास बसी कोयले बीनने वाली औरतों और दीगर मज़दूरी करने वालों की झुगियां भी इसके ज़द में आतीं.</p>
<p>यह सब मेरी इस उम्र से बहुत पहले की बात है लिहाज़ा मैं वहां मौजूद तो न था. लेकिन हां, अपने बाप के उस ठाठदार घर से बाहर निकलकर आए हुए उस 13 साल के बच्चे की हालत को लेकर तरह-तरह के क़यास लगाता रहा हूं. इनमें से एक हकीक़त के ज़्यादा करीब लगता है. ‘बच्चा डरकर मां से चिपट जाता था और ट्रेन की आवाज़ दूर तक ओझल हो जाने के बाद ख़ौफज़दा आंखों में ढेर सारे सवालों के साथ से मां को निहारता था’.</p>
<p>यह मुझे इसलिए ठीक लगता है कि जब इस बच्चे ने आगे चलकर अपनी उम्र में कामयाबी हासिल की. दौलत कमाई. महल बनाए. शोहरत की बुलन्दी पर बैठा रहा, तब भी उसने अपनी मां का दामन न छोड़ा. और जब मां ने एक दिन दामन छुड़ा ही लिया तो उसने भी इस दुनिया से किनारा करने में बहुत देर नहीं की.</p>
<p>इस बच्चे का जब जन्म हुआ था तो बाप ने नाम रखा था अब्दुल हई. ख़ुद ने होश सम्हाला तो उसने अब्दुल हई होने की जगह ख़ुद को ‘साहिर’ बना लिया. साहिर मतलब जादूगर. लुधियाना का यह ‘साहिर’ शब्दों का जादूगर था. और ऐसा जादूगर कि उसका जादू आज भी ज़माने के सर चढ़कर बोलता है. ऐसे में ही ज़बान से निकल जाता है : वाह! साहिर लुधियानवी, वाह!’.</p>
<p>एक मिनट. मुझे लगता है कि अब ज़रा इस बात को एकदम पहले सिरे से ही शुरू करूं. तो बात ऐसी है कि लुधियाना के अमीर ज़मींदार थे फज़ल दीन. बहुत ही ऐयाश और ज़ालिम तबीयत इंसान. 8 मार्च 1921 को उनकी पत्नी सरदार बेगम ने एक बच्चे को जन्म दिया. जब उन्हें मालूम हुआ कि उनके घर में बेटे की आमद हुई है तो वह बहुत ख़ुश हुए. यह ख़ुशी हर मां-बाप को होने वाली ख़ुशी से कुछ अलग थी.</p>
<p>किस्सा यूं है कि फज़ल दीन का अब्दुल हई नाम के एक व्यक्ति से ज़बर्दस्त दुश्मनी थी. वह व्यक्ति पंजाब का एक बहुत ही ताकतवर नेता था, जो पड़ोस में ही रहता था.फज़ल दीन उसको मिटा देना चाहता था लेकिन उसका बस न चलता था. सो बेटे की ख़बर मिली तो उसने फौरन उसका नाम रख दिया अब्दुल हई. इसके बाद हर कभी अपने ही बेटे को ऊंची आवाज़ में, पड़ौसी को सुनाकर, पंजाबी की मोटी-मोटी गालियां देता और ख़ुश होता कि उसने अपने दुश्मन को ज़लील कर लिया.</p>
<p>ऐसे ज़ालिम और क्रूर इंसान के साथ सरदारी बेगम का निबाह भी कितने दिन होना था ? ख़ासकर तब जब वह आए दिन शादियां करने का शौक़ रखता हो. फज़ल दीन ने कुल मिलाकर 14 शादियां कीं. सो आख़िर एक दिन तलाक़ लेकर सरदार बेगम अपने बच्चे के साथ घर छोड़ आई.</p>
<p>हई, फज़ल दीन का इकलौता बेटा था, सो उसका जाना उसे मंज़ूर न था. जब अदालत ने फैसला मां के पक्ष में दिया तो उसने बच्चे को ज़बर्दस्ती छीनने और नाकाम होने पर बच्चे को मार डालने तक का ऐलान कर दिया. ऐसे में उस लाचार मगर मज़बूत इरादे वाली मां सरदारी बेगम ने अपने बच्चे को किसी घड़ी अकेले न रहने दिया.</p>
<p>मैं इस जगह आपसे अपनी तरफ से एक बात कहना चाहता हूं. इस सारे घटनाक्रम और हालात पर ज़रा ग़ौर करें और सोचें इस वक़्त उस बच्चे के दिल-दिमाग़ पर किस तरह के असर पड़ रहे होंगे. हर वक़्त ख़ौफ और दहशत के साए में जीने वाला यह बच्चा बड़ा होकर किस मनोविज्ञान का मरीज़ होगा ?</p>
<p>इसका जवाब उन सब लोगों के पास मौजूद है जिन्होने साहिर को उसकी कामयाबी के दौर में देखा. वे कभी अकेले बाहर नहीं जाते थे. कभी सरदार जाफरी तो कभी जां निसार अख़्तर. मगर किसी न किसी का साथ होना ज़रूरी था. वरना घर पर ही ‘मां जी’ के पास रहना पसन्द करते.</p>
<p>चलिए. यह तो हम थोड़ा कहानी की उस हद से बाहर चले आए. हम तो अभी साहिर के उस मुश्किल उम्र की बात कर रहे थे जब उसके अन्दर के शायर ने पहली बार अन्दर से आवाज़ दी तो नज़्म की सूरत में लफ्ज़ निकले – ‘कसम उन तंग गलियों की जहां मज़दूर रहते हैं’.</p>
