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	<title>The Bhopal Post &#187; आपस की बात</title>
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		<title>यह मुग़ल-ए-आज़म है, सलीम-ए-आज़म नहीं</title>
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		<pubDate>Mon, 20 Sep 2010 10:40:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मुग़ल-ए-आज़म &#8211; 2 राजकुमार केसवानी मित्रों, पिछली बार बात ख़त्म करनी थी तो मैने ‘मुग़ल-ए-आज़म’ का प्रीमियर करवा दिया, लेकिन ऐसा थोड़े ही है कि बात पूरी हो गई. अभी तो बहुत बाकी है. तो चलिए, आज बात यह की जाए कि आख़िर इस फिल्म को बनने में इतने सारे बरस क्यों लग गए. सबसे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="यह मुग़ल-ए-आज़म है, सलीम-ए-आज़म नहीं " link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/09/mughal-e-azam-2/"><p><strong>मुग़ल-ए-आज़म &#8211; 2</strong></p>
<p><em>राजकुमार केसवानी</em> <a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/09/Madhu-Mughal.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-592" title="Madhu-Mughal" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/09/Madhu-Mughal-300x274.jpg" alt="" width="300" height="274" /></a></p>
<p>मित्रों, पिछली बार बात ख़त्म करनी थी तो मैने ‘मुग़ल-ए-आज़म’ का प्रीमियर करवा दिया, लेकिन ऐसा थोड़े ही है कि बात पूरी हो गई. अभी तो बहुत बाकी है. तो चलिए, आज बात यह की जाए कि आख़िर इस फिल्म को बनने में इतने सारे बरस क्यों लग गए.</p>
<p>सबसे पहले तो सवाल था पैसे का. पैसे का जुगाड़ जमा तो दूसरा सवाल था ; मरहूम चन्द्रमोहन की जगह अकबर की भूमिका कौन करे. ख़ैर, यह सवाल भी थोड़ी बहुत उलझन के बाद सुलझ गया और पृथ्वीराज कपूर आ गए. 50 के दशक के आते-आते सप्रू का बाज़ार और चेहरे का हुस्न ढलान पर था सो आसिफ को सलीम भी नया चाहिये था. आसिफ को दिलीप कुमार की सूरत में अपना सलीम दिखाई दे गया. हालांकि आसिफ और दिलीप कुमार की बहुत दोस्ती थी लेकिन शुरू में दिलीप कुमार ने इंकार कर दिया. वजह यह कि उन्हें ख़ुद के चेहरे में कहीं भी शहज़ादा सलीम वाली कोई बात नज़र नहीं आ रही थी. तमाम बहस-मुबाहिसे के बाद दोस्ती की जीत हुई और दिलीप साहब ने यह रोल स्वीकार कर लिया.</p>
<p>जहां तक सवाल था जोधा बाई के रोल का तो पहली फिल्म में भी यह रोल दुर्गा खोटे ही कर रही थीं और नई फिल्म में भी उन्हीं को इस रोल के लिए चुना गया. लेकिन दो और खास किरदार थे बहार और दुर्जन सिंह का. तो पहला रोल मिला निगार सुल्ताना को और दूसरा रोल मिला अजीत को.</p>
<p>इसमें एक मज़े की बात है. आसिफ बहुत ही महीन कातने वाले इंसान थे. उन्होने फिल्म हर छोटे से छोटे किरदार का आडीशन ख़ुद किया. दुर्जन सिंह वाले रोल के लिए पहली बार, मतलब अधूरी छूटी फिल्म, के लिए अजीत और अभिनेता सुरेश का टेस्ट लिया गया और दोनो ही रिजेक्ट हो गए. उस समय यह रोल मिला था हिमालयवाला नाम के अभिनेता को जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए. इस बार जब फिल्म शुरू हुई तो अजीत को मौका मिल गया. और अजीत ने क्या ख़ूब मौके का फायदा उठाया.</p>
<p>धीरे-धीरे सारी टीम जुट गई लेकिन नरगिस की जगह अनारकली कौन हो, इस सवाल का जवाब ढूंढते-ढूंढते आसिफ और उनकी टीम को एक ज़माना लग गया. हालांकि आख़िर में जैसा कि हम सब जानते हैं मधुबाला अनारकली बनीं लेकिन उससे पहले बड़ा तमाशा हुआ.</p>
<p><strong>अनार ! तुम कहां हो ?</strong><strong> </strong></p>
<p>जब फिल्म बनाने वाला आसिफ जैसा दीवाना हो जो हर काम को परफेक्शन से भी एक कदम आगे की हद तक जाकर करने का आदी हो तो उन कदमों के निशान भी सदियों तक दास्तान बनकर जीते हैं. ऐसी ही एक दास्तान है ‘तलाश-ए-अनारकली’.</p>
<p>आसिफ की तलाश शुरू तो हुई फिल्मी दुनिया से ही लेकिन आगे जाकर यह सारे ज़माने तक फैल गई. न जाने कितनी-कितनी नामचीन हीरोइनो को बुलाया गया और रिजेक्ट किया गया. इस बात को लेकर अप्रेल 1951 की ‘फिल्म इंडिया’ नाम की पत्रिका में पूरे एक पेज की रिपोर्ट छपी हुई है कि किस तरह हीरोइनें आसिफ को हर तरह से रिझाकर, उसकी चिरोरियां करके अनारकली बनने पर उतारू हैं.</p>
<p>आसिफ यूं भले ही बड़े शौक़ीन इंसान थे लेकिन अपने काम में एक रत्ती भर का समझौता नहीं करते थे, फिर चाहे दिलीप कुमार जैसा जिगरी दोस्त ही सामने क्यों न हो. शूटिंग के दौरान जब दिलीप कुमार ने शिकायत की कि पृथ्वीराज के संवाद इतने तगड़े हैं कि उसकी सलीम वाली भूमिका दब रही है. आसिफ का जवाब था – ‘मैं मुग़ल-ए-आज़म बना रहा हूं सईम-ए-आज़म नहीं.’</p>
<p>अब ऐसा इंसान आख़िर किसी हीरोइन के चक्कर में आकर कैसे अपनी फिल्म से समझौता करता सो नहीं किया. जुलाई 1951 में हिन्दुस्तान की हीरोइनों से नाउम्मीद होकर आसिफ ने हालीवुड की उस दौर में बेहद मशहूर हीरोइन रीत्ता हेवर्थ को तार भेजकर अनारकली की भूमिका के लिए निमंत्रण भेजा लेकिन बात नहीं बनी.</p>
<p>आसिफ ने अब हिन्दुस्तान के घरों से अपनी अनारकली की तलाश शुरू की. अखबारों में विज्ञापन देकर नई लड़कियों को किस्मत आज़माने का मौका दिया गया. भोपाल,लखनऊ, दिल्ली और हैदराबाद जैसे शहरों में ख़ूब इंटरव्यू हुए लेकिन आसिफ के ख़्वाबों की अनारकली कहीं नहीं मिली.</p>
<p>मधुबाला को लेकर आसिफ पहले भी सोच चुके थे लेकिन उसके बाप अत्ताउल्ला ख़ान के रवैये की वजह से काफी हिचकिचाहट थी. आख़िर को दिलीप कुमार के दख़ल से बात बन गई. अनारकली को आख़िर उसकी आत्मा मिल गई और आसिफ को उसकी अनारकली.</p>
<p>अब बात आई संगीतकार की. पहले वाली फिल्म में आसिफ ने संगीतकार लिया था अनिल बिस्वास को. इस बार उनने इरादा किया नौशाद को लेने का. नौशाद साहब भी दिलीप कुमार की तरह पहले इंकार करते रहे लेकिन आख़िर को आसिफ की मज़बूत इरादे के आगे हार गए.</p>
<p>नौशाद साहब का फिल्म न करने का कारण यह नहीं था कि उन्हे संगीत कम्पोज़ करने में कोई तक़लीफ होती. उसकी वजह थी ख़ुद के. आसिफ, जिसकी दीवानगी से नौशाद साहब काफी ख़ौफ खाते थे. दीवानगी, जिसे उन्होने आसिफ के बम्बई में शुरूआती दौर में देखा था. मेरे मित्र रफी शब्बीर ने किसी वक़्त मुझे मुग़ल-ए-आज़म को लेकर नौशाद साहब का एक पुराना लेख दिया था. इसमें उन्होने आसिफ को लेकर जिस तरह बयान किया है सोचता हूं उन्हीं की ज़ुबानी आपको सुना दूं.</p>
<p>“ उस ज़माने में ख़ुदादाद सर्कल दादर में चरित्र अभिनेता जीवन और प्रेम अदीब ने पार्टनरशिप में ये होटल खोला था. इसी होटल में रात के वक़्त अक्सर के आसिफ भी बैठते थे. आसिफ साहब अपने मामू नज़ीर साहब के साथ रहते थे और नज़ीर साहब ने आसिफ साहब को दादर में दर्जी की दुकान खुलवाई थी, अक्सर हम साथ बैठते तो के.आसिफ बड़ी-बड़ी बातें करते. कहते क्या फिल्में बन रही हैं, फिल्में मैं बनाऊंगा. हम कहते – ‘यार तुम बेकार की बातें क्यों करते हो, तुम्हारा काम कपड़े सीना है. कपड़े सीते रहो. के. आसिफ जवाब देता- ‘यार मुझे तो मामू ने धंधे में फंसा दिया, वरना मेरी मंज़िल तो फिल्म बनाना है.’</p>
<p>ख़ैर साहब, आख़िर को मामू को भी मजबूरन भांजे को फिल्म लाईन में अपने साथ लाना पड़ा. लेकिन आसिफ की मज़िल मामू के सिनेमा से बहुत आगे थी. सो आख़िर को एक दिन यह भी आया कि आसिफ साहब नौशाद के घर फिल्म मुग़ल-ए-आज़म के संगीत के लिए उनके घर जा पहुचे.</p>
<p>चौधरी ज़िया इमाम की पुस्तक ‘नौशाद- ज़र्रा जो आफताब बना’ में उस मंज़र को इस तरह बयान किया गया है. ‘एक दिन नौशाद साहब अपने घर में एक फिल्म की मौसीकी पर काम कर रहे थे तभी उनसे मिलने के. आसिफ आए और कहने लगे ; ‘मैं एक फिल्म बनाने जा रहा हूं.’ इस पर नौशाद साहब ने पूछा – ‘कौन सी फिल्म बना रहे हो?’ तो उन्होने कहा – ‘मुग़ल-ए-आज़म और इस फिल्म की मौसीकी आप ही को देनी है.’ नौशाद साहब ने कहा – ‘अभी मेरे पास वक़्त नहीं है. मैं बहुत मसरूफ हूं और तबीयत भी ठीक नहीं है. आप किसी और मौसीकार से बात कर लें.’ आसिफ साहब ने यह सुना तो एक लाख रुपए का बंडल उनके हारमोनियम पर रखते हुए बोले – ‘यह एडवांस रख लीजिए, मौसी की तो आप ही को देनी है.’ तो नौशाद साहब ने कहा – ‘क्या आप समझते हैं कि पैसे से हर चीज़ ख़रीदी जा सकती है और आप हर चीज़ ख़रीद लेंगे? अपने पैसे उठाइये मैं फिल्म नहीं करूंगा.’</p>
<p>इस पर आसिफ साहब ने चुटकी बजाते हुए कहा – ‘कैसे नहीं करेंगे. इतने पैसे दूंगा कि आज तक किसी ने नहीं दिए होंगे.’ जब आसिफ साहब का इसरार और पैसे की बात बढ़ गई तो इन्होने (नौशाद ने) गुस्से में आकर नोटों का बंडल फैंक दिया. कमरे में नोट ही नोट बिखर गए. इतने में नौशाद साहब की बेग़म नौकर के साथ छत पर आ गईं. उन्होने नौकर के साथ मिलकर नोट समेटे और पूरा माजरा जाना. आसिफ साहब चुटकी बजाते रहे और मुस्कराते रहे फिर नौशाद साहब ने उनसे कहा – ‘अछा आसिफ साहब आप अपने नोट अपने पास रखिए हम फिल्म साथ करेंगे.’</p>
<p>तो यह थी नौशाद साहब की स्टोरी. इसे वे ख़ुद भी कई बार अपने इंटरव्यूज़ के दौरान भी सुना चुके हैं. बहुत ही दिलचस्प अन्दाज़ में. उनकी किस्सागोई सुनते हुए मुझे अक्सर लगता रहा है कि उन्हें कहानीकार भी होना चाहिये था. ख़ैर.</p>
<p>और&#8230;</p>
<p>उस्ताद साअदत हसन मंटो के एक किस्से के साथ आज की बात पूरी. एक बार के.आसिफ मंटॉ को फिल्म की कहानी सुनाने पहुंचे.</p>
<p>‘मैं तुम्हे अपनी कहानी सुनाने आया हू.’ मैने अज़र-राहे मज़ाक़ कहा : ‘तुम्हे मालूम है, मैं फीस लिया करता हूं?’</p>
<p>आसिफ फौरन पलट कर लौट गए. मंटो अफसोस करते रहे कि ख्वामखाह मज़ाक़ कर दिया. थोड़ी देर में एक आदमी ने आकर मंटो को एक लिफाफा दिया जिसमें सौ-सौ के पांच नोट थे. खिड़की से झांका तो नीचे से आसिफ ने आवाज़ दी – ‘फीस हाज़िर है. अब मैं कल आऊंगा.’</p>
<p>अगले दिन  आसिफ आए. कहानी सुनाई. कहानी सुनाकर पूछा – ‘क्या ख़्याल है आपका कहानी के मुत्ताल्लिक?’ मंटो ने कहा ‘बकवास है.’ हैरत से दुबारा पूछा. दुबारा वही जवाब. उसके बाद आसिफ ने उठकर मंटो का हाथ चूमा और कहा ‘ख़ुदा की कसम बिल्कुल बकवास है&#8230; मैं तुमसे यही सुनने आया था.’</p>
<p>तो ऐसे थे आसिफ साहब और ऐसे थे उस्ताद. हम लोगों के लिए कितनी इबरत भरी कहानियां छोड़ गए हैं. वाह !</p>
<p>अब इस घड़ी आपको छोड़कर जाने का मन तो बिल्कुल नहीं है लेकिन आने के लिए जाना तो पड़ेगा. सो बस अगली बार फिर मुग़ल-ए-आज़म की आगे की कहानी. और हम और आप और ये आपस की बात.</p>
<p>जय-जय.</p>
<p>(दैनिक भास्कर के रविवारीय रसरंग में 29 अगस्त 2010 को प्रकाशित)</p>
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		<title>अफसाने हक़ीकत में इस तरह बदलते हैं&#8230;</title>
		<link>http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/09/mughal-e-azam-1/</link>
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		<pubDate>Sun, 05 Sep 2010 06:07:39 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[मुग़ल-ए-आज़म-1 अफसाने हक़ीकत में इस तरह बदलते हैं&#8230; राजकुमार केसवानी फिल्म ‘मुग़ल-ए-आज़म’ में एक संवाद है ‘वो तीर ही क्या संगतराश, जो दिल के पार न हो. वो बुत ही क्या जिसके आगे मग़रूर सर खुद न झुक जाएं.’ संगतराश – ‘तो फिर मैं एक ऐसा बुत बनाऊंगा, जिसके क़दमों में सिपाही अपनी तलवार, शहंशाह [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="अफसाने हक़ीकत में इस तरह बदलते हैं..." link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/09/mughal-e-azam-1/"><p><em>मुग़ल-ए-आज़म-1 </em></p>
<p><strong>अफसाने हक़ीकत में इस तरह बदलते हैं&#8230;</strong></p>
<p><em>राजकुमार केसवानी </em></p>
<p><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/09/mughaleazam_nargis.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-588" title="mughaleazam_nargis" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/09/mughaleazam_nargis-238x300.jpg" alt="" width="238" height="300" /></a></p>
<p>फिल्म ‘मुग़ल-ए-आज़म’ में एक संवाद है ‘वो तीर ही क्या संगतराश, जो दिल के पार न हो. वो बुत ही क्या जिसके आगे मग़रूर सर खुद न झुक जाएं.’</p>
<p>संगतराश – ‘तो फिर मैं एक ऐसा बुत बनाऊंगा, जिसके क़दमों में सिपाही अपनी तलवार, शहंशाह अपना ताज और इंसान अपना दिल निकालकर रख दे.’</p>
<p>मैं आज ‘मुग़ल-ए-आज़म’ की बात करने वाला हूं. मेरे पास न तो कोई ताज है और न तलवार सो बख़ुशी अपना दिल निकालकर पेश करना चाहता हूं. के.आसिफ नाम के एक जुनूनी इंसान सचमुच एक ऐसे शाहकार के ख़ालिक हैं जिसे देखकर कहा जा सकता है – ‘अफसाने हक़ीक़त में इस तरह बदले जाते हैं.’</p>
<p>50 साल गुज़र चुके हैं और शायद क़यामत से पहले के कुछ हज़ार बरस बाकी हैं. मुझे यकीन है कि जब तलक इस दुनिया-ए-फानी का वजूद रहेगा, तब तलक के.आसिफ का यह अज़ीम-ओ-शान शाहकार, हिन्दुस्तानी सिनेमा के तख्ते-ताऊस पर काबिज़ रहेगा.</p>
<p>आपने देखा ‘मुग़ल-ए-आज़म’ का जादू ? मैं अपनी औक़ात भूलकर बादशाहों की ज़बान बोलने की कोशिश करने लगा. मगर इस फिल्म का नशा ही ऐसा है कि जो चढ़े तो यूं चढ़े कि न चढ़कर उतरे. मेरा तो नहीं उतरता. और न ही कभी उतरेगा. चाहता भी नहीं हूं कि ये उतरे.</p>