<p>भूख,ग़रीबी,लाचारी से भरी इन्हीं तंग गलियों से निकल कर साहिर लुधियाना के खालसा हाई स्कूल और फिर गवर्नमेंट कालेज में तालीम हासिल करते रहे. जिस्म के साथ तमनाएं भी जवान होती चली गईं. शायर थे सो अपनी ग़ज़लों और नज़्मों के नाम से लड़कियों में ख़ासे पापुलर थे.</p>
<p>इस अहसास के साथ कौन होगा जिस पर आशिक़ी का रंग न चढ़े. सो चढ़ा. और ख़ूब चढ़ा. ख़ूब इश्क़ हुए. पहले पहल प्रेम चौधरी. जिसके बाप शायद काफी ऊंचे ओहदे पर थे और उन्हें यह रिश्ता मज़ूर न था. दिल टूटा. बाद को प्रेम चौधरी की भरी जवानी में ही मौत हो गई. दिल पर एक और चोट हुई. उसी की याद में साहिर ने नज़्म लिखी ‘मरघट’.</p>
<p>फिर आई, लाहौर की ईशर कौर. दोनो का बहुत वक़्त साथ गुज़रा. फिर साहिर 1949 में बम्बई चले गए तो ईशर कौर वहां भी जा पहुंची, मगर साहिर शादी का फैसला न कर सके. उसके बाद अमृता प्रीतम. यहां भी इज़हारे-इश्क़ अमृता जी की तरफ से ही मज़बूती से होता रहा.</p>
<p>उसके बाद तो न जाने कितने नाम हैं. लेकिन एक मामला ऐसा भी था जिसमें बात मंगनी और शादी तक पहुंच गई थी. बकौल उनके बचपन के  एक दोस्त, पाकिस्तान के मशहूर कालम नवीस हमीद अख़्तर, साहिर की मंगनी उर्दू की कहानीकार हाजरा मसरूर से हो गई थी. मां से इजाज़त लेने के लिए भी इसी दोस्त को आगे किया. मां ने भी अपनी मंज़ूरी दे दी. मगर फिर न जाने क्या हुआ और साहिर ने अपना इरादा बदल दिया.</p>
<p>अगर इश्क़-ओ-मोहब्बत में ये आलम था तो ज़िन्दगी के बाकी कामों में भी हालात इससे बेहतर न थे. बड़े से बड़े और मामूली से मामूली फैसलों में भी अटक जाते और किसी दोस्त की मदद दरकार होती.</p>
<p>1943 में साहिर अपनी शायरी का पहला संकलन ‘तल्ख़ियां’ छपवाने लाहौर जा पहुंचे थे. ‘तल्ख़ियां’ के छपने में दो साल लग गए. इसी बीच वे बतौर सम्पादक उर्दू पत्रिका ‘अदबे-लतीफ’, ‘शाहकार’ और ‘सवेरा’ के लिए काम करते रहे. बंटवारे के वक़्त भी वे पहले लाहौर में ही रहे. ‘सवेरा’ में अपनी तल्ख़ कलम से पाकिस्तान सरकार को इस क़दर नाराज़ कर दिया कि उनके ख़िलाफ गिरफतारी वारंट जारी हो हो गया.</p>
<p>साहिर लाहौर छोड़कर दिल्ली आ गए. और फिर अपने ख़्वाब को हक़ीक़त में बदलने बम्बई जा पहुंचे. उनका ख़्वाब था फिल्मों में गीत लिखना. और सिर्फ गीत लिखना ही नहीं सबसे आला किस्म के गीत लिखना.</p>
<p>बम्बई और ख़ासकर बम्बई की फिल्मी दुनिया यूं तो हज़ारों संगदिली की दास्तानों की खान है लेकिन हर कहानी का अंजाम इस दुनिया में न हुआ है और न होगा. सो साहिर की कहानी काफी ख़ुशगवार कहानी है. 1948 में एक फिल्म बनी थी ‘आज़ादी की राह पर’. इस फिल्म में साहिर के 4 गीत थे. पहला गीत था ‘ बदल रही है ज़िन्दगी, बदल रही है ज़िन्दगी’.</p>
<p>1951 में ए.आर.कारदार की फिल्म ‘नौजवान’ में संगीतकार एस.डी.बर्मन ने उन्हें पूरी फिल्म लिखने का मौका दिया. नतीजा है आज तक सदाबहार गीतों में शामिल लत्ता मंगेशकर ‘ठंडी हवाएं, लहरा के आएं ‘.</p>
<p>1945 में ‘तल्ख़ियां’ के प्रकाशन ने साहिर को बतौर शायर काफी ऊंचा रुतबा दे दिया था. बम्बई पहुंचे तो गीतकार प्रेम धवन जो पहले से फिल्मों में जमे हुए थे, साहिर के मददगार बनकर सामने आ गए. साहिर कोई चार महीने तक प्रेम धवन के घर पर टिके रहे. इधर प्रेम धवन साहिर का संग्रह ‘तल्ख़ियां’ लेकर निर्माताओं और संगीतकारों को मौका देने की सिफारिश करते रहे. इसी कोशिश का नतीजा था फिल्म ‘दोराहा’ में साहिर का इकलौता गीत ‘मोहब्बत तर्क की मैने गिरेबां सी लिया मैने / ज़माने अब तो ख़ुस हो ज़हर ये भी पी लिया मैने’(तलत महमूद). इस फिल्म के बाकी सारे गीत प्रेम धवन पहले ही लिख चुके थे.</p>
<p>अब इसके बाद तो साहिर ने क्या किया, यह तो इतिहास है. कभी न भुलाया जा सकने वाला इतिहास. अगली बार उसी इतिहास के साथ याद करेंगे साहिर की ख़ूबसूरत शायरे से भरे गीतों को.</p>