<p>सो बस आज की बात इसी आलम में शुरू करता हूं. नशे में आदमी बहुत बोलता है, सो बहुत बोलूंगा. आज भी बोलूंगा. कल भी बोलूंगा. परसों भी बोलूंगा. पता नहीं कब तक बोलूंगा. मगर एक मिनट&#8230; पहले शुरू तो करूं.</p>
<p>हां तो पहले अनारकली की बात करें कि के.आसिफ की ? या फिर पहले फिल्म की ही बात कर लें ? पता नहीं. चलिए, फिल्म से ही शुरू कर देते हैं. और क्या. फिल्म की बात करते-करते ही एक-एक कर सारे लोगों की बात भी हो ही जाएगी.</p>
<p>इस फिल्म के बनने की कहानी असल में शुरू होती है 1922 से. यही वो साल है जिस साल मशहूर ड्रामा नवीस इम्तियाज़ अली ‘ताज’ ने एक नाटक लिखा ‘अनारकली’. हालांकि उर्दू जगत में ‘ताज’ अपने एक मज़ाहिया नाटक ‘चाचा छक्कन’ के लिए बहुत मशहूर हैं लेकिन ‘अनारकली’ पर इतनी फिल्में बनी कि उनका नाम हमेशा के लिए उसी के साथ चस्पा हो गया.</p>
<p>1928 में सबसे पहले निदेशक प्रफुल राय और चारू राय ने इस नाटक पर आधारित मूक फिल्म बनाई ‘द लव्ज़ आफ अ मुग़ल प्रिंस’. इस फिल्म में अनारकली थीं सीता देवी, शहज़ादा सलीम थे सावन सिंह्  और अकबर की भूमिका में थे ख़ुद ‘ताज’.</p>
<p>साइलेंट सिनेमा के इसी दौर में, इसी साल निदेशक रमाशंकर चौधरी ने सुलोचना (रूबी मेयर्स) को लेकर ‘अनारकली’ नाम से ही फिल्म बनाई. 7 बरस बाद 1935 में दुबारा इसे सवाक फिल्म में तब्दील करके बनाया. 1953 में निदेशक नन्दलाल जसवंतलाल की बेहद कामयाब फिल्म ‘अनारकली’ के नाम से आई. इसमें बीना राय अनारकली, प्रदीप कुमार शहज़ादा सलीम और मुबारक अकबर की भूमिका में थे. इस फिल्म में 1928 और 35 में अनारकली बनी सुलोचना रानी जोधा बाई की भूमिका में नज़र आईं.</p>
<p>अनारकली में संगीतकार सी.रामचन्द्र के संगीत ने ऐसी धूम मचाई कि एक औसत सी फिल्म भी बड़ी लगने लगी. बाक्स आफिस पर बरसते सिक्कों की खनखनाहट फिल्म के गीतों के लिए तालियों की तरह बजती रही. मगर इन सारी बातों से बेफिक्र अपनी धुन में डूबा एक शख्स इन सब से परे आसमान से टकराते हुए ख़्वाब देख रहा था. वो जानता था कि उसे अनारकली नहीं ‘मुग़ल-ए-आज़म’ बनानी है और ‘मुग़ल-ए-आज़म’ बस एक बार बनती है. अनारकली की तरह बार-बार नहीं.</p>
<p>अपने इस हसीन ख़्वाब में डूबे हुए इंसान का नाम था करीमउद्दीन आसिफ. उसके ख्वाब इम्तियाज़ अली ‘ताज’ के अफसाने से कहीं ज़्यादा बड़े और हक़ीक़त से कहीं ज़्यादा रंगीन थे. इसी बेनज़ीर ख्वाब का अंजाम है यह फिल्म, जो बनी तो लगभग 85 फीसदी ब्लैक एण्ड व्हाईट में फिर भी उसमे सारे रंग दिखाई देते थे.</p>
<p>के. आसिफ का जन्म हुआ उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में 14 जून 1922 को. घर में चारों तरफ ग़रीबी इस तरह पसरी हुई थी कि हर सांस के साथ उसका अहसास भी जिस्म में पहुंच जाता था. सो ऐसे में पढ़ना-लिखना तो क्या होता. सो नहीं हुआ. और नन्हे से करीम एक ज़माने तक दर्ज़ी का काम करते रहे. बड़े लोगों के कपड़े सीते-सीते, उसने बड़े-बड़े ख्वाब बुनना भी सीख लिया. और 1942 में बरसों से कान्धे पर सवार ग़रीबी का जुआ उतारकर, अपने हसीन ख्वाबों को लेकर वह बम्बई चल पड़ा.</p>
<p>बम्बई में मामू थे. निर्माता-निदेशक-अभिनेता एस.नज़ीर. रंजीत फिल्म स्टूडियो के ठीक सामने एक अहाते में फ्लैट लेकर रहते थे. भांजा पहुंचा तो एक बिस्तर और लग गया. मामा के साथ उनके असिस्टेंट बनकर फिल्म बनाने का हुनर भी सीखना शुरू कर दिया. और भी बहुत कुछ सीखा, लेकिन उसका ज़िक्र बाद में.</p>
<p>हां तो 1944 में आसिफ को फिल्म ‘फूल’ के निदेशन का मौका मिला. अपनी पहली ही फिल्म को मल्टी स्टारर बना दिया. पृथ्वीराज कपूर, मज़हर ख़ान, अशरफ ख़ान, दुर्गा खोटे,सुरैया, वीना और याकूब थे. फिल्म की कहानी थी कमाल अमरोही की. इसी फिल्म के निर्माण के दौरान ही आसिफ ने कमाल अमरोही से ‘अनारकली’ की कहानी सुनी.</p>
<p>आसिफ के ख्वाबों से इस कहानी का रंग इस क़दर यकसां था कि फौरन ही यह कहानी उसके ख्वाबों का हिस्सा बन गई. मगर इस कहानी का नाम आसिफ के ख़्वाबों से बहुत छोटा था – ‘अनारकली’. सो पहला काम हुआ इस कहानी को सपनो की ऊंचाई से मेल खाता नाम देने का –‘मुग़ल-ए-आज़म’.</p>
<p>इसके बाद शुरू हुई इस अफसाने को हक़ीक़त में बदलने की कहानी. फिल्म ‘फूल’ के निर्माता थे उस दौर के बेहद दौलतमन्द इंसान फेमस स्टूडियो और फेमस फिल्म्स के मालिक हकीम अली शीराज़ी. 1945 में जब ‘फूल’ रिलीज़ हुई तो आसिफ के काम की ख़ासी चर्चा हुई. इसी मौके का फायदा उठाकर आसिफ ने ‘मुग़ल-ए-आज़म’ का किस्सा हकीम साहब से छेड़ दिया.</p>
<p>आसिफ किसागोई के उस्ताद थे. उस्ताद लेखक सआदत हसन मंटो ने लिखा है ‘&#8230;कहानी सुनाने के दौरान वह मदारीपन करता है यानी हस्बे-ज़रूरत वाकियात के उतार-चढ़ाव के साथ ख़ुद भी उतरता-चढ़ता रहता है. अभी वह सोफे पर है, चन्द लम्हात के बाद उसकी पुश्त की दीवार पर. दूसरे लम्हे उसके सर के नीचे है और टांगे ऊपर और धम से नीचे फर्श पर. उसके फौरन बाद कुर्सी पर उकड़ूं बैठा है मगर फिर फौरन उठ खड़ा हुआ है. यूं मालूम होता है कि इलेक्शन में कोई आदमी वोट हासिल करने के लिए तक़रीर कर रहा है.’</p>
<p>अब उस्ताद भले ही आसिफ की इन अदाओं से मुतासिर न हुए हों लेकिन हकीम साहब ख़ूब हुए. उन्होने अपने साले के.अब्दुला के साथ मिलकर फिल्म बनाने का फैसला ले लिया. आसिफ, ज़ाहिर है उसके डायरेक्टर थे. बेहद शाहाना अन्दाज़ में फिल्म शुरू हुई. चन्द्रमोहन बने अकबर, नरगिस अनारकली और शहज़ादा सलीम थे सप्रू जो उस वक़्त खासे मशहूर हीरो थे. एक और अदाकारा की प्रमुख भूमिका थी जिनका नाम था वीणा. ‘फिल्म इंडिया’ के जनवरी 1946 के कवर पर छपे ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के विज्ञापन में नर्गिस और चन्द्रमोहन से पहले इन्हीं का नाम दिया गया है. वीणा की भूमिका मेरे अन्दाज़ से बाद में निगार सुल्ताना ने निभाई है.</p>
<p>फिल्म लगभग 8 रील ही बन पाई थी कि देश का बंटवारा हो गया. हकीम अली शीराज़ी ने पाकिस्तान जाना तय किया. इसकी ख़ास वजह उनका मुहम्मद अली जिन्ना से ख़ासा लगाव था. यहां अपने जमे-जमाए आलीशान कारोबार को छोड़कर जाना पड़ा. उनका फेमस स्टूडियो बिका रूंगटा सेठ के हाथ और लेनदारियां और देनदारियां पहुंचीं पारसी सेठ शापूरजी पालनजी मिस्त्री के पास.</p>
<p>जब तक बंटवारे के ग़र्दो-गुबार से आसमान साफ हुआ तब तक आसिफ का शहंशाह अकबर – चन्द्रमोहन (1949में) इस दुनिया को रुख्सत कह चला. सप्रू का बाज़ार मन्द पड़ चुका था. लेकिन आसिफ के सपने पर इन सारी चीज़ों की ज़रा भी आंच नहीं आई थी. वह फिल्म बनाने को बज़िद था.</p>
<p>इस सारे उथल-पुथल के वक़्फे में खुद ही एक फिल्म प्रोड्यूस कर डाली. 1951 में रिलीज़ हुई इस फिल्म ‘हलचल’ के निदेशक थे एस.के.ओझा और फिल्म की मुख्य भूमिकाओं में थे दिलीप कुमार, नर्गिस और सितारा.</p>
<p>इस फिल्म के फौरन बाद ही शापूरजी को साथ लेकर एक बार फिर से ‘मुग़ल-ए-आज़म’ पर काम शुरू कर दिया. इस बार बदले हुए हालात में नए सितारे थे अकबर की भूमिका में पृथ्वीराज कपूर,सलीम – दिलीप कुमार और मधुबाला आ गईं अनारकली बनकर.</p>
<p>बम्बई के उपनगर अन्धेरी में मोहन स्टूडियोज़ में 1951 में दो फ्लोर पर अगले नौ साल तक इस सर्वकालिक महान हिन्दुस्तानी फिल्म पर काम चलता रहा. बन-बनकर बिगड़ती बातों के बीच आख़िर 1960 में जाकर बात बन ही गई. 4 अगस्त 1960 की शाम बम्बई के नए-नए खुले थियेटर मराठा मन्दिर में प्रीमियर हुआ और उसके बाद से आज तक उस एक इंसान का सपना करोड़ों-करोड़ आंखों में लगातार पल रहा है – एक हक़ीक़त की तरह.</p>
<p>और&#8230;</p>
<p>1951 से 1960 के लम्बे वक़्फे में इतना कुछ घटा कि हर दिन के लिए एक पन्ना भी लिखा जाए तो तीन हज़ार सफे हो जाएंगे. अब तीन हज़ार सफे न सही, तीन हज़ार लफ्ज़ तो कहे ही जाने चाहियें. सो अगली बार घूमेंगे इन नौ सालों के बीच. देखेंगे किस तरह आसिफ ने दुनिया की तमाम मुश्किलों के बरअक्स अपने पुख्ता इरादों से मोहब्बत की इस बेमिसाल दास्तान को उम्मर खय्याम की शायरी में बदल डाला.</p>
<p>जाते-जाते एक छोटा सा किस्सा सुनाऊं ?&#8230;&#8230;&#8230; सुन लो भाई.</p>
<p>याद है, फिल्म में नादिरा यानी अनारकली की एक छोटी बहन सुरैया का रोल था. इस रोल को एक बेहद ख़ूबसूरर लड़की शीला दलाई ने निभाया. शीला उस वक़्त इन्दौर में कालेज की छात्रा थी. वो शूटिंग के समय बुलावे पर बम्बई चली जाती थी. इस वजह से उसके लेक्चर मिस हो जाते थे.</p>
<p>इस मुश्किल से उबरने का तरीका उसने यह खोज निकाला कि वह अपनी ‘आपा’ मधुबाला से हर बार वापसी के वक़्त उनके ढेर सारे आटोग्राफ वाले फोटो ले आती और अपने टीचर्स और उन सहेलियों में बांट देती जो उसकी ग़ैर मौजूदगी में उसके नोटस बनाकर रखती थीं.</p>
<p>दिलीप कुमार ने एक बार उसे छेड़ते हुए पूछा था कि वो उनसे कभी फोटो नहीं मांगती. अब इसका जवाब शीला ने क्या दिया, मुझे नहीं मालूम. मुझे तो बस इतना मालूम है कि इस वक़्त मेरा पेट बहुत ज़ोर से दुख रहा है और अगले एक हफ्ते, या क्या पत्ता कई हफ्ते दुखता रहेगा. मतलब जब तक यह बात पूरी नहीं होगी तो ऐसा तो होना ही है न.</p>
<p>हैं जी ?</p>
<p>जय-जय.</p>
<p><em>(दैनिक भास्कर की रविवारीय पत्रिका &#8216;रसरंग&#8217; में 22अगस्त 2010 को प्रकाशित) </em></p>
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		<title>&#8230;ख़ुदा ख़ैर करे</title>
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		<pubDate>Sun, 29 Aug 2010 02:24:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[&#8230;ख़ुदा ख़ैर करे राजकुमार केसवानी &#160; &#160; एक मान्यता के अनुसार इस सृष्टि में एक ऐसी आत्मा मौजूद है जो हर नए पैदा हुए बच्चे के कान में बारी-बारी से एक हंसाने वाली और एक रुलाने वाली बात कहती है. इसी वजह से हर नया पैदा हुआ बच्चा कभी हंसता और कभी रोता है. मुझे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="...ख़ुदा ख़ैर करे" link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/08/kabban-mirza/"><p><strong>&#8230;ख़ुदा ख़ैर करे</strong><strong> </strong></p>
<p><em>राजकुमार केसवानी <a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/08/razia-sultan.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-573" title="razia sultan" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/08/razia-sultan-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a></em></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>एक मान्यता के अनुसार इस सृष्टि में एक ऐसी आत्मा मौजूद है जो हर नए पैदा हुए बच्चे के कान में बारी-बारी से एक हंसाने वाली और एक रुलाने वाली बात कहती है. इसी वजह से हर नया पैदा हुआ बच्चा कभी हंसता और कभी रोता है. मुझे लगता है इस मान्यता में एक कमी है. वह कमी यह है कि कि वह आत्मा सिर्फ बच्चपन के उस झूले से बाहर भी ज़िन्दगी में हर जगह इसी तरह हंसाती-रुलाती है. आपकी ज़िन्दगी में भी इस बात को मानने के हज़ार कारण मौजूद होंगे और मेरे पास भी हैं ही. कुच्छ अपने, कुच्छ पराए.</p>
<p>ऐसी ही दो कहानियां आज मैं आपको सुनाना चाहता हूं. दोनो कहानियों का पहला हिसा कहते खुशी होती है और दूसरा कहता आंसू बहते हैं. खैर ! शुरू करता हूं. एक थे कब्बन मिर्ज़ा. नहीं, जल्दी न करें. ज़रा सब्र से काम लें. हां, तो कब्बन मिर्ज़ा के नाम से विविध  भारती सुनने वाले लोग तो एक ज़माने से इस नाम से बखूबी वाकिफ होंगे ही मगर बाकी सब भी कमाल अमरोही की फिल्म ‘रज़िया सुल्तान’ के दो अमर गीत ‘ आई ज़ंजीर की झंकार,खुदा खैर करे’ और ‘तेरा हिज्र मेरा नसीब है’ नहीं भूले होंगे. खैयाम साहब के मदहोश कर देने वाले संगीत के साथ दिल की अंतिम गहराई से गूंजकर निकलती हुई एक अनोखी, रुवाबदार और कड़क आवाज़ है जो सीधे आपके दिल की उसी गहराई में जा पहुंचती है, जिस गहराई से वह निकली थी. यह कब्बन मिर्ज़ा साहब की आवाज़ है.</p>
<p>कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ मेरे बचपन या कहूं लड़कपन ( याद ही नहीं आता कब बचपन से लड़कपन की देहरी लांघी और कब इस इस उम्र तक आ पहुंचा. हर गुज़रा हुआ दिन लगता है बचपन का दिन था. हर दिन कुच्छ नादानी अब भी होती है. अगले दिन खुद को बच्चा समझकर माफ कर देता हूं. खैर. ये कहानी फिर सही) की यादों के साथ इस कदर जुड़ी है कि उसके बिना कुच्छ पूरा होता ही नहीं. क्योंकि अब तक की तमाम उम्र रेडियो के साथ ही गुज़री है. आज के दौर में अगर कमल शर्मा,अहमद वसी,ममता शर्मा और यूनुस खान की आवाज़ें हैं तो उस ज़माने में कब्बन मिर्ज़ा के साथ बृजमोहन,दीनानाथ,विनोद शर्मा,देवकीनदन पांडे जैसी खूबसूरत आवाज़ें थीं. संगीत सरिता,हवा महल और छाया गीत जैसे कार्यक्रम दीवाना बनाए रहते थे. उस वक़्त इन आवाज़ों को किसी और तरह या और जगह सोच नहीं पाया था. लेकिन इनमें से कम से कम दो आवाज़ें बाहर भी सुनाई दीं. विनोद शर्मा फिल्म और विज्ञापन में और कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ फिल्मी गीत में. और वो भी ऐसा गीत कि सुनने वाला अगर सोता हो तो चौंककर उठ जाए, जागता हो तो उसे लगने लगे कि उसकी आत्मा ने ही गाना शुरू कर दिया है.</p>
<p>कमाल अमरोही की फिल्में देखने वाले जानते ही हैं कि वे किस कदर दीवानगी में डूबकर फिल्में बनाते थे. कहीं भी एक राई-रती की कमी उन्हें मंज़ूर न होती. सो खैयाम साहब को इल्तमश और रज़िया सुल्तान के ज़माने का पूरा इतिहास पढ़ा डाला. उस दौर में बजने वाले सारे साज़ों की फहरिस्त थमा दी. खैयाम साहब खुद भी कुच्छ कम नहीं थे. सो कदम-कदम पर मेहनत थी. जब सवाल आया कि फिल्म में रज़िया सुल्तान (हेमा मालिनी) के ग़ुलाम और फिर आशिक़ याकूब (धर्मेद्र)  वाला गीत कौन गाए तो गुत्थी ज़रा उलझ गई. कमाल साहब को उस वक़्त मौजूद कोई मरदाना आवाज़ इस काबिल न लगती थी. कि यह गीत गा सके,लिहाज़ा आवाज़ की तलाश 50 से भी ज़्यादा गायको का आडीशन हुआ. नतीजा फिर भी न निकला.</p>
<div id="attachment_574" class="wp-caption aligncenter" style="width: 235px"><em><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/08/Kabban-Mirza.jpg"><img class="size-medium wp-image-574" title="Kabban Mirza" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/08/Kabban-Mirza-225x300.jpg" alt="" width="225" height="300" /></a></em><p class="wp-caption-text">कब्बन मिर्ज़ा</p></div>
<p>इसी नाउम्मीदी के दौर में किसी ने कब्बन मिर्ज़ा का नाम सुझाया. इन साहब ने उन्हें मोहर्रम के दौरान मर्सिये और नोहे (हज़रत इमाम हुस्सैन की शहादत के शोक में में गाए जाने वाले गीत. इसे गाने वाले को नोहेख्वां कहा जाता है). गाते हुए सुना था. तीर एक्दम निशाने पर लगा था. कब्बन मिर्ज़ा को संगीत की बहुत अच्छी समझ थी. वे गाते तो थे ही, बरसो हर सुबह दुनिया को संगीत सरिता के ज़रिए किसी गुणी के साथ संगीत की बारीकियॉ पर चर्चा भी करते ही थे. और सबसे बड़ी बात तो ये कि उनके पास वो आवाज़ ठीक जो किसी गाने वाले के पास न ठीक और न शायद है.</p>
<p>सो पहले एक और फिर दूसरा गाना रिकार्ड हुआ. पहला गीत लिखा जांनिसार अख्तर ने और दूसरा निदा फाज़ली ने. दोनो गीत जब बाज़ार में आए तो धूम मचा दी. कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ का जादू चारों तरफ फैल गया. शायद नौकरी के फेर में उन्हें वक़्त न मिल पाया कि वे फिल्मों में बहुत गा पाते या फिर इस तरह की आवाज़ सिर्फ पार्श्व गीतों में ही काम आ सकती थी. सो जब नौकरी से फुर्सत हुई तो शायद उस आत्मा ने कान. में ऐसी बात कही कि उस पर सिवाय रोने के कुच्छ न कहा जा सके. कब्बन मिर्ज़ा को गले का कैंसर हो गया.</p>
<p>पहली बार जसलोक अस्पताल में इलाज हुआ. फायदा हुआ. घर लौटे. बीमारी भी लौट आई. इस बार आवाज़ ही चली गई. और एक दिन वे खुद भी खामोशी के साथ चले गए.</p>
<p>मुझे अब तक उनकी मौत की सही तारीख नहीं मालूम. सो नहीं लिख रहा. हां, इतना ज़रूर मालूम है कि मीडिया में उनकी कभी खास बात नही हुई. शायद मौत की खबर भी न छपी. कम से कम मैने तो नहीं पढ़ी. एक बार 2003 में ‘इंडियन एक्स्प्रेस्’ ने ज़रूर एक रिपोर्ट  छापी थी. तब वे आवाज़ खो चुके थे और दीवार से टिके घर की छत को आसमान समझकर देखते रहते थे. जब रिपोर्टर उनके घर से लौट रहा था तब कब्बन मिर्ज़ा ने एक पर्ची पर लिखकर दिया था कि उन्होने फिल्म ‘शीबा’ मे अपने गाए गीत के बोल लिखकर बताया कि इस गीत की क्रेडिट में उनका नाम नहीं दिया गया था. मुझे यकीन है बिना उस गीत के भी ऊपर कब्बन मिर्ज़ा के खाते में बहुत सारा क्रेडिट होगा. इतना तो ज़रूर हे कि उनको जन्नत में जगह मिल सके.</p>
<p><strong>(पुनश्च: बहुत खोजबीन के बाद कब्बन मोर्ज़ा की आवाज़ में एक और गीत तलाश पाया हूं. 1964 में रिलीज़ हुई स्टंट फिल्म ‘कैप्टन आज़ाद’ में – आज उनके पा-ए-नाज़ पे सजदा करेंगे हम / उनके बग़ैर जी के भला क्या करेंगे हम.’ इस फिल्म में पीटर-नवाब का संगीत था.)</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><em>(दैनिक भास्कर की रविवारीय पत्रिका ‘रसरंग’ में कालम ‘आपस की बात’ के अंतर्गत 7 अक्टोबर 2007 को प्रकाशित) </em><em> </em></p>
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		<title>एक थे गुलशन नंदा</title>
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		<pubDate>Sat, 21 Aug 2010 12:37:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[एक थे गुलशन नंदा राजकुमार केसवानी एक थे गुलशन नंदा. हिन्दी में पल्प फिक्शन उर्फ लुगदी साहित्य के सबसे ज़्यादा बिकने वाले लेखक. अपने दौर, 60 से लेकर 80 के दशक तक, की दर्जनों सिल्वर जुबिली, गोल्डन जुबिली फिल्मों के लेखक. हिन्दी साहित्यकारों के बीच एक घृणित नाम और उस दौर की युवा पीढ़ी के [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="एक थे गुलशन नंदा " link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/08/gulshan-nanda/"><p><strong>एक थे गुलशन नंदा </strong><br />
राजकुमार केसवानी</p>
<p><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/08/Kati-Patang.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-560" title="Kati Patang" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/08/Kati-Patang-300x292.jpg" alt="" width="300" height="292" /></a></p>
<p>एक थे गुलशन नंदा. हिन्दी में पल्प फिक्शन उर्फ लुगदी साहित्य के सबसे ज़्यादा बिकने वाले लेखक. अपने दौर, 60 से लेकर 80 के दशक तक, की दर्जनों सिल्वर जुबिली, गोल्डन जुबिली फिल्मों के लेखक. हिन्दी साहित्यकारों के बीच एक घृणित नाम और उस दौर की युवा पीढ़ी के आराध्य देव.</p>
<p>यह वह दौर था जब एक तरफ फिल्म ‘मुग़ल-ए-आज़म’(1960) की हीरोइन अनारकली सीना ठोक कर ज़माने के सामने ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ गाकर अपनी मोहब्बत का इज़हार अकेले में आशिक के सामने करती थी और किसी दिन गुलशन नंदा के किसी उपन्यास की हीरोइन की तरह चुपके से उसके साथ भाग भी जाती थी. उस वक़्त के अखबार ऐसी कहानियों से भरे रहते थे. ऐसी ही एक स्टोरी मुझे अब तक याद है. इस खबर में कहा गया था कि जाते समय उसके तेवर थे ‘प्यार किया तो डरना क्या’ और अब लौटकर गा रही है – ‘मोह्ब्बत की झूठी कहाने पे रोये’. दोनो ही गीत फिल्म ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के हैं.</p>
<p>खैर साहब, किस्सा कोत्ताह यह कि नाचीज़ ने भी अपने लड़कपन में गुलशन नंदा की कम से कम दो-एक किताबें तो ज़रूर पढ़ी हैं. इतनी कम इसलिए नहीं कि मुझे उसी उम्र में अछे-बुरे की तमीज़ आ गई और सिर्फ महान लेखकों को ही पढ़ता था बल्कि इसलिए कि मुझे इस नाम से ही खुन्नस थी. उस वक़्त किताबें खरीदकर पढ़ने की हैसियत न थी सो गली-मोहल्ले की छोटी-छोटी लाइब्रेरी से किराये पर लेकर पढ़ते थे. इन लाइब्रेरियों में जिसे देखो गुलशन नंदा की किताब मांगता था. बस इसी बात पर खुन्नस थी. मेरे पसंदीदा लेखक 60 के उस शुरूआती दौर में मुंशी प्रेमचन्द, आचार्य चतुरसेन, गुरुदत्त, कृश्न चंदर, कुश्वाहा कांत, इब्ने सफी बी.ए., वेदप्रकाश काम्बोज वग़ैरह हुआ करते थे. 1967 में हिन्द पाकेट बुक्स की घरेलू लाइब्रेरी योजना और पत्रिका ‘सारिका’ ने इस धारा को पलट दिया. देश-विदेश के महान लेखकों से परिचय हुआ और थोड़ा सा मानसिक विकास भी हुआ. मगर मेरे इस तथाकथित विकास से गुलशन नंदा की सेहत पर ज़रा भी असर न पड़ा. उसकी किताबें पहले से भी ज़्यादा बिक रही थीं. बल्कि इसी वक़्त इन उपन्यासों पर फिल्में भी बनना शुरू हो गई और किताबों की ही तरह हिट भी होने लगी थीं.</p>
<p>आप इन फिल्मों की सूची पर नज़र डालिये. ‘काजल’ (1965), सावन की घटा’ (1966), ‘पत्थर के सनम’(1967), ‘नील कमल’ (1968), ‘खिलोना’ (1970), ‘कटी पतंग’ (1970), ‘शर्मीली’ (1970), ‘नया ज़माना’ (1971), ‘दाग़’ (1973), ‘झील के उस पार’ (1973), ‘जुगनू’ (1973), ‘जोशीला’ (1973), ‘अजनबी’ (1974), ‘भंवर’ (1976), ‘महबूबा’ (1976) वगैरह-वग़ैरह. 1987 में रिलीज़ हुई राजेश खन्ना, श्री देवी की फिल्म ‘नज़राना’ शायद उनकी अखिरी फिल्म थी. 16 नवम्बर 1985 को गुलशन नंदा की मृत्यु हो चुकी थी.</p>
<p><strong>वो भी इक दौर था </strong><strong> </strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p>एक लम्बे समय तक देश भक्ति की प्रबल भावनाओं से ओत-प्रोत स्वतंत्रता संग्राम में जुटे भारतीय समाज को 1947 में आज़ादी नसीब हुई. यह एक ऐसी भावुकता का दौर था जो आज़ादी के बाद भी एक लम्बे अरसे तक कायम रहा. बल्कि कहा जाए तो 1991 में शुरू हुई उदारीकरण के दौर तक यह कायम रहा. 1991 के बाद से भावुकता घोषित रूप से मूर्खता है. बाज़ार द्वारा स्थापित व्यवहारिकता ‘आर्डर आफ द डे’ बन गया है.</p>
<p>ख़ैर, मैं यह बता रहा था कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान और आज़ादे के कोई 40-45 साल तक समाज के अधिकांश संस्कार भावुकता से भरे थे. इसी दौर में मद्रास के जेमिनी, ए.वी.एम., प्रसाद प्रोडक्शंस, जैसे फिल्म निर्माण कम्पनियों ने इस देश के लोगों को सिनेमा घरो में रुला-रुला कर इतना पैसा कमाया है कि यह अन्दाज़ लगाना मुश्किल है कि हर आंसूं की कीमत क्या थी.</p>
<p>इसी दौर में हिन्दी के कुछ लेखक सामने आए जिन्होने जमकर आंसुओं का कारोबार किया. इन लेखकों में दत्त भारती, प्रेमशंकर बाजपेयी, कुशवाहा कांत, राजवंश, रानू के नाम याद किये जाते हैं लेकिन इन सबका सरताज था गुलशन नंदा. यह लेखक बकौल उसके पढ़ने वालों के ‘बहुत रुलाता था’. मगर मुझे लगता है कि उनके पास पूरा ‘मसाला फार्मूला’ था जिसमें बहुत ही सरल भाषा में संयमित सेक्स वार्ता, संस्कार की दुहाई, अमीरी-ग़रीबी, न्याय-अन्याय और प्रेम की सर्वोचता का भाव समिलित था.</p>
<p>अब मिसाल के तौर अर उनकी एक पुस्ताक ‘<strong>जलत्ती चट्टान</strong><strong>’</strong> का यह अंश देखिये, जिसे पुस्तक बेचने को प्रकाशक ने विज्ञापित किया है. ‘<strong>नदी के शीतल जल में दोनो बेसुध खड़े एक-दूसरे के दिल की धड़कने सुन रहे थे. पार्वती का शरीर आग के समान तप रहा था. ज्यों-ज्यों नदी की लहरें शरीर से टकरातीं भीगी साड़ी उसके शरीर से और भी लिपटती जाती, राजन को इन लहरों पर क्रोध आ रहा था</strong>.’.</p>
<p>अब ज़रा एक और मिसाल देखिये. इस बार पुस्तक का नाम है ‘नीलकंठ’.</p>
<p>‘ संध्या और बेला दोनों रायसाहब की बेटियां&#8230;संध्या शांत स्वभाव वाली, जबकि बेला शोख, रंगीन मिजाज। बेला बम्बई में पढ़कर वापस लौटती है तो पाती है कि संध्या और आनन्द एक दूसरे से प्यार करते हैं। लेकिन बेला भी आनन्द को चाहती है। एक दिन बेला को पता चलता है कि संध्या राय साहब की गोद ली हुई पुत्री है तो वह क्रोधित हो यह सब संध्या को बता देती है। संध्या को जब अपनी माँ का पता चलता है तो वह उनसे मिलने गांव पहुँचती है जो कि गरीबों की बस्ती है और संध्या की मां उस गांव में चायखाना चलाती है। इस बीच धोखे से, अपने मोहजाल में फंसाकर बेला आनन्द से विवाह कर बंबई चली जाती है। बंबई में बेला को फिल्मों में काम करने का मौका मिलता है लेकिन आनन्द को यह सब पसन्द नहीं और उसकी हालत पागलों जैसी हो जाती है।</p>
<p>क्या आनन्द का पागलपन दूर हुआ ? क्या बेला एक फिल्म अभिनेत्री के रूप में सफल हो सकी ? क्या संध्या के जीवन में कोई और पुरुष आया ? इन सब जिज्ञासा भरे प्रश्नों का उत्तर आप इस उपन्यास में पा सकते हैं जो कि कलम के जादूगर गुलशन नंदा द्वारा लिखा गया है।‘.</p>
<p>तो साहब ऐसे थे गुलशन नंदा. उनकी पैदाइश की सही तारीख तो मालूम नहीं पर तीस के दशक में उनकी पैदाइश मानी जाती है. 60 के दशक में बतौर लेखक दिल्ली के प्रकाशक एन.डी.सहगल एण्ड संस के ज़रिये सामने आए. कहते हैं उस समय उन्हें एक पुस्तक के मात्र 100-200 रुपए ही मिलते थे. मगर उनकी पुस्तकों की कामयाबी के साथ-साथ उनकी कीमत भी बड़ती गई. एक दौर ऐसा आया कि उनके प्रकाशक उनको मुंहमांगे पैसे पेशगी देने लगे.</p>
<p>सहगल के बाद इनका सम्बंध बना स्टार पाकेट बुक्स के अमरनाथ वर्मा से और उनकी 1 रुपए और 2 रुपए वाली पाकेट बूक्स ने धूम मचा दी. प्रकाशक और लेखक दोनो खुश. 6.5 प्रतिशत की दर से बनने वाली हज़ार की रायल्टी लाखों में जा पहुंची. रिश्ते को एक ठोस आधार देने अमरनाथ जी ने गुलशन नंदा से उनकी बेटी का हाथ अपने बेटे के लिए मांग लिया. दोनो समधी हो गए और रिश्ता सदा के लिए पक्का हो गया.</p>
<p>यह गुलशन नंदा का युग था. फिल्म वालों ने भी उन्हें हाथों-हाथ लिया. राम माहेश्वरी और पन्नालाल माहेश्वरी की फिल्म ‘काजल’ से हिट फिल्मों का ऐसा सिलसिला चला कि रुकता ही न था. गुलशन नंदा का नाम फिल्म की हिट होने की ज़मानत बन गया. 20 साल तक चले इस रिश्ते में फिल्मी दुनिया के सारे दिगज निर्माता-निदेशकों ने इनकी कहानियों और पटकथाओं पर सफल फिल्में बनाईं.इनमें शामिल हैं यश चौपड़ा, शक्ति सामंत, प्रमोद चक्रवर्ती, एल.वी.प्रसाद, रामानन्द सागर.</p>