<p>और&#8230;</p>
<p>और यह कि ऊपर जो लाईन आपने पढ़ी वो कैफी आज़मी जी ने साहिर साहब की मौत पर लिखी उनकी ग़ज़ल का मतला है.</p>
<p><strong>तुम्हारे शहर में आए हैं हम, साहिर तुम कहां हो ?</strong><strong> </strong></p>
<p><strong>ये रूह-पोशी तुम्हारी है सितम, साहिर कहां हो तुम ? </strong><strong> </strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p>अगले हफ्ते हम मिलकर ढूढेंगे साहिर के हर मुमकिन निशान को. हर मुमकिन बात को. तब तक. जय-जय.</p>
<p><em>(<strong>दैनिक भास्कर</strong> के रविवारीय परिशिष्ट <strong>रसरंग</strong> में 11 अप्रेल 2010 को प्रकाशित)</em></p>
<h5>&#8216;<a title="Sahir - 2" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-1/" target="_blank">तुम्हारे शहर में आए हैं हम, साहिर कहां हो तुम</a> (साहिर-1)</h5>
<h5>&#8216;<a title="Sahir - 2" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-2/" target="_blank">तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा</a>&#8216; (साहिर-2)</h5>
<h5>&#8216;<a title="Sahir - 3" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-3/" target="_blank">अल्ला तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम</a>&#8216; (साहिर-3)</h5>
<h5><a title="Sahir-4" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir4/" target="_blank">मैं ज़िंदा हूं यह मुश्तहर कीजिये</a>…(साहिर-4)</h5>
</div>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-1/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>3</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>What a fall!</title>
		<link>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/what-a-fall/</link>
		<comments>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/what-a-fall/#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 01 Jul 2010 05:27:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>rkeswani</dc:creator>
				<category><![CDATA[Bhopal Gas Tragedy]]></category>
		<category><![CDATA[News]]></category>
		<category><![CDATA[Special]]></category>
		<category><![CDATA[Bhopal District Court]]></category>
		<category><![CDATA[Fali S.Nariman]]></category>
		<category><![CDATA[Judge M.W.Deo]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.thebhopalpost.com/?p=246</guid>
		<description><![CDATA[What a fall! By Raajkumar Keswani He is an “Angel’ who fell in Bhopal 25 years back, without any realisation about his fall. He hounded all those who talked about his fall, till the realisation dawned upon him 25 years later. One of our leading jurists, Fali S.Nariman, regrets his decision of accepting the Union [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="What a fall!" link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/what-a-fall/"><p><strong>What a fall!</strong></p>
<p><em>By Raajkumar Keswani </em></p>
<p><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/falisnariman_lawyerr.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-247" title="falisnariman_lawyerr" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/falisnariman_lawyerr-300x200.jpg" alt="" width="300" height="200" /></a></p>
<p>He is an “Angel’ who fell in Bhopal 25 years back, without any realisation about his fall. He hounded all those who talked about his fall, till the realisation dawned upon him 25 years later.</p>