<p>इस सबके बावजूद गुलशन नंदा के मन में एक टीस थी. वह थी हिन्दी साहित्य में अस्वीकृति की. तमाम सामाजिक स्वीकृति के बावजूद वहां उन्हें स्वीकार नहीं किया गया. और तो और हिन्दी की प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्था हिन्द पाकेट बुक्स ने उन्हे अपने स्तरीय प्रकाशनो के बीच स्थान देने से इंकार की पालिसी बना रखी थी.</p>
<p>70 के दशक में आखिर यह दीवार भी टूटी. हिन्द पाकेट बुक्स ने अपनी हार मानते हुए पाठकों के फैसले का समान करते हुए गुलशन नंदा से प्रकाशन के लिए पुस्तक मांगी. इस बार गुलशन नंदा ने प्रसताव अपनी शर्तों पर ही स्वीकार किया. मुंहमागी अग्रिम राशि ली. पुस्तक के प्रचार की शर्ते मनवाईं. मतलब उनकी हर चीज़ मानी और ‘झील के उस पार’ नामक उपन्यास प्रकाशित किया. इसी पुस्तक पर लगभग पुस्तक के रिलीज़ के आसपास ही 1973 में भप्पी सोनी निदेशित, धर्मेन्द्र-मुमताज़ और योगिता बाली के साथ इसी नाम की फिल्म भी रिलीज़ हुई.</p>
<p>हिन्दी पुस्तक प्रकाशन के इतिहास शायद ही इससे पहले या फिर इसके बाद में इस तरह का प्रोमोशन किसी किताब का हुआ हो. देश भर के अखबारों,पत्रिकाओं,रेडियो पर प्रचार के अलावा होटल,पान की दुकान से लेकर सिनेमाघरों तक बड़े-बड़े प्रचार पोस्टर और खास तौर डिज़ाईन किए गए टांगने वाले बाक्स लगाए गए. इन सब में इस बात पर ज़ोर था कि पहली बार हिन्दी में किसी पुस्तक का पहला एडीशन ही 5 लाख रिपीट पांच लाख कापी का छापा गया है.</p>
<p>अब इस सचाई को तो लेखक और प्रकाशक जाने कि सच में कितनी छपीं मगर इतना ज़रूर सच है कि इस प्रचार के नतीजे में यह पुस्तक जिस क़दर बिकी, उसके बाद शायद ही कोई दूसरी हिन्दी किताब बिकी हो. यह गुलशन नंदा की जीवन का शिखर काल था.</p>
<p>यही वह समय था जब उनकी पुस्तकें अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद होकर उसी धड़ले से बिक रहीं थी. अंग्रेज़ी और अन्य विदेशी भाषाओं में धूम मच गई थी. ‘कटी पतंग’ के चीनी भाषा के अनुवाद ने तो वहां बिक्री के रिकार्ड ही कायम कर दिए.</p>
<p>अछा एक और मज़े की बात बताता हूं. गुलशन नंदा को हमेशा हिन्दी का लेखक कहा और माना जाता है लेकिन सचाई यह है कि नंदा साहब को हिन्दी आती ही नहीं थी. वे तो लिखते ही उर्दू में थे. उनके लिखे को हिन्दी में उनके बहनोई बृजेन्द्र  स्याल बदलते थे.</p>
<p><strong>और&#8230;</strong></p>
<p>और आखिरी बात यह कि दिल्ली में एक चाय बेचने वाला गुलशन नंदा की प्रेरणा से ही खुद भी लेखक बन गया. अब तक उसकी एक दर्जन से ज़्यादा पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और बाकयदा बिकी हैं. इस लेखक का नाम है – लक्ष्मण राव.</p>
<p>मूलत अमरावती रहने वाला 55 वर्षीय लक्ष्मण राव मराठी भाषी है. काम की तलाश में दिल्ली पहुंचा और अब भी दिल्ली में आई.टी.ओ के पास चाय बेचता है. गुलशन नंदा के लेखन से बहुत प्रभावित रहा और 1979 में खुद भी लेखक बन गया. नदी पर नहाने गए एक बचे की डूब जाने से हुई मौत से विचलित इस व्यक्ति ने लेखन को अपनी अभिव्यक्ति का ज़रिया बनाया. जब सारे प्रकाशकों ने पुस्तक छापने से इंकार कर दिया तो खुद ही अपनी प्रकाशन संस्था भारतीय साहित्य कला प्रकाशन के नाम से स्थापित की. अपनी पुस्तकें बेचने वह स्कूल-कालेज में जाता है और उसकी किताबें लोग खरीदते और पढ़ते भी हैं. सो बस लगातार लिखे जा रहा है. इस जज़्बे को सलाम.</p>
<p>अब सच बताऊं चाय का ज़िक्र करते-करते मुझे भी चाय की तलब हो आई है. बहुत देर से नहीं पी. और फिर अपनी बात भी तो पूरी होईच गई न. तो बस फिर क्या है. बोलो बात में बात,हो गई आपस की बात. अगले हफ्ते फिर से होगी, आपस की बात. तब तक.</p>
<p>जय-जय.</p>
<p>(दैनिक भास्कर के रविवारीय परिशिष्ट &#8216;रसरंग&#8217; में पूर्व प्रकाशित) <a></a></p>
</div>]]></content:encoded>
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		<title>छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी</title>
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		<pubDate>Mon, 26 Jul 2010 02:21:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>rkeswani</dc:creator>
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		<description><![CDATA[छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी राजकुमार केसवानी आज एक गुड़िया की बात करते हैं. एक नन्ही-मुन्नी, छोटी सी-प्यारी सी गुड़िया. गुड़िया गाती थी. खूब प्यारा-प्यारा गाती थी. जब दुनिया ने पहली बार उसका गाना सुना तो बिना गले वाले भी गाने लगे. नाच का ना तक न जानने वाले भी नाचने लगे. 1980 के [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी" link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/nazia-hassan/"><p><strong>छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी</strong></p>
<p>राजकुमार केसवानी<a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/nazia-hassan-2.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-440" title="nazia hassan -2" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/nazia-hassan-2-243x300.jpg" alt="" width="243" height="300" /></a></p>
<p>आज एक गुड़िया की बात करते हैं. एक नन्ही-मुन्नी, छोटी सी-प्यारी सी गुड़िया. गुड़िया गाती थी. खूब प्यारा-प्यारा गाती थी. जब दुनिया ने पहली बार उसका गाना सुना तो बिना गले वाले भी गाने लगे. नाच का ना तक न जानने वाले भी नाचने लगे. 1980 के इस साल में चारों तरफ उसका गीत भीनी-भीनी ख़ुशबू बनकर हर घर में महकने लगा. लोग जब एक दूसरे से दुआ-सलाम करते तो यह ख़ुशबू फिर से गीत बनकर गूंजने लगती ‘आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी मे आए, तो बात बन जाए’.</p>
<p>बिल्कुल सही. मैं नाज़िया हसन की ही बात कर रहा हूं. 1980 में फिरोज़ ख़ान की फिल्म ‘क़ुरबानी’ के सर्वाधिक सफल गीत की गायिका. उम्र 15 साल. शक्लो-सूरत उस गुड़िया से मिलती-जुलती जिसे बचपन में कभी एच.सी.जरीवाला के बड़े से शो रूम में कांच की दीवार के साथ बस हमेशा दूर से ही देखता रहा. आवाज़ ऐसी कि सुनकर लगे कि बस अब सारे सपने सच होने वाले हैं.</p>
<p>ऐसी माया और ऐसी काया लेकर अवतरित हुई नाज़िया का छोटा सा जीवन सचमुच इस संसार की सरंचना की कई परतों को खोलकर दिखा देता है. एक तरफ इतनी छोटी सी उम्र में इतनी बड़ी सफलता तो दूसरी तरफ उसी जीवन के अगले ही कदम पर जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी से सामना. नाकाम शादी , उस पर फेफड़े का कैंसर और भरी जवानी मे मौत. ऐसे जीवन के लिए ईश्वर को धन्यवाद दें या फिर सवाल करें कि आख़िर इस खेल से तुझे हासिल क्या होता है?</p>
<p><strong>‘&#8230;लेकिन मेरा दि</strong><strong>ल, मेरा दिल रो रहा है’</strong></p>
<p>मुझे माफ कीजिएगा लेकिन मेरा दिल नाज़िया को नाज़िया से ज़्यादा गुड़िया की तरह याद करता है, सो मुंह से बार-बार गुड़िया ही निकलता है. तो ख़ैर, किस्सा यूं कि नाज़िया का जन्म हुआ 3 अप्रेल 1965 को कराची, पाकिस्तान में. पिता बशीर हसन पाकिस्तान के एक बड़े कारोबारी तो मां मुनीज़ा हसन समाजी कामों के लिए खासी मशहूर औरत थीं.<br />
नाज़िया कच्ची उम्र से ही गीत-संगीत की दुनिया से जुड़ गई. अपने घर-आंगन में छोटॆ भाई ज़ोहेब के साथ गाती-गुनगुनाती नाज़िया इसी दौर में टेलीविज़न के पर्दे पर जा पहुंची. पाकिस्तान के मक़बूल संगीतकार सुहैल  राणा 1968 से पाकिस्तान टीवी (पीटीवी) पर बच्चों का एक संगीत शो ‘कलियों की माला’ के नाम से चलाते थे. 1972 में महज़ सात साल की उम्र से ही भाई-बहन की इस जोड़ी को सुहैल राणा जैसे बड़े संगीतकार की सरपरस्ती मिल गई.</p>
<p>संगीत को लेकर घर में कोई रोक-टोक की बात तो न थी लेकिन पढ़ाई-लिखाई को लेकर मां-बाप और बच्चे ख़ुद भी बहुत ज़्यादा सजग थे. सो संगीत के साथ ही पढाई भी डटकर चलती रही. वह भी लन्दन में. जब दुनिया नाज़िया हसन के डिस्को गीत गा-गा कर दीवानी हो रही थी, यह गुड़िया, ख़ामोश एक कोने मे बैठी अपनी पढ़ाई कर रही थी. इसी लगन के नतीजे मे उसने मास्टर्स डिग्री के साथ ही साथ कानून की पढ़ाई की और  ला की डिग्री भी हासिल की.</p>
<p>यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि 1980 में जब फिल्म ‘क़ुरबानी’ रिलीज़ हुई और नाज़िया का गीत ‘आप जैसा कोई’ बाज़ार मे आया उस समय गुड़िया की उम्र कुल मिलाकर 15 साल की थी और वह लन्दन के एक स्कूल मे पढ़ रही थी.</p>
<p>हुआ कुछ यूं था कि फिरोज़ ख़ान उन दिनो फिल्म ‘क़ुरबानी’ बना रहे थे. लन्दन में एक पार्टी के दौरान नाज़िया से उनकी मुलाक़ात हुई. उसकी आवाज़ सुनकर वे बहुत प्रभावित हुए. हालांकि फिल्म में संगीत कल्याणजी-आनन्दजी का था फिर भी एक गीत के लिए फिरोज़ खान ने भारतीय मूल के संगीतकार बिड्डू को अनुबन्धित कर लिया था. लिहाज़ा उन्होने बिड्डू और नाज़िया की जोड़ी बना दी. और इस जोड़ी ने मिलकर जो कुछ किया वह इतिहास है.</p>
<p>बिड्डू अप्पैया मूलत: कर्नाटक के रहने वाले हैं. संगीत में अपनी मह्तवाकान्क्षाओं को साथ लेकर लन्दन में जा बसे थे. कामयाबी भी ख़ूब हासिल हुई. 70 के दशक में उन्होने टीना चर्ल्स, जिम्मी जेम्स और कार्ल डग्लस जैसे प्रसिद्ध गायकों के लिए गीत रचकर अपनी धाक जमा ली थी. डिस्को संगीत के लिए वे खासे मशहूर थे.</p>
<p>फिल्म ‘क़ुरबानी’ में यूं तो लगभग सभी गीत हिट थे लेकिन इस ‘आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी में आए, तो बात बन जाए’ जैसी मक़बूलियत और शोहरत किसी दूसरे गीत को नहीं मिली. इस एक गीत से गीतकार इन्दीवर को भी एक नई इमेज मिली. फिरोज़ खान को आशा से ज़्यादा सफलता. भारत और पाकिस्तान के लोगों को एक साथ, एक सुर में गाते हुए, एक दूसरे को प्यार से देखने की वजह मिली. पाप गीतों को समाज में इज़्ज़त और डिस्को वालों को बेहतर बिज़नेस मिला. ढेर सारे नए गायकों को उम्मीद की नई किरण दिखाई दे गई. इसी के नतीजे में कोई एक दर्जन नए गायक अपनी-अपनी तरह के डिस्को गीत लेकर मंज़र पर उभर आए.</p>
<p>और नाज़िया ? नाज़िया तो शायद यह गिन भी नहीं पा रही थी कि आख़िर वो सातवें आस्मान पर पहुंच गई है या ग्यारहवें पर. लेकिन उसे इतना पत्ता था कि उसकी दुनिया ज़मीन पर ही है लिहाज़ा आस्मान को उसने कभी अपने वज़न का अहसास तक न होने दिया. पन्द्रह साल की स्कूली बच्ची ने अपनी किताबें थामे-थामे, गीत गाते-गाते अपने सफर को आगे बड़ाया.</p>
<p>‘आप जैसा कोई’ की रिकार्डिंग लन्दन में ही हुई थी. भारतीय फिल्म इतिहास का यह पहला गीत था जिसकी रिकार्डिंग 24 ट्रैक पर हुई थी. बिड्डू ने इस गीत के साथ हिन्दी सिने संगीत में एक नई बीट और एक नई रिदम का तोहफा दिया. नाज़िया को इस गीत के लिए उस साल का फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला.</p>
<p>इस अप्रत्याशित सफलता के फौरन बाद ही बिड्डू और नाज़िया की टीम ने एक और एल्बम पेश कर दिया. इस बार नाज़िया के साथ उसका भाई ज़ोहेब भी था. ज़ोहेब ने इस एल्बम के आधे गीतों की धुने बनाईं, कुछ गाए और कुछ लिखे भी थे. 1981 में जारी इस एल्बम का नाम था – डिस्को दीवाने. इस एल्बम ने हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में बिक्री के सारे रिकार्ड तोड़ डाले. ख़ासकर नाज़िया का गाया टाईटल गीत ‘डिस्को दीवाने हैं ‘ तो घर-घर, गली-गली और डिस्को-डिस्को गूंज रहा था.</p>
<p>इस एल्बम में कुल जमा दस गीत थे. ‘आओ ना डांस करें’, ‘डिस्को दीवाने हैं’, ‘तेरे कदमों को चूमूंगा, मुझे तू पास आने दे’ और ‘मुझे चाहे न चाहे’ (ज़ोहेब के साथ), ‘दिल मेरा कहता है ये तुम मेरे हो’ वग़ैरह. लेकिन इस एल्बम में मेरा सबसे पसन्दीदा गीत रहा है ‘लेकिन मेरा दिल, मेरा दिल रो रहा है.’ इसमे लफ्ज़ों की अदायगी और धुन का कमाल है. पहले तो ‘लेकिन’ का उचारण जो अपने अर्थ की तरह ऊपर ले जाकर नीचे गिरा देता है. दूसरा ‘लेकिन मेरा दिल’ के बाद गिटार का एक तोड़ आकर ‘दिल रो रहा है’ को अलग भाव दे देता है.</p>
<p>इसी के पीछे-पीछे आई फिल्म ‘स्टार’ जिसके संगीतकार थे बिड्डू और गायक यही – भाई-बहन की जोड़ी. कुमार गौरव-रति अग्निहोत्री और पद्मिनी कोल्हापुरे को लेकर बनी यह फिल्म तो नहीं चली लेकिन इसके गीत खूब चले. ख़ासकर नाज़िया का गाया ‘बूम-बूम’. बहुत कमाल की धुन और कमाल की गायकी.</p>
<p>फिल्म की नाकामी से खुद को अलग करके इन सारे गीतों को ‘बूम-बूम’ नाम से एक एल्बम के रूप में बाज़ार मे उतारा गया. और यह भी खूब बिका. ख़ासकर इसका वीडियो. केन घोष के निदेशन मे बने इस वीडियो ने हिन्दी वीडियो बनाने वालों के लिए एक मानक और मार्गदर्शक का पद पा लिया. इसमें बिड्डू खुद भी मौजूद हैं.</p>
<p>इसके बाद आए 1984 में ‘यंग तरंग’. 1987 में ‘हाटलाईन’ और 1992 में आखिरी एल्बम ‘केमरा केमरा’. हालांकि इन एल्बम्स में गीत रचना वाले पक्ष में कुछ भी उलेखनीय नहीं है लेकिन अपनी बात कहने के लिए जिस तरह शब्दों को धुन की रस्सी से बांधा गया है वो काफी मज़ेदार है. मज़ेदार इसलिए कह रहा हूं कि यह कोशिश उन 20-22 साल के जवान बच्चों की है जो शायर नहीं हैं लेकिन अपनी बात कहना चाहते हैं. अब जैसे ‘हाटलाईन’ का यह गीत ‘देखा नहीं मैने कभी तुझको – टेलीफोन प्यार / तीन-तीन,दो-दो,चार-चार / मुझको हो  गया है तुमसे प्यार / तेरी आवाज़ ही, सुनू मैं बार-बार / मुझको हो गया है टेलीफोन प्यार’.</p>