<p>One of our leading jurists, Fali S.Nariman, regrets his decision of accepting the Union Carbide brief in Bhopal gas disaster case of 1984. He sounds candid enough to acknowledge that he had no ‘foreknowledge’ of everything of the case while accepting the civil liability case. He said in a recent interview to Karan Thapar on CNN-IBN; “I&#8217;m a fallen angel in Bhopal episode.’</p>
<p>How this statement suddenly brings back a few disturbing images of the past, when the angel in question was playing the devil’s drummer in the Bhopal district court.</p>
<p>It was May 6, 1987. District judge M.W.Deo, was in the chair, hearing the 3 billion dollar civil suit filed by the Government of India against Union Carbide. It was a business, like any other day till the group of Union Carbide Corporation lawyers made an unexpected move.  The Lead counsel for Union Carbide Corporation, USA, Fali S. Nariman dropped a bomb by moving an application before the judge.</p>
<p>It asked the judge ‘…to rescue himself from further participation in the case and disassociate himself from the case’.  He said ‘that pending disposal of their application, …no further directions be given nor proceedings taken before his hounor judge Deo.’</p>
<p>The judge, aghast with an expression of hurt on his face, however, informed the defence lawyer Fali S.Nariman, in a firm tone that it was for the first time that he was hearing about such an application. He said ‘…if a party thinks the judge is biased it should approach the higher court for transfer of the case to some other court.’</p>
<p>Sticking to his guns Nariman launched another blunt attack on the judge. ‘We want to give you first opportunity of disassociating yourself from the case.’</p>
<p>The judge, however did not allow himself to get bullied by this arrogant carbide move. He went ahead with the case after advising the defence lawyer to move the higher court.</p>
<p>This is what this ‘Fallen Angel’ did in those years of Carbide case. A case, he had no foreknowledge of all facts while accepting the brief. Once he had the full knowledge, he adopted an aggressive posture to defend his client, who refused to pay the proper compensation to the victims of Bhopal but never did refuse to compensate its lawyers ‘properly.’</p>
<p>I do remember Fali Nariman landing in Bhopal as Carbide’s lead senior advocate and appearing in the district court with his equally expensive lawyer colleagues with a sense of pride on their faces. I, as a reporter covering the Bhopal gas case, have been a witness to the impact of the presence of these imminent lawyers from legal skies.</p>
<p>Everyone in the court campus was quite attentive and focused towards the court room of the District Judge. Everyone, amazingly, was trying to behave out of his or her character to match the manners of the visiting legal eagles from metros. They were the faces hitherto heard and seen on the front pages of the newspapers.</p>
<p>Visitors too were all aware about the value and impact of their presence on the scene. They did not disappoint their watchers either. They did talk from their high pedestal even while defending the red handed Carbide.</p>