<p>अच्छा एक मज़े की बात है. बात ये है कि नाज़िया और ज़ोहेब पाकिस्तान में भी कल्ट फिगर की तरह पूजे जाने लगे थे. हर तरफ उन्हीं की गूंज थी लेकिन उस समय मुल्क में जनरल ज़िया-उल-हक़ की हुकूमत थी जिसने लोगों के सामान्य जीवन पर भी अजब-अजब पाबंदियां लगा रखी थीं. ऐसी ही एक पाबन्दी थी औरतों के नाचने पर. पीटीवी पर किसी महिला गायिका को गाते समय नाचते या झूमते हुए दिखाने पर पाबन्दी थी.</p>
<p>उस समय नाज़िया का क्रेज़ ऐसा था कि उसे दबाया भी नहीं जा सकता था. ऐसे मे टीवी वालों ने नाज़िया को झूमते-नाचते हुए गाने सो तो नहीं रोका लेकिन कैमरा इस तरह पोज़ीशन किया कि उसके शरीर का सिर्फ ऊपरी हिस्सा ही दिखाई दे सके, नाचते हुए पांव नहीं.</p>
<p>लेकिन गुड़िया तो ठहरी गुड़िया. उसे अपने नाच-गाने से ज़्यादा ज़माने की खुशियां प्यारी थीं. सो गुड़िया ने एक संस्था बनाकर हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में ज़रूरतमन्द और शारीरिक रूप से अशक्त बच्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया था. आगे चलकर उसने ड्र्ग्स के नशे में डूबे युवाओं में जन-जागृति और नशा-मुक्ति के लिए भी एक संगठन बैन (बैन अगेन्स्ट नार्कोटिक्स) बनाकर काम शुरू कर दिया. उनका आख़िरी एल्बम ‘केमरा केमरा’ इसी उदेश्य से बनाया गया था.</p>
<p>यह सब उस वक़्त जब नाज़िया को फेफड़े का केंसर हो चुका था. इलाज के बाद डाक्टरों ने उसे स्वस्थ्य भी घोषित कर दिया लेकिन कुछ अर्से बाद यह ग़लीज़ बीमारी फिर आ धमकी.1995 में पाकिस्तान के एक प्रसिद्ध उद्योग घराने के चश्मे-चिराग इश्तियाक़ बेग से शादी भी कर ली. पति के अनुसार यह लव-मैरिज और मां के मुताबिक यह अरेंजड मेरिज थी.</p>
<p>इस विवाह के बाद नाज़िया का जीवन दुखों से भर गया. पति-पत्नि के बीच भारी मतभेद होने की वजह से बात तलाक़ तक जा पहुंची. लेकिन इस वक़्त तक उनके एक बेटा भी हो चुका था और साथ ही अन्दर कहीं छुपकर बैठी कैंसर ने भी अपनी गर्दन बाहर निकाल ली.</p>
<p>नाज़िया तलाक़ की अर्ज़ी लगाकर अस्पतालों में बीमारी से जूझती रही. कल तक ज़माने भर के लिए खुशियां बांटने वाली गुड़िया एक मुस्कराहट की मोहताज थी. और आख़िर 13 अगस्त 200 को महज़ 35 बरस की उम्र में मासूम सी गुड़िया ने आंखें बन्द कर लीं.</p>
<p>ज़माना अब तक गाता है ‘आप जैसा कोई मेरी ज़िन्दगी मे आए, तो बात बन जाए’ लेकिन जैसा कि चचा ग़ालिब कह गए हैं ‘क्या बने बात जहां, बात बनाए न बने’.</p>
<p>गुड़िया, तुम जहां भी हो ख़ुश रहो. मेरे लिए तो यूं भी गुड़िया किसी दिन एक शो रूम में रखी दूर से देखने की चीज़ थी. यह गुड़िया दिखाए तो नहीं देती लेकिन सुनाई आज भी देती है.</p>
<p><strong>और&#8230; </strong></p>
<p>और अब बस. सिर्फ जय-जय.</p>
<p>(दैनिक भास्कर के रविवारीय परिशिष्ट &#8216;रसरंग&#8217; में २५ जुलाई २०१० को प्रकाशित)</p>
</div>]]></content:encoded>
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		<title>जाता हूँ मैं, मुझे अब न बुलाना</title>
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		<pubDate>Mon, 19 Jul 2010 10:17:40 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[जाता हूँ मैं, मुझे अब न बुलाना राजकमार केसवानी क्या अजब दुनिया है. आज रोने का दिन है और मुझे बात भी करनी है। आप जानते हैं न मनोहारी दादा नहीं रहे !  मशहूर सेक्सोफोन वादक मनोहरी सिंह। संगीतकार जोड़ी बासू-मनोहरी वाले मनोहारी दादा। आर.डी.बर्मन के सदा सहायक मनोहारी दादा । कितने हज़ार गीत होंगे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="Manohari Singh Saxophone" link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/manohari-singh/"><p><strong>जाता हूँ मैं, मुझे अब न बुलाना </strong><br />
<em>राजकमार  केसवानी</em><br />
<a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/Manohari-Singh-2.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-434" title="Manohari Singh" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/Manohari-Singh-2-300x232.jpg" alt="" width="300" height="232" /></a></p>
<p>क्या <span>अजब</span> <span>दुनिया</span> <span>है</span>. <span>आज</span> <span>रोने</span> <span>का</span> <span>दिन</span> <span>है</span> <span>और</span> <span>मुझे</span> <span>बात</span> <span>भी</span> <span>करनी</span> <span>है।</span> <span>आप</span> <span>जानते</span> <span>हैं</span> <span>न</span> <span>मनोहारी</span> <span>दादा</span> <span>नहीं</span> <span>रहे</span> !  <span>मशहूर</span> <span>सेक्सोफोन</span> <span>वादक</span> <span>मनोहरी</span> <span>सिंह।</span> <span>संगीतकार</span> <span>जोड़ी</span> <span>बासू</span>-<span>मनोहरी</span> <span>वाले</span> मनोहारी <span>दादा।</span> <span>आर</span>.<span>डी</span>.<span>बर्मन</span> <span>के</span> <span>सदा</span> <span>सहायक</span> <span>मनोहारी</span> <span>दादा</span> ।</p>
<p>कितने हज़ार गीत होंगे जिन्हें  हम सब  सुनकर मस्त होते रहते हैं।  संगीतकार,गायक,गीतकार की वाह-वाह करते  रहते हैं लेकिन इन कई  हज़ार गीतों में जादू पैदा  करने वालों में एक जादूगर  का नाम  है &#8211; मनोहारी सिंह। अपनी फ्ल्यूट  (स्टील की बांसुरी), सक्सोफोन और  मेंडोलिन के जारी उन्होंने हिन्दी  सिने संगीत में कितने रंग  भरे हैं. ज़रा याद कीजिए-  &#8216; जा रे, जा रे उड़  जा रे  पंछी, बहारों के देस जा  रे&#8217; (माया), &#8216;तुम्हे याद होगा  कभी हम मिले थे&#8217; (सट्टा  बाज़ार), &#8216;अजी रूठकर अब कहाँ  जाइयेगा&#8217;,और &#8216; बेदर्दी बालमा तुझको  मेरा मन याद करता है&#8217;  (आरजू), &#8216;अछा जी मैं हारी  चलो मान जाओ ना&#8217; (काला  पानी) , &#8216;रुक जा ओ जाने  वाली रुक जा&#8217; (कन्हैया), &#8216;आजकल तेरे मेरे प्यार  के चर्चे  हर ज़ुबान  परा (ब्रहमचारी), &#8216;शोख नज़र की  बिजलियाँ, दिल पे मेरे गिराए  जा&#8217; (वो कौन थी), &#8216;है  दुनिया उसी की , ज़माना उसी  का&#8217; (काश्मीर की कली)&#8217;, &#8216;हुजूरे  वाला, जो हो इजाज़त &#8216; (ये  रात फिर न आएगी), &#8216;गाता  रहे मेरा दिल&#8242; और &#8216;तेरे  मेरे सपने अब एक रंग  हैं&#8217;(गाईड), &#8216;जाग दिले-दीवाना,  रुत जागी वसले यार की&#8217;  (ऊंचे लोग), &#8216;जाता हूँ मैं  मुझे अब न बुलाना&#8217; (दादी  मां), &#8216;रात अकेली है&#8217; (ज्वेल  थीफ), &#8216;रूप तेरा मस्ताना&#8217; (आराधना),  और आर.डी. बर्मन  के तो  लगभग सारे संगीत में कहीं  वादक तो कहीं अरेंजर तो  कहीं किसी और रूप में  मौजूद हैं ही।</p>
<p>और अगर कुछ भी याद  न हो  तो सबसे  ताज़ा यादा है अभी थोड़े  दिन पहले ही सोनी टीवी  के शो  &#8216;इन्डियन आईडल ५&#8217; पर आशा  भोंसले के साथ भी मनोहारी  दा अपने  सक्सोफोन के साथ गुज़ारे दौर  का जादू  जगाते हुए दिखाई दिए थे।</p>
<p>मन हर  लीनो<br />
मनोहरी सिंह नेपाली मूल  के संगीतकार  थे। १९४१ में उनके दादा  नेपाल से आकर कलकत्ता में  बस गए  थे। वे ट्रम्पेट प्लेयर के  तौर पर ब्रिटिश फ़ौज की  बैंड के सदस्य के रूप  में यहाँ लाए गए थे।  थोड़े अरसे बाद पित्ता भी  यहीं आ गए और कलकत्ता  में ही पुलिस बैंड में  बतौर बैगपाईप और क्लार्नेट वादक  नौकरी पा गए।</p>
<p>८ मार्च १९३१ को जन्मे  मनोहरी की उम्र उस समय  १०-११  बरस की थी। मगर घर  में संगीत के माहौल के  चलते वे भी संगीत में  अभी से गोते लगाने लगे  थे। पित्ता घर पर अपने  शौक से फ्ल्यूट बजाते थे  सो मनोहरी  ने भी  उसे ठान लिया। फिर मेंडोलिन।</p>
<p>इसी तरह उम्र के बढ़ाते  पड़ाव के साथ शौक भी  बड़ता गया। सौभाग्य से मुलाक़ात  हो गई  जोसेफ न्यूमेन से। जोसेफ हंगरी  मूल के संगीतकार थे, जो  कलकत्ते में रह रहे थे,  उनके पित्ता सक्सोफोन बजाते थे।  मनोहरी सिंह भी इसी साज़  से दिल  लगा बैठे। और दिल लगाया  भी ऐसा  कि अस्थमा  के मर्ज़  के बावजूद  इसे ज़िंदगी भर फूंक-फूंक  कर ज़माने  भर में  इसकी सुगंध फैलाते रहे।</p>
<p>कलकते में यह संगीत का  एक ऐसा  दौर था कि यहाँ के  होटलों और नाईट क्लब्स में  बड़े नामी कलाकार काम कर  रहे थे। मनोहरी भी कलकत्ता  सिम्फनी आर्केस्ट्रा के साथ जुड़े  रहने के अलावा एक नाईट  क्लब &#8216;फिर्पो&#8217; के साथ १९५८ तक  काम करते रहे। यह वही  समय था जब संगीतकार नौशाद  ने मनोहरी  और उनके  साथ बासू चक्रवर्ती को एक  कार्यक्रम में बजाते देखा और  संगीतकार सलिल चौधरी को सलाह  डी कि  इन दोनों  कलाकारों को बंबई ले आएं।</p>
<p>आखिर १९५८ में सलिल दा  उन्हें बंबई ले गए। सलिल  दा के  पास उस समय बहुत काम  न था  सो उन्होंने  संगीतकार एस.डी.बर्मन  से मिलवाया। बर्मन दा  ने उन्हें  पहला मौक़ा दिया फिल्म &#8216;सितारों  से आगे&#8217;  में।<br />
बर्मन दा से पहली मुलाक़ात  के समय  ही मनोहारी  दा की  उनके बेटे आर.डी.बर्मन  उर्फ़ पंचम से भी मुलाक़ात  हो गई।  जिस समय सलिल दा मनोहारी  को लेकर  बाम्बे लैब पहुंचे जहां &#8216;सितारों  से आगे&#8217;  की रिकार्डिंग  हो रही  थी, तो वहां पंचम, जयदेव,  और लक्ष्मीकांत  भी मौजूद  थे। लक्ष्मीकांत उस समय बतौर  साज़िन्दा मेंडोलिन बजाते थे और  जयदेव बर्मन दा के सहायक  थे।</p>
<p>मनोहारी की यहाँ से जो  दोस्ती और मोहब्बत का रिश्ता  बना वो तमाम उम्र बना  रहा। &#8216;छोटे नवाब&#8217; से लेकर  पंचम की आख़िरी चर्चित फिल्म  &#8216;१९४२ अ लव स्टोरी&#8217; तक।  आप में  से जिसने  भी इन्डियन  आइडल ५ वाला शो देखा  होगा कि किस तरह आर.डी.बर्मन  के ज़िक्र  भर से  दादा भावुक हो उठे थे।  आर.डी.बर्मन की  शख्सियत का यही कमाल है  कि उनके  साथ काम करने वाले भाग्यशाली  लोगों की तो छोड़ दें,  हम जैसे  सिर्फ उनके गीत-संगीत से  उन्हें जानने वाले भी आज  तक उनकी  दीवानगी से बाहर नहीं आ  पाए हैं। बल्कि सच तो  यह है   कि ज्यों-ज्यों वक़्त  गुज़रता है त्यों-त्यों यह  दीवानगी बड़ती  ही जाती है।</p>
<p>मनोहारी सिंह ने लगभग सारे  बड़े संगीतकारों के साथ काम  किया। जैसा कि शरू में  जो मैंने  गीत  गिनाए थे, यह बात  उसी से ज़ाहिर हो जाती  है। अब जैसे मदन मोहन  जी के  साथ &#8216;वो कौन थी&#8217; के  अलावा मेरी यादाश्त से फिल्म   &#8216;हकीकत&#8217;  के मस्ती भरे गीत  &#8216;मस्ती में छेड़ के तराना  कोइ दिल का, आज लुटाएगा  खज़ाना कोइ दिल का&#8217; में  सेक्साफोन और &#8216;हंसते ज़ख्म&#8217; में  &#8216;तुम जो मिल गए हो&#8217;  में की फ्ल्यूट बजाया है।</p>
<p>शंकर-जयकिशन ने &#8216;ब्रहमचारी&#8217; और &#8216;आरजू&#8217; के अलावा  फिल्म &#8216;प्रोफ़ेसर&#8217; में क्या कमाल  का पीस   &#8216;आवाज़ दे के हमें तुम  बुलाओ, मोहब्बत में इतना न  हमको सताओ&#8217;  में बजाया है  कि गीत  याद करो तो बोलों से  ज़्यादा सेक्साफोन की लहराती-बलखाती  धुन ज़हन में गूजती रह  जाती है।</p>
<p>इसी तरह मनोहारी दादा ने  एक बार  दुबई में बसे मेरे अदभुत  संगीत प्रेमी मित्र डाक्टर चंद्रशेखर  से कहा  था कि  उनके साज़ का सबसे अदभुत  इस्तेमाल प्यारेलाल (लक्ष्मीकांत  प्यारेलाल) ने फिल्म &#8216;अमीर गरीब&#8217;  के गीत  &#8216;मैं आया हूँ ले के  साज़ हाथों में&#8217; में किया  है। वाह! सचमुच अगर किसी  को इस  साज़ की गहराई और छिपी  हुई ध्वनियों को जानना हो  तो इसे  सुनना चाहिए।</p>
<p>इसका मतलब यह नहीं कि  फिल्म &#8216;गाईड&#8217; के &#8216;तेरे मेरे  सपने अब एक रंग हैं&#8217;   में बजाया गया टुकड़ा  कुछ कमतर है। आप ज़रा  गौर से सुनकर देखें कैसे  सेक्साफोन धीमे से &#8216;मेरे तेरे  दिल का, तय था इक  दिन मिलना / जैसे बहार आने  पर तय  है फूल  का खिलना&#8217;  जैसी पंक्तियों को शब्द की  परछाईं बनकररूह अत्ता करता  है। या फिर अंतरे में  बिना शब्द सारे माहौल को  बयान करना। पूरे के पूरे  गीत में ही सेक्साफोन आत्मा  की तरह  प्रवाहित होता है।</p>
<p>ओ.पी.नैयर साहब के  लिए तो उन्होंने &#8216;है दुनिया  उसी की&#8217; में दुःख को  ऐसा सांगीतिक एक्सप्रेशन  दिया है मानो दुःख भी  इस दुःख  से तड़प  उठा हो।</p>
<p>कितने-कितने बेमिसाल गीत हैं  और क्या-क्या उसमें  कलाकारी हुई है। अब जैसे  जयपुर में बसे मेरे संगीत  प्रेमी मित्र पवन झा ने  आज ही  मुझे एक किस्सा सुनाया। फिल्म  &#8216;माया&#8217; में सलिल दा ने  एक गीत  रचा है &#8216;जा रे, जा  रे उड़  जा रे  पंछी&#8217;। इस गीत की शुरूआत  की फ्ल्यूट  के स्वरों  से होती  है और    कुछ सेकण्ड बाद ही सेक्साफोन  आ जाता  है। उस दिन रिकार्डिंग के लिए एक साजिन्दे  के न  आने की वजह से सलिल  दा ने  यह दोनों  साज़ मनोहारी दा को बजाने  की जिमेदारी  सौंपी। फ्ल्यूट जितनी हल्की-फुल्की,  सेक्साफोन उतनी ही भारी लेकिन  कुछ देर के रियाज़ के  बाद ही इस काम मनोहारी  सिंह ने बखूबी कर दिखाया।</p>
<p>आर.डी.बर्मन तो एक  ऐसी चीज़ थे जो हर  काम को अपने अलग अंदाज़  से करने  के आदी  थे। मनोहारी सिंह से लोग  फ्ल्यूट और सेक्साफोन बजवाते थे  लेकिन आर.डी। ने उनसे  सीटी भी बजवाई। फिल्म &#8216;कटी  पतंग&#8217; के गीत &#8216;ये शाम  मस्तानी, मदहोश किए जाय&#8217; की  सीटी याद हैं न ?</p>
<p>इसी तरह फिल्म &#8216;प्यार का  मौसम&#8217; में बजवाया मेंडोलिन। ज़रा  याद कीजिए &#8216;तुम बिन जाऊं  कहाँ, कि दुनिया में आ  के , कुछ न फिर चाहा  सनम, तुमको चाह के&#8217;। मोहम्मद  रफ़ी वाला वर्शन सुन लें।  मज़ा आ जाएगा। एक ऐसा  साज़ जिसके उस्ताद हुए या  तो महान  संगीतकार सज्जाद और उसके बाद  लक्ष्मीकांत, उसे मनोहारी दा ने  क्या बजाया है।</p>
<p>एक और बात। मनोहारी दा  ने अपने  दोस्त और आर.डी.बर्मन  के दूसरे  सहयोगी बासू चक्रवर्ती के साथ  मिलकर कुछ फिल्मों में संगीत  भी दिया।  १९७६ में महमूद की &#8216;सबसे  बड़ा रुपैया&#8217; में &#8216;ना बीबी  न बच्चा,  न बाप  बड़ा ना मैया&#8217;, &#8216;दरिया किनारे  इक बंगलो&#8217;  और &#8216;बही जइयो ना रानी  बही जइयो ना&#8217; तो अब  तक याद  है न।  इसके अलावा &#8216;चटपटी&#8217; (८१) और  ८३ में  &#8216;कन्हैया&#8217; बासू-मनोहारी की इस  जोड़ी  ने दी।</p>
<p>क्या-क्या याद करूं ? अब  तो हर  दिन ही सिर्फ याद करना  है। जब-जब कोई गीत  बजेगा, कान बेसब्री से उस  साज़ का इंतज़ार करेंगे जिनसे  मनोहारी दा की आवाज़ सुनाई  देगी।</p>
<p>और&#8230;</p>
<p>१३ जुलाई  २०१० को जब मनोहारी दा  की म्रत्यु  हुई उस समय उनकी उम्र  ७९ साल  की थी।  मगर कमाल यह है कि  उन्होंने अपनी तमाम उम्र में  कभी बजाना नहीं छोड़ा। २००३  की फिल्म  &#8216;चलते-चलते&#8217; के लिए भी  बजाया तो २००४ की फिल्म  &#8216;वीर जारा&#8217; में भी बजाया।</p>
<p>म्रत्यु से कुछ दिन पहले  ही उन्होंने  संगीतकार शंकर-जयकिशन की स्मृति  में आयोजित एक कार्यक्रम में  बाकायदा परफार्मेंस दिया था। ऐसे  जीवट के महान संगीतकार को  सौ-सौ  सलाम।</p>
<p>और हाँ। अब आपको भी  सलाम। मतलब अगले हफ्ते तक  की जय-जय।</p>
<p>(दैनिक  भास्कर  के साप्ताहिक  परिशिष्ट  &#8216;रसरंग&#8217;  में  १८ जुलाई २०१० को प्रकाशित)</p>
</div>]]></content:encoded>
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		<title>एक था चन्द्रमोहन   -२</title>
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		<pubDate>Sat, 17 Jul 2010 03:14:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>rkeswani</dc:creator>
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		<description><![CDATA[इंसान को कैसा होना चाहिए ? इंसान जैसा. और कैसा! मगर इंसान जैसा होना, कैसा होना होता है ? कितनी बार ख़ुद को ज़माने से सुने, किताबों में पढ़े इंसान की शक्ल से मिलाकर देखा, हर बार कोई खोट निकल ही आता है. अब जैसे आप सब न जाने कबसे मुझे अपनी बेपनाह मोहब्बत से [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="एक था चन्द्रमोहन   -२" link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/chandramohan-2/"><p>इंसान को कैसा होना चाहिए ?</p>
<p>इंसान जैसा. और कैसा!</p>
<p>मगर इंसान जैसा होना, कैसा होना होता है ? कितनी बार ख़ुद को ज़माने से सुने, किताबों में पढ़े इंसान की शक्ल से मिलाकर देखा, हर बार कोई खोट निकल ही आता है. अब जैसे आप सब न जाने कबसे मुझे अपनी बेपनाह मोहब्बत से भिगोए जाते हैं, मेरी लम्बी उम्र की दुआएं करते हैं और मैं बदले में सिर्फ बातें किए जाता हूं. वह भी इकतरफा बातें. न ठीक से सारे ख़तों का जवाब और न ठीक से इस जगह आप की बात. यह क्या आपस की बात हुई?</p>
<p>सच्ची बात है. कई बार तो आपकी तरफ से इतनी ख़ूबसूरत बातें मुझ तक पहुंचती हैं कि मैं उसे लेकर ख़ुशी से झूमता फिरता हूं. ग़नीमत है कि हमारे इस दौर में अब तक ख़ुशियों को बैंक में जमा नहीं कराना. वरना हम-आप जैसे छोटी-छोटी ख़ुशियों को गले लगाकर नाचने वालों को परत-दर-परत पत्थर ज़मीन की सख़्ती का अहसास ही मार डालता और हमारी ख़ुशियां बैंक के किसी बचत खाते में पड़ी-पड़ी दर्द में बदल चुकी होतीं.</p>
<p>तो चलिए, बहुत हुआ. अब से मैं एक बार फिर बेहतर इंसान बनने की कोशिश करूंगा. कोशिश करूंगा कि हमारी आपस की बात संवाद बन जाए. सो अब से इस जगह कुछ मैं कहूंगा, कुछ आप कहेंगे.</p>
<p>और हां, अब तक आप कई-कई बार यह सवाल पूछ चुके हैं कि मैं यह सारी जानकारी कहां से जुटाता हूं. मैं चुप था. वजह यह कि यह सब बताने के लिए ख़ुद को बहुत खोलना पड़ता है और मैं यह काम अपने एक आत्म-कथात्मक उपन्यास के ज़रिए करना चाहता था. सो अब यह मुश्किल भी कुछ आसान हो गई है. मंज़िल के करीब हूं सो अब ख़ुद को इस जगह खोलना भी मुश्किल नहीं होगा.</p>
<p>चलिए छोड़िए, अब यह ‘मैं’ पुराण बहुत हुआ. अब मैं आपको बताता हूं कि आप कितनी ख़ूबसूरत बात करते हैं. मुझसे कहीं ज़्यादा अछी बात.</p>
<p>आज की शुरूआत करते हैं एक ख़त से जो कल ही मिला है. इस ख़त में कुछ ऐसी बातें हैं जिनके बारे में मैं ख़ुद भी नहीं जानता था. बल्कि यह ख़त इतनी मोहब्बत और ख़ुलूस से लिखा गया है कि मैने तय कर लिया है कि मैं इन कृष्ण कुमार वातल साहब से मिलने ग्वलियर जाऊंगा.</p>
<p>वातल साहब कौन हैं? क्यों उनका लगभग पूरा का पूरा ख़त आपको सुना रहा हूं? यह बात आपको ख़त सुनकर ही समझ आ जाएगी.</p>
<p><strong>‘</strong><strong>प्रिंस चन्द्रमोहन</strong><strong>’</strong></p>
<p>‘&#8230;कल दिनांक 20 जून 2010 के <strong>दैनिक भास्कर</strong> (रसरंग) में आपका लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा और थोड़े आंसू भी आंखों में आ गये. मेरे व मेरे परिवार की ओर से आपको बहुत-बहुत बधाई कि आपने एक भूले हुए कलाकार को आजकल के सिनेमा प्रेमियों की नज़र में जो लाया. आज फिल्म इंडस्ट्री उन्हें बिल्कुल भूल चुकी है जबकि मेरे ख़्याल से वे मरणोपरांत दादा साहब फालके अवार्ड के हकदार होने चाहिये. उनकी कला कद्र करने वाले व उनकी याद दिलाने वाले फिल्म व पत्रकारिता जगत में अब इक्का-दुक्का लोग ही बचे हैं.</p>
<p>परिचय देना तो नहीं चाहता था पर उससे शायद आप मेरी बात पर ध्यान दें. मैं चन्द्रमोहन के सगे बड़े भाई स्व. मनमोहन नाथ वातल का पुत्र हूं और मेरी उम्र भी 82 वर्ष की है. आपके इस लेख से सम्बन्धित कुछ बातें जोड़ना चाहता हूं.</p>
<p>1)      चन्द्रमोहन बहुत अच्छी मराठी बोलते थे और उन्होने 3-4 मराठी फिल्मों में भी काम किया था. दो मुझे याद हैं – ‘गीते’ व ‘आप्ले घर’. हिन्दी में बनी फिल्मों का नाम था – ‘गीता’ व ‘अपना घर’.</p>
<p>1)</p>
<p>2)      ‘अपना घर’ में उन्होने बहुत कम बोलकर सिर्फ आंखों (इशारों) से एक दुष्ट पति की भूमिका में यादगार अभिनय किया था, जिसे बहुत सराहा गया. शांता आप्टे पत्नी बनी थीं.</p>
<p>सन 1945 में दिल्ली में मेरी एक बहन से पृथ्वीराज कपूर जी ने कहा था जो अभिनय हम मुंह,गर्दन और हाथ हिलाकर करते हैं वह चन्द्रमोहन सिर्फ आंख से ही कर लेते हैं.</p>
<p>3)      नानी के लाडले होने के कारण चन्द्रमोहन बचपन से ही बिगड़ेल थे और ज़्यादा पढ़ नहीं पाये, पर फिल्मों में पहुंच कर उन्हें शराब व घुड़दौड के अलावा पढ़ने का ज़बरदस्त शौक लगा था. उनके पास उर्दू की हिन्दी में लिखी व अंग्रेज़ी किताबों की अच्छी खासी लायब्रेरी थी. अंग्रेज़ी भी वह फर्राटेदार बोलते थे.</p>
<p>4)      उनके घुड़दौड़ के दोस्तों में मोतीलाल के अलावा महाराजा काश्मीर हरीसिंह और महाराजा ग्वालियर जीवाजीराव सिन्धिया भी थे. अन्य गहरे दोस्तों में कुमार, के.एन.सिंह, कुन्दनलाल सहगल व पृथ्वीराज थे (पृथ्वीराज शराब के साथी नहीं थे).</p>
<p>उल्हास और राजन हक्सर कश्मीरी ज़रूर थे पर उनके ख़ास दोस्तों में नहीं थे. उल्हास (मनमोहन कौल) अजमेर के थे और चन्द्रमोहन ने ही उन्हें प्रभात फिल्म कम्पनी में नौकर कराया था और पहली बार फिल्म ‘वहां’ (Beyond the Horizon) में रोल दिलाया था. वे चन्द्रमोहन को बड़े भाई की तरह आदर देते थे. उनके बुरे वक़्त में भी वे ही उनके घर (16 बिल्खा हाऊस, चर्च गेट) पर हमेशा आते रहते थे. राजन हाक्सर को भी चन्द्रमोहन दोस्त की बजाय अपना जूनियर ही समझते थे.</p>
<p>5)      मैं इंटर का इम्तहान देकर जून 1948 में उनके पास 1 (एक) महीना रहा था.</p>
<p>तब मिसेज़ शीला जेम्स उनकी हाऊस कीपर थीं (वह ईसाई थीं पर उन पर काली मां की सवारी आती थी. चाचाजी आधी रात तक मां का आव्हान हफ्ते में एक बार करते थे.) मोहम्मद उनका कुक व एक पटेल साहब (वे अपने को एक्स फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर बताते थे. ‘गुलाब’ को हीरोइन लेकर कोई फिल्म भी बनाई थी) प्रायवेट सेक्रेटरी थे.</p>
<p>चाचाजी अन्धेरी में प्रकाश स्टूडियो भी हमे ले गये थे और ‘रामबाण’ की शूटिंग दिखाई थी. विजय भाई भट्ट से भी मिलवाया था. सुरैया उन दिनों टाप हीरोइन थीं. कहने पर फोन कर उसे घर भी बुलाया था. वह उन्हे ‘अंकिल’ कहती थी.</p>
<p>6)      चन्द्रमोहन के पिताजी श्री जगन्ननाथ सहाय वातल (मेरे दादाजी) अपने सगे</p>
<p>ममेरे भाई सर तेज बहादुर सप्रू की महाराज माधवराव सिंधिया(प्रथम) से सिफारिश पर 1900 के आसपास इलाहाबाद से ग्वालियर नौकरी में आये थे. उनका विवाह (तब ब्रिटिश सी.पी. एंड बरार का एक जिला) के एक मालगुज़ार पंडित माधोप्रसाद जी मुशरान की बहन से हुआ था. मां की जल्द मृत्यु के कारण चन्द्रमोहन का लालन-पालन ननिहाल (नरसिंहपुर) में बड़े लाड़ से हुआ.</p>
<p>अब यह तो हुई ग्वालियर के वातल साहब की बात. मैं आपको एक किसी और दिन भोपाल के एक वृद्ध आश्रम आनन्द धाम के आर.के.शर्मा जी की बात भी बताऊंगा. ऐसे तमाम सारे गीत जिनके मुखड़े मुझे याद होते हैं उन्हें वो सारे गीत मुखाग्र याद होते हैं. उन फिल्मों के दृश्य याद होते हैं. उनका इसरार होता है सो मैं भी उनके पास जाकर उनके बाकी साथियों के साथ बैठकर उनकी दर्द भरी आवाज़ में उनसे गीत सुनता हूं. बहुत सुखद अनुभूति होती है लेकिन कभी-कभी वे कोई ऐसा गीत गा जाते हैं कि खुद को सम्हालना मुश्किल हो जाता है.</p>
<p>अब जैसे उनका सुरेन्द्र का गाया यह गीत गाना. ‘क्यों याद आ रहे हैं, गुज़रे हुए ज़माने / ये दुख भरे फसाने, रोते हुए तराने’. मैं जानता हूं इस तरह की बातें आम नहीं की जातीं लेकिन दिल से मजबूर हूं. ऐसी जगहों पर, ऐसे हालात में, अपनी ज़बान से कोई कुछ कहता नहीं है लेकिन फिर भी सुनने वाले को सुनाई सब दे जाता है.</p>
<p>चलिए, अब इस बात को बहुत नहीं बड़ाऊंगा. यहां से आगे बड़कर एक और संगीत-सिनेमा प्रेमी इन्दौर के जनाब इमदाद अली महूवाला की बात बताता हूं. यूं तो हर हफ्ते बड़ी मुस्तैदी से अपनी बात करते हैं लेकिन यहां मैं उनके सबसे ताज़ा मेल की बात बताऊं जो उन्होने पिछले हफ्ते हुई अभिनेता कुमार वाली बात को लेकर है.</p>
<p>‘&#8230;जब कुमार का आरम्भ से अंत तक ज़िक्र किया तो उनकी अदाकारी के लिहाज़ से एक बेहतरीन फिल्म ‘दायरा’ को क्यो नज़र अंदाज़ कर दिया. जवान, खूबसूरत औरत के बूढ़े बीमार शौहर का किरदार क्या आपको याद नहीं रहा.’</p>
<p>बिल्कुल सही बात. याद करना चाहिये था. नहीं कर पाया. आपने कर लिया. एक ही बात है. आपस की बात है.</p>
<p>अब आपने छेड़ा है तो कुछ छूटा हुआ और कह ही डालूं. कुमार ने अपने दौर की मशहूर अभिनेत्री प्रमिला उर्फ ईस्थर अब्राहम से शादी की थी. प्रमिला हिन्दुस्तान की पहली मिस इंडिया थीं. आगे चलकर उनका तलाक़ हो गया.</p>
<p>कुमार फिल्म निर्माता भी थे. वे सिल्वर फिल्म्स में भागीदार थे. अपने अज़ीज़ दोस्त चन्द्रमोहन के साथ भी भागीदारी में उन्होने इसी बैनर में एक फिल्म ‘झंकार’(1942) बनाई थी. फिल्म में चन्द्रमोहन,प्रमिला और कुमार के साथ कामेडियन गोप भी थे. इस फिल्म के गीत बड़े मज़े के हैं. जैसे आरज़ू लखनवी का लिखा और रहमत और झंडे खान का गाया एक गीत है ‘पड़ोसन का लड़का मोरे मन भाये’. इस फिल्म में कुमार,प्रमिला और गोप के गाए हुए गीत भी हैं. संगीतकार हैं बशीर देहलवी.</p>
<p>और&#8230;</p>
<p>और बस यह कि खेल खतम, पैसा हजम. पिछली बार नीयत थी कुछ और हो गया कुछ और. तभी तो कहता हूं कि काहे को ख़्वामखाह बैठकर सोचना कि आज यह कर डालूंगा, कल वो कर डालूंगा. भैये, ये सब तो ‘पिलान’ हैं, ‘पिलान’ का क्या? हुआ-हुआ, नहीं हुआ तो नहीं हुआ. आज नहीं तो कल. है कि नहीं ?</p>
<p>जय-जय.</p>
</div>]]></content:encoded>
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		<title>एक था चन्द्रमोहन</title>
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		<pubDate>Sat, 17 Jul 2010 02:41:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>rkeswani</dc:creator>
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		<description><![CDATA[जिसे ज़िंदगी जीने का शऊर था&#8230; राजकुमार केसवानी कितनी अजीब बात है. जिन लोगों की पर्दे पर जगमगाती ज़िन्दगी देखकर ज़माना उनसे रश्क करता है. उन्हे सजदे करता है. उनमे से अधिकांश सितारों की ज़िन्दगी में न जाने कब और कैसे एक अन्धेरा साया धीरे-धीरे निगल जाता है. हमने-आपने न जाने कितनी ऐसी कहानियां देखी-सुनी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="एक था चन्द्रमोहन " link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/chandramohan/"><p><strong>जिसे ज़िंदगी जीने का शऊर था&#8230;</strong></p>