<p>They, Fali S.Nariman, along with Bomi Zaiwala , Anil Deewan and half a dozen other lawyers, without any doubt were well prepared, equipped and charged vis-à-vis the victim’s side represented by the Government of India. Initially, there was some glare on this side too with Attorney-General K.Parasaran participating in the case. However, his presence would not deflect the Carbide lawyers from displaying their contempt during the hearing of the case.</p>
<p>Journalists covering the case still reminisce about the attitude of these high profile lawyers in general and Fali in particular. The lawyer, with a great background of being a human rights activist, who quit Additional Solicitor General’s job to protest the imposition of the Emergency in June 1975, was on the wrong side of the issue this time.</p>
<p>‘Champion of the Human Rights’ till the other day, unfortunately, chose to side with the perpetrators of the genocide in Bhopal.</p>
<p>Judge Deo remained the main target for Carbide lobby and Fali was the firing machine for the purpose. The reason of the ire was Judge Deo’s passing an order for an interim relief package of Rs. 350 crores for the victims. The judge was impressed the plea of the victim’s organizations that there was an urgent need to help the survivors of the disaster.</p>
<p>UCC did create a situation of  a legal chaos in the case. Their delaying tactics at every level forced the Madhya Pradesh High Court to intervene. The court asked in a suo<em> moto </em>order in November 1987 why it should not try the case in place of the Bhopal district court ‘to avoid any delaying tactics’ of the UCC.</p>
<p>But that was not to be. Since master of the game was playing the captain of the Carbide   lawyers team. The captain, Fali Nariman, regrets it today. But as my friend Bharat Desai asks: ‘Fali, after 25 years, what’s the Nariman Point?</p>
<p>And to close, I would borrow from Fali Narimans recently published autobiography ‘Before Memory Fades’. In a chapter dealing with Bhopal episode he talks of the criticism and controversies he had to face in the wake of accepting the Carbide case. He quotes Oliver Cromwell to speak for him at the beginning of the chapter, who had commissioned his portrait by a leading artist of his times:</p>
<p>&#8220;Mr Lely, I desire you would use all your skill to paint my picture truly like me, and not flatter me at all; but remark all these roughness, pimples, warts and everything as you see me, otherwise I will never pay a farthing for it.&#8221;</p>
<p>I hope, he would pay me for painting him the way he desired. However, let me be candid about my fees: ‘Fali Baba, I won’t accept any fees with red finger prints of Union Carbide. Yes, there is a way to compensate me and rest of the Bhopal gas victims. Give up on the past and stand up for us. It will give you some solace too.’</p>
<p><a href="mailto:rkeswani100@gmail.com">rkeswani100@gmail.com</a></p>
</div>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/what-a-fall/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>23</slash:comments>
		</item>
	</channel>
</rss>