<p><em>राजकुमार केसवानी </em></p>
<p><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/Pukar_1939_film_poster.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-413" title="Pukar_1939_film_poster" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/Pukar_1939_film_poster.jpg" alt="" width="200" height="274" /></a><br />
कितनी अजीब बात है. जिन लोगों की पर्दे पर जगमगाती ज़िन्दगी देखकर ज़माना उनसे रश्क करता है. उन्हे सजदे करता है. उनमे से अधिकांश सितारों की ज़िन्दगी में न जाने कब और कैसे एक अन्धेरा साया धीरे-धीरे निगल जाता है. हमने-आपने न जाने कितनी ऐसी कहानियां देखी-सुनी हैं.</p>
<p>ऐसी ही एक कहानी की बात आज हम लोग करेंगे. 30 और 40 के दशक के महान अभिनेता चन्द्रमोहन की बात. पर्दे का एक ऐसा सितारा जो अपने अभिनय के दम पर बाकी सितारों के बीच चान्द की तरह अलग से चमकता रहा, लेकिन जब टूटा, तो एक तारे की किस्मत लेकर ही टूटा.</p>
<p>आज की पीढ़ी के लिए चन्द्रमोहन का नाम एकदम से अजनबी नाम है लेकिन फिर भी यह कहानी कहता हूं. वजह यह कि मुझे अपने जवान दोस्तों पर बहुत भरोसा है कि वे एक बार वे इस नाम और इस नाम के साथ जुड़े हुनर से वाकिफ हो गए तो उनकी फिल्मों की सीडी ढूंढ-ढूंढ कर ले आएंगे. उन्हें देखेंगे और मुझे दुआएं देंगे.</p>
<p>चलिए तो शुरू करते हैं. चन्द्र मोहन का जन्म 1904 में मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर में हुआ. यूं तो पित्ता काश्मीरी बृह्मण थे लेकिन उस समय ग्वालियर रियासत की नौकरी में थे सो बचपन का अधिकांश समय उसी इलाके में गुज़रा. पित्ता की मृत्यु के फौरन बाद ही वे घर से निकल पड़े. तरह-तरह की नौकरियां कीं. इन नौकरियों में से एक नौकरी थी एक फिल्म वितरण कम्पनी की नौकरी. इसी नौकरी की बदौलत उनका फिल्मों में प्रवेश हुआ.</p>
<p>हुआ कुछ यूं कि वी.शांताराम जी की एक फिल्म के अनुबन्ध के सिलसिले में चन्द्रमोहन की मुलाक़ात शांताराम जी से हुई. वे चन्द्र मोहन के व्यक्तित्व से इतने प्रभावित हुए कि उन्होने फौरन उन्हें फिल्म में काम करने का आफर दे डाला. कई सारी अनेक फिल्मी कहानियों की तरह यहां भी चन्द्रमोहन ने माफी मांग ली और वापस अपने दफ्तर चले गए.</p>
<p>दो साल बाद वे वापस लौटे. इस बार भी शांताराम जी ने उनका उतनी ही गर्मजोशी से स्वागत किया. इस तरह 1934 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘अमृत मंथन’ में राजगुरू के रूप में पर्दे पर अवतरित हुए. राजगुरू की इस भूमिका का चन्द्रमोहन ने इस तरह निर्वाह किया कि दर्शको और आलचकों के पास सिवाय ‘वाह!’ कहने के कुछ न बचा.</p>
<p>इस एक फिल्म ने ही चन्द्रमोहन को सितारा बना दिया. अगले बरस फिर शांताराम की ही फिल्म रिलीज़ हुई ‘धर्मात्मा’. बाल गंधर्व और रत्न प्रभा की प्रमुख भूमिकाओं के साथ भी चन्द्रमोहन महंत की भूमिका थी.</p>
<p>इसी जोड़ी, शंताराम-चन्द्रमोहन की अगली फिल्म थी ‘अमर ज्योति’ (1936). इस फिल्म में दुर्जय की भूमिका निभाकर चन्द्रमोहन ने अपने अभिनय का लोहा मनवा लिया. इसके बाद तो फिर एक से बड़कर एक निर्माताओं की भीड़ लग गई. बाक्स-आफिस पर चन्द्रमोहन का नाम खरे सिक्के की तरह गूंजने लगा. ख़ासकर 1939 की सोहराब मोदी की फिल्म ‘पुकार’ के बाद तो इस नाम को सफलता की गारंटी माना जाने लगा.</p>
<p>फिल्म ‘पुकार’ में इंसाफ के अलमबरदार बादशाह जहांगीर की भूमिका को जिस तरह निभाया उसकी तुलना सिर्फ ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के शंहशाह अकबर , पृथ्वीराज कपूर से ही की जा सकती है. यह भी एक संयोग की बात ही है कि फिल्म ‘मुग़ल-ए-आज़म’ में अकबर की भूमिका के लिए के.आसिफ ने मूलत चन्द्रमोहन को ही लिया था. सलीम की भूमिका में थे सप्रू और अनारकली थीं नरगिस. यह 1945 की बात है.</p>
<p>इसी दौर में देश के बंटवारे का मामला शुरू हो गया. सब कुछ अनिश्चय की गर्त में जा गिरा. इन्हीं हालात में फिल्म की काफी सारी शूटिंग चलती रही. लेकिन हालात ने गम्भीर मोड़ तब लिया जब 1947 में देश का बंटवारा हो गया. फिल्म के निर्माता हकीम शीराज़ अली ने भारत छोड़ पाकिस्तान में जा बसने का फैसला किया. फिल्म अधूरी ही रह गई.</p>
<p>बाद में जब अपनी धुन के पक्के के.आसिफ ने जब दुबारा 1951-52 फिल्म बनाने का विचार किया तब तक चन्द्रमोहन इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे. सप्रू अपना बाज़ार खो चुके थे. लिहाज़ा चन्द्रमोहन की जगह पृथ्वीराज कपूर और सप्रू की जगह दिलीप कुमार आ गए. दिलीप के साथ आई मधुबाला.</p>
<p>ख़ैर, तो चन्द्रमोहन अकबर न बन सके लेकिन उस दौर का इतिहास गवाह है कि चन्द्रमोहन का ऐश्वर्य से भरा जीवन किसी शहंशाह अकबर से कम न था. पैसे को अपनी मुठियों में भरकर रखने की बजाय हवा में पत्तों की तरह उड़ते हुए देखना ज़्यादा पसन्द था.</p>
<p>ज़रूरतमन्दों की चुपचाप मदद करना बहुत पसंद था. रेस के घोड़े खरीदना, दांव लगाना और बेहतरीन स्काच विस्की के शौकीन थे. अभिनेता मोतीलाल भी इसी तबीयत और यही सारे शौक़ उनके भी थे. सो दोनो बहुत गहरे दोस्त थे. चन्द्रमोहन के तीन और करीबी दोस्त थे – अभिनेता कुमार (मुग़ल-ए-आज़म का संगतराश), उल्हास और राजन हक्सर.</p>
<p><strong>घमंड नहीं स्वाभिमान </strong><strong> </strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p>चन्द्रमोहन ने सफलता को कभी सर चंढ़ने न दिया मगर लोग उसके स्वाभिमान को कभी-कभी घमंड मान बैठते थे. अछा, आपको याद दिलाऊं, कोई तीन साल पहले हम लोग एक बार की बातचीत उनके इस चरित्र का ज़िक्र कर चुके हैं.</p>
<p>याद दिलाऊं ? किस्सा यूं था कि शांताराम जी ने एक शुरू की तीन फिल्मों के बाद एक बार फिर चन्द्रमोहन को याद किया. वे उसे अपनी अगली फिल्म में लेबा चाहते थे. सामने कांट्रेक्ट रखा गया जिस पर वही मेहंताना लिखा था जो उन्हें एक नए कलाकार के तौर पर दिया गया था.</p>
<p>चन्द्रमोहन ने बड़ी विनम्रता लेकिन दृढ़ता से कहा कि उनकी बाज़ार में फीस बहुत ज़्यादा है सो कुछ सम्मानजनक फीस ज़रूर दें. शांताराम जी भड़क गए. कहा – ‘ठीक है. तुम मत करो. अगर मैं एक चन्द्रमोहन पैदा कर सकता हूं तो दूसरा भी कर सकता हूं’</p>
<p>चन्द्रमोहन के आहत स्वाभिमान ने जवाब दिया. ‘माफ कीजिए, मेरे बाप ने भी ऐसी ही कोशिश की कि दूसरा चन्द्रमोहन पैदा कर लें. नतीजे में बृजमोहन पैदा हो गया.अब आप भी एक कोशिश कर के देख लें’</p>
<p>इसी के साथ यह रिश्ता यहीं ख़त्म हो गया. लेकिन चन्द्रमोहन की सफलता का घोड़ा ज़रूर दौड़ता रहा. फिल्म ‘गीता’ (1940) में शंकर और मोहन की दोहरी भूमिका, फिल्म ‘रोटी’( 42) में मक्कार सेठ लक्ष्मीदास की भूमिका जहां गायिका बेगम अख्तर (तब अख्तरी बाई फैज़ाबादी) उनकी ‘डार्लिंग’ बनी थीं.</p>
<p>इसके बाद ‘तक़दीर’(43), ‘शकुंतला’(43), ‘पन्ना दाई’(45), ‘हुमायूं’(45) वग़ैरह रिलीज़ हुईं.</p>
<p>सफलता ने और कुछ भले न किया हो लेकिन इतना ज़रूर हुआ कि चन्द्रमोहन आंख मूंद फिल्में साईन क लीं थीं. नतीजे में कई बुरी फिल्मों में आकर फ्लाप भी हुए. बाद में निर्माता बदले हुए हालात में पहले जैसा मेहंताना चुकाने को तैयार न थे ऐसे चन्द्रमोहन कम लेने को तैयार न थे. इसी के चलते अगले दो साल कोई नया काम नहीं मिला. पैसा कभी बचाकर नहीं रखा था और शाही अंदाज़ की ज़िन्दगी की आदत थी. सो धीरे-धीरे घर का सामान एक-एक कर बिकने लगा. हालत इतनी बिगड़ी कि स्काच से देसी ठर्रे पर आ पहुंची. लेकिन ठर्रा फिर भी स्काच की बोतल में ही पीते थे. इस पर उनका और मोतीलाल का बड़ा मार्मिक प्रसंग भी है जिसे कई बार दोहराया जा चुका है. मोतीलाल ने चन्द्रमोहन को श्रद्धांजली के बतौर एक फिल्म ‘जुआरी’ बनानी की कोशिश की मगर सफल न हुए.</p>
<p>1945-46 के इस मुश्किल दौर में चन्द्रमोहन के जीवन में एकाकेक बहुत परिवर्तन आए. उस दौर के एक पत्रकार ख़ुर्शीद ढूंढी, जो उनके बहुत अछे मित्र भी थे, चन्द्रमोहन के अंतिम दिनों का दिल हिला देने वाला वर्णन किया है.</p>
<p>चन्द्रमोहन हमेशा से ईश्वर को न मानने वाले नास्तिक इंसन थे, वे अचानक अत्यधिक धार्मिक हो गए. उनके घर में चारों तरफ सभी धर्मों के प्रतीक चिन्ह,फोटो और मूर्तियां लग गई. कभी वे चर्च जाते, कभी मस्जिद तो कभी मन्दिर. नशे की हालत में वे कहते – ‘मैने लक्ष्मी को खोकर काली मां को पाया है’.</p>
<p>आगे वे हेलूसीनेशन (मतिभ्रम) का शिकार हो गए. ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ याद है न. डाक्टर संजय दत्त को इसी बीमारी का शिकार बताता है. चन्द्रमोहन सपनों मॆं काली मां से हुई बातीं बताता. एक बार बयान किया कि ‘कल रात मैने शैतानों का फुटबाल मौच देखा. मैं फुटबाल था. अल्ला मियां रेफरी थे’.</p>
<p>इस सब की शुरूआत उस एक सपने के सच होने से हुई जिसमें उन्होने अपनी एक घोड़ी कांता को रेस में छठे फर्लांग पर गिरते हुए और उसकी टांगे टूटते हुए देखा.अगले दिन पूना की रेस में सचमुच हुआ भी वैसा ही.</p>
<p>आखिर इन सब स्थितियों में एक बहुत सुखद बदलाव आया. चन्द्रमोहन को एक बार फिल्में मिलने लगीं. काम करते समय वे एकदम सामान्य होते जाते थे. इसी दौर में उनकी आख़िरी उलेखनीय फिल्म आई ‘शहीद’ (48). फिल्म में वे दिलीप कुमार के पित्ता राय बहादुर द्वारकादास की अविसमर्णीय भूमिका में थे. अदालत में उनका ज़बरदस्त वक्तव्य फिल्म इतिहास के बेहतरीन कोर्ट रूम दृश्यों में गिना जाता है.</p>
<p>इसी साल फिल्म ‘रामबाण’ और ‘दुखियारी’ भी रिलीज़ हुईं और कोई 3-4 दूसरी फिल्मों की शूटिंग जारी थी. लेकिन 1949 के मार्च के महीने में अचानक से उनकी तबीयत बिगड गई. 15 दिन की बीमारी के बाद जब आखिरी वक़्त आया तो वे जान गए थे. उन्होने अपनी मित्र शीला (चन्द्रमोहन आजीवन कंवारे रहे) जो उस समय भी उनके साथ थी, से कहा कि वो मोतीलाल और कुमार को बुला लें.</p>
<p>कुछ देर बाद काली मां की तस्वीर की ओर देखकर कहा कि – ‘मां बुला रही है’. इसी के साथ उनकी आंखें मुन्द गईं.</p>
<p>घर में एक पैसा न था. अंतिम संस्कार भी फिल्म आर्टिस्ट एसोसियेशन की ओर से ही हुआ.</p>
<p>और&#8230;</p>
<p>चन्द्रमोहन ने विजय भट्ट की फिल्म ‘रामबाण’ में रावण का रोल किया था. फिल्म में रावण की मृत्यु के दृश्य को जिस तरह उन्होने अंजाम दिया, विजय भट्ट ने उन पर तारीफों के पुल बान्ध दिए. चन्द्रमोहन का जवाब था – ‘ जो लोग मौत को भी एक शानदार मकाम दे सकते हैं ज़िन्दगी को जीने का शऊर भी उन्हीं को आता है’.</p>
<p>सचमुच. यह जवाब एक ऐसे ही इंसान का हो सकता था जिसकी वजह से खुद ज़िंदगी को अपने आप पर नाज़ हो.</p>
<p>तो ऐसे थे चन्द्रमोहन. इतनी उदास कहानी कहने के बाद मैं कुछ देर ख़ामोश रहना चाहता हूं. तो बस अब सात दिन बाद. जय-जय.</p>
<p>(दैनिक  भास्कर  के रविवारीय परिशिष्ट &#8216;रसरंग&#8217; में पूर्व प्रकाशित)</p>
<p><strong>पढ़िए  &#8211; चन्द्रमोहन  -२</strong></p>
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		<title>उमराव जान:अजब दास्ताँ है मेरी ज़िंदगी की&#8230;</title>
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		<pubDate>Fri, 09 Jul 2010 13:23:10 +0000</pubDate>
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			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="उमराव जान:अजब दास्ताँ है मेरी ज़िंदगी की..." link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/ajab-dastan-hai/"><h3><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/Umrao-Jan.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-362" title="Umrao Jan" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/Umrao-Jan.jpg" alt="" width="180" height="320" /></a>अजब  दास्ताँ है मेरी ज़िंदगी की&#8230;</h3>
<p>एक  सदी – यानी सौ बरस. कितने सारे होते हैं ये सौ बरस ? इतने कि हम जिनसे  मोहब्बत करते हैं तो उनकी लम्बी उम्र की दुआएं  माँगते हुए कहते हैं – ‘आप  सौ साल जिएं’. इस दौर में भी कभी-कभार ऐसी दुआएं सच हो ही जाती हैं.</p>
<p>इसी  ख़्याल से सोचता हूं तो सोचता हूं आखिर किसने मांगी होगी उमराव जान के लिए  ऐसी दुआ. अब देखिए न उमराव की कहानी को सौ बरस के ऊपर हो चले हैं और यह न  अब तक सिर्फ ज़िन्दा है बल्कि दिन-ब-दिन उस पर जवानी आती जाती है. उम्र तो  बहुत सारे किस्सों और फसानों की उमराव से ज़्यादा है और वो अपनी पूरी  पुख्तगी के साथ हमारे साथ मौजूद हैं, मगर उमराव जान की बात थोड़ी अलग है.</p>
<p>मेरी  समझ से उमराव जान की इस जवानी का राज़ यह है कि उसकी पूरी कहानी अब तक किसी  खूबसूरत राज़ की तरह कुछ सामने है कुछ पसे-पर्दा है. वक़्त की हवाओं के  थपेड़े या फिर किसी दिले-आशिक़ की आह से इस राज़ से ज़रा पर्दा हटता है तो कभी  एक हक़ीक़त लगती है, कभी एक फसाना लगता है. और जो कुछ कसर बाकी थी उसे  मुज़फ्फर अली ने 1981 में रेखा को ‘उमराव जान’ बनाकर पूरा कर दिया.</p>
<p>कभी-कभी  कोई फनकार फसानों को भी हक़ीक़त की शक्ल दे देता है. रेखा ने यही काम ‘उमराव  जान’ के साथ किया है. अब इसके बाद तो कोई चाहकर भी यह नहीं चाहता कि कोई  इसे फसाना कहे.</p>
<p>मैं ख़ुद को भी उन्हीं में से एक गिनता हूं. और मुझे  ताज़ा दिलासा इस बात ने दिया है कि कुछ अर्सा पहले  उर्दू के नामवर प्रोफेसर  क़मर रईस साहब ने एक पत्रिका ‘ऐवाने-उर्दू’ में उमराव जान की एक असल फोटो  प्रकाशित की है. यह फोटो उन्हें हैदराबाद से किसी नवाब की लायब्रेरी से  मिली है. उस लायब्रेरी में रखी “उमराव जान ‘अदा&#8217; “ के पहले एडीशन के अन्दर  एक बहुत ही ज़र्द चेहरे वाला ख़स्ता हाल लिफाफा मिला जिसके अन्दर कैमरे से  खींची गई यह फोटो मौजूद थी.</p>
<p>यह बात पहले ही ज़माने पर ज़ाहिर है कि जब  १९०५ में मिर्ज़ा हादी रुस्वा की यह किताब पहली बार छपकर लोगों तक पहुंची  तो उसके फौरन बाद ही इस किताब के जवाब में एक दूसरी किताब आ गई थी ‘जुनूने  इंतज़ार याने फसाना-ए-मिर्ज़ा रुस्वा’. माना जाता है कि यह किताब उमराव जान  ने रुस्वा से नाराज़ होकर जवाब में लिखी थी. इसके बावजूद अब तक इस बात पर  बहस जारी है कि मिर्ज़ा रुस्वा ने अपनी निजी अनुभवों को ‘उमराव जान’ नाम का  एक किरदार घड़कर बड़ी कामयाबी से पेश किया है. इतनी कामयाबी से कि वह कदम-कदम  पर असल लगता है.</p>
<p>अब हक़ीक़त जो हो लेकिन यह सही है मिर्ज़ा हादी  रुस्वा की बदौलत हम सब को कुछ खूबसूरत ग़ज़लें, कुछ बेहतरीन संगीत और कुछ  फिल्में मिल गईं.</p>
<p>इतना सब कह चुकने के बाद यह ठीक नहीं है कि मिर्ज़ा  रुस्वा और उमराव के बारे में कोई और बात ही न करें. मिर्ज़ा मुहम्मद हादी  रुस्वा (1857 से 1931) उर्दू,अरबी,फारसी, अंग्रेज़ी,लैटिन और दूसरी कई  ज़बानों के जानकार थे. लखनऊ में पैदा हुए,पले,बड़े. शायरी का शौक़ लगा तो उस  दौर के मशहूर उस्ताद दबीर ने मदद की.</p>
<p>यूं तो उन्होने कई किताबें  लिखीं और अंग्रेज़ी किताबों के उर्दू मे अनुवाद किए लेकिन  ‘उमराव जान अदा’  उनकी अकेली पहचान है.</p>
<p><strong>कि बचपन किसी का, जवानी किसी की </strong></p>
<p>मुज़फ्फर अली की ‘उमराव जान’के संगीत और रेखा की बेमिसाल अदाकारी  ने इस कहानी को इसी एक फिल्म के साथ जोड़ कर रख दिया. हक़ीक़त यह है कि इसी  कहानी पर सबसे पहले निदेशक एस.एम.यूसुफ ने 1958 में एक फिल्म बनाई थी  ‘मेहंदी’. पाकिस्तान में भी 1972 में ‘उमराव जान अदा’ के नाम से फिल्म बनी  और 2003 में जियो टीवी ने इसे सीरियल के रूप में पेश किया. लेकिन पाकिस्तान  में भी 1981 वाली ‘उमराव जान’ ही ज़्यादा प्रसिद्ध है. 2006 में भी  जे.पी.दत्ता ने अभिषेक और ऎश्वर्या को लेकर फिल्म बनाई मगर वो शहीद हो गई.</p>
<p>जब  ज़रा ‘उमराव जान’ में ख़य्याम साहब की लासानी बन्दिशों, आशा भोंसले की मद्धम  पर आकर इठलाती गायकी और शहरयार की खूबसूरत शायरी की छांव से ज़रा बाहर  निकलकर पीछे देखता हूं तो मुझे 1958 की ‘मेहंदी’ नज़र आती है. फिल्म में  नवाब  सुल्तान वाली भूमिका अजीत ने और अमीरन उर्फ उमराव जान  की भूमिका में  थीं जयश्री. जयश्री मतलब  वी.शांताराम की पत्नी और अभिनेत्री राजश्री की  मां. पति से अलग होने के बाद यह उनकी पहली फिल्म थी.</p>
<p>यह फिल्म अभिनय  और मेकिंग के लिहाज़ से 1981 की फिल्म से काफी कमज़ोर पड़ती है लेकिन इसका  संगीत और शायरी अपनी तरह से बहुत लाजवाब है. यह शायद संगीतकार रवि की  बेहतरीन फिल्मों में से एक है. ख़ुमार बाराबंकवी की लाजवाब शायरी ने उमराव  जान की पीड़ा को बेहद खूबसूरत लफ्ज़ दिये हैं.</p>
<p>इस फिल्म में ज़्यादातर  गीत लता मंगेशकर के गाए हुए हैं. मुझे यकीन है आपको भी याद होंगे. ‘<strong>अजब दास्तां है  मेरी ज़िन्दगी की, कि बचपन किसी का, जवानी किसी की / मुक़द्दर ने मुझसे ये क्या दिल्लगी की / कि बचपन  किसी का, जवानी किसी की</strong>’. उमराव पर फिल्माई गई लगभग हर ग़ज़ल के  मतले मतलब आखिरी शेर में ख़ुमार साहब ने बहुत खूबसूरती से शायर की जगह  उमराव के तख़ल्लुस ‘अदा’ का इस्तेमाल भी किया है. आख़िर को उसे फिल्म में एक  शायरा के तौर पर भी दिखाया गया है. <strong>‘सिखाया गया है इशारों पे चलना / निगाहें  बदलना, दिलों को मसलना / ‘अदा’ हर अदा है मेरी बेक़सी की’. </strong></p>
<p>दूसरा गीत भी क्या गीत है  भई वाह.<strong> ‘अपने किये पे कोई पशेमान हो गया / लो और मौत का सामान हो गया’</strong>. और  फिर आखिर में अदा. ‘<strong>’ये बहकी-बहकी बातें, भरी बज़्म में अदा / ये आज क्या  तुझे अरे नादान हो गया’.</strong></p>
<p>दो और खूबसूरत नगीने. <strong>‘प्यार की दुनिया लुटेगी हमें मालूम न था / दिल की दिल ही में रहेगी, हमें मालूम न था’</strong>. दूसरा है ‘<strong>अदाओं मे शोखी, निगाहों में मस्ती / लड़कपन मुझे दे गया जाते-जाते’</strong>. इसी के आखिर में है कि ‘ <strong>अदा कोई अपना नहीं है जो समझे, मेरे दिल की धड़कन, मेरे दिल की बातें / किसी के न कानो में आवाज़  पहुंची, ज़ुबां थक गई है सुनाते-सुनाते’. </strong></p>
<p>इन सबके ऊपर मेरे दिल में  जिस चीज़ न अपने लिए एक ख़ास जगह बनाई है वह क़ामिल रशीद की लिखी हुई है.  अन्दाज़ साहिर लुधियानवी वाला है. ज़रा देखिए.</p>
<p><strong>ये अफसाना नहीं है सुनने वालों दिल की बाते हैं</strong></p>
<p><strong> सियाही ग़म की है वैसे बड़ी रंगीन रातें हैं</strong></p>
<p>यूं  तो बहुत लम्बी नज़्म है लेकिन कम से कम एक हिस्सा और सुन लीजिए.</p>
<p><strong>है गुस्ताख़ी मगर कहना है कुछ दुनिया से, </strong></p>
<p><strong>मर्दों से   शरीफों, मनचलों, मुल्लां से, आवारगर्दों से </strong></p>
<p><strong> है बेपर्दा मगर ताने दिए जाते हैं पर्दों से </strong></p>
<p><strong>ये अफसाना नहीं है&#8230; </strong></p>
<p>अगर आपने ‘उमराव जान’  (1981) देखी है तो आपके लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि फिल्म फिल्म  ‘मेहन्दी’ में उस्ताद जी का रोल ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के संगतराश – कुमार ने निभाया  था जिसे बाद में भारत भूषण ने निभाया. इस फिल्म में उन पर हेमंत कुमार का  गाया एक गीत भी फिल्माया गया है – ‘<strong>बेदर्द ज़माना तेरा दुश्मन है  तो क्या है / दुनिया में नहीं जिसका कोई उसका ख़ुदा है</strong>’.</p>
<p>इस सारी बात का लबो-लुब्बाब  यह है कि ‘उमराव जान’ के नाम के साथ अकेली एक फिल्म को याद किया जाता है  जबकि ‘मेहंदी’ भी इसी उपन्यास पर आधारित थी और इसमें खूबसूरत संगीत था.  फिल्म की छोड़िए पर हो सके तो आप इसका संगीत ज़रूर सुनिये और मुझे भी बताइये  कि आपको यह कैसा लगा.</p>
<p>एक बात और. उमराव जान ख़ुद एक अछी शायरा थीं.  पुस्तक में उसकी शायरी के कुछ खूबसूरत नमूने मौजूद हैं.</p>
<p>किसको  सुनाएं हाल दिले-ज़ार ऎ ‘अदा’  आवारगी में हमने ज़माने की सैर की</p>
<p>***</p>
<p>शब-ए-फुरकत  बसर नहीं होती   नहीं होती, सहर नहीं होती   शोर-ए-फरयाद अर्श तक पहुंचा   मगर उसको ख़बर नहीं होती</p>
<p>लीजिए  जिस बात की ‘उसको’ तब ख़बर नहीं हुई उस बात की ख़बर अब सारे ज़मने में है.  इसी लिए तो चचा ग़ालिब ने कहा है कि ‘आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक’.</p>
<p>और&#8230;</p>
<p>इस  नफे-नुकसान की गणित से चलती दुनिया में जब कोई लाभ-हानि से हटकर सोचता है  तो बहुत प्यारा लगता है. फिल्म ‘ब्लू अम्ब्रेला’ को देखे काफी दिन बीत चुके  हैं पर पंकज कपूर की बात अब तक साथ चल रही है.</p>
<p>फिल्म में पंकज कपूर  का दिल  एक नीले रंग के खूबसूरत छते पर आ जाता है जो कि एक बच्ची के पास  है. जब तमाम प्रलोभनों के बावजूद वह बच्ची नन्दू (पंकज कपूर) को छाता बेचने  से इंकार कर देती है तो वह चोरी पर उतारू हो जाता है.</p>
<p>जब उसे  समझाइश दी जाती है कि ऐसा नहीं करना चाहिए और आखिर एक मामूली से छाते के  लिए यह सब करने से क्या फायदा. तब ज़रा उसका सवालों से भरा जवाब देखिये.</p>
<p>‘ बारिश के पानी में नाव दौड़ाने से कोई फायदा होता है क्या ? सूरज को उस पहाड़ी के पीछे डूबते हुए देखने से कोई  फायदा है क्या ? आत्मा की ख़ुशी के लिए फायदा-नुकसान नहीं देखा जाता.’<br />
है न सौ टंच सची बात ? बस तो इस  घड़ी तो मैं चला अगले हफ्ते फिर करेंगे वही आत्मा की खुशी की बात – आपस की  बात .<br />
जय-जय.</p>
<p>(दैनिक भास्कर के रविवारीय &#8216;रसरंग&#8217; में प्रकाशित १५  नवम्बर २००९ )</p>
<p>rkeswani100@gmail.com</p>
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		<title>‘मैं ज़िंदा हूं यह मुश्तहर कीजिये&#8230;’ (साहिर-4)</title>
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		<pubDate>Sat, 03 Jul 2010 11:30:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[‘मैं ज़िंदा हूं यह मुश्तहर कीजिये&#8230;’ राजकुमार केसवानी आज फिर मौका है कि अपने एक राज़ को आपके साथ बांटकर बात शुरू करूं. वो राज़ यह है कि दिल इस ख़याल भर से उदास है कि आज आख़िरी बार साहिर की बात करनी है. यह जानते हुए भी कि इस आख़िरी का मतलब शायद बिल्कुल [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="vs-topic" topic="‘मैं ज़िंदा हूं यह मुश्तहर कीजिये...’ (साहिर-4)" link="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir4/"><p><a href="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/sahir-ludhianvi.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-295" title="sahir ludhianvi" src="http://www.thebhopalpost.com/wp-content/uploads/2010/07/sahir-ludhianvi.jpg" alt="" width="320" height="217" /></a></p>
<p>‘<strong>मैं ज़िंदा हूं यह मुश्तहर कीजिये&#8230;</strong>’</p>
<p><em>राजकुमार केसवानी </em><em></em></p>
<p>आज फिर मौका है कि अपने एक राज़ को आपके साथ बांटकर बात शुरू करूं. वो राज़ यह है कि दिल इस ख़याल भर से उदास है कि आज आख़िरी बार साहिर की बात करनी है. यह जानते हुए भी कि इस आख़िरी का मतलब शायद बिल्कुल आख़िरी नहीं है फिर भी दिल तो दिल है. बकौल ग़ालिब ‘ <strong>दिल ही तो है न संगो-ख़िश्त</strong><strong>, </strong><strong>दर्द से भर न आए क्यों / रोयेंगे हम हज़ार बार</strong><strong>, </strong><strong>कोई हमे सताए क्यों</strong>’.</p>
<p>पिछले दो दिन से लगातार 78 आर.पी.एम. का एक रिकार्ड सुने जा रहा हूं. साहिर की आवाज़ में साहिर की शायरी. एक तरफ ‘<strong>कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है</strong>’ और दूसरी तरफ ‘<strong>मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझको’</strong>. एच.एम.वी. ने जिस ज़माने में इसे रिलीज़ किया था उस वक़्त इसकी कीमत चंद रुपए थी, आज यह बेशकीमती है.</p>
<p>आप कभी आज़मा कर देखें, अपने किसी अज़ीज़ की आवाज़ को उसकी ग़ैर-मौजूदगी में किसी टेप, किसी सी.डी. पर सुन लें. आपको लगेगा, वो अपना यहीं मौजूद है. आप उससे बात करने लगेंगे. बात हो भी जाएगी. ये मेरा आज़माया हुआ नुस्ख़ा है. अब जैसे दो दिन से मैं इसी फार्मूले से साहिर साहब से बात कर रहा हूं. आप सब की तरफ से बात कर रहा हूं, सो उसे सुनाना भी तो आप ही को है.</p>
<p>‘साहिर साहब, मैं आपसे नाराज़ हूं. आपके नाम का मतलब अगर जादूगर हुआ तो क्या आप जब चाहे आवाज़ बन जाएंगे ? जब चाहे सिर्फ एक ख़ामोश तस्वीर हो जाएंगे ? जब जी चाहेगा, मर जाएंगे ?’</p>
<p>‘मैं ज़िन्दा हूं यह मुश्तहर कीजिए / मेरे क़ातिलों को ख़बर कीजिए’.</p>
<p>ये क्या ? मैने सवाल आवाज़ से किया था और जवाब किताब से आया ! इस दुनिया का यही कमाल है. सवाल कभी अकेले पैदा नहीं होते, जवाब भी उनके साथ ही पैदा होते हैं. इतना ज़रूर होता है कि पैदा होती ही दोनो को कोई अलग-अलग जगह छुपा देता है. इन दोनो के बीच फासला सिर्फ सच का होता है. सवाल करने वाले की आवाज़ में ज़रा सच्चाई हुई तो जवाब इस कायनात के किसी भी ज़र्रे से आवाज़ बनकर सामने आ जाता है. मगर होता अक्सर ऐसा है कि हम जवाब की उम्मीद में अपने कान उसी दिशा में लगा लेते हैं जिधर मुंह करके सवाल किया होता है. नतीजा – जवाब, कई बार, अपनी पूरी आवाज़ के साथ भी एक सवाल भर रह जाता है.</p>
<p>ख़ैर! मेरे सवाल का जवाब तो मुझे मिल गया है. साहिर ज़िन्दा हैं. साहिर के ‘क़ातिलों’ को ख़बर रहे. सच कहूं तो पिछले चार हफ्ते में आप सबने भी जितनी ज़ोर से अपनी आवाज़ बुलन्द करके मुझे यह ख़बर दी है उसके बाद मैं बेहद मुतमईन हूं कि ज़िन्दगी ने भले साहिर से धोखा किया हो लेकिन वक़्त आज भी उसी के साथ है.</p>
<p>सच मानिए ज़िन्दगी ने साहिर के साथ बड़ा ज़लील धोखा किया. वो तो जीना चाहता था. पंजाबी के अज़ीम शायर शिवकुमार बटालवी की भरी जवानी में मौत की ख़बर सुनकर साहिर ने कहा था ‘ &#8230;<strong>वो शिव</strong><strong>, </strong><strong>फूल बन गया होगा या तारा. हम जो मरेंगे तो करेले का फूल ही बनेंगे. क्योंकि जवानी में तो हम मरने वाले नहीं’</strong>.</p>
<p>अब कोई बताए कि आख़िर साहिर से अज़ीमो-शान शायर के लिए महज़ 59 साल की उम्र, जवानी में मौत नहीं तो क्या है ?</p>
<p>लेकिन इतना तय है कि साहिर जब तक जिए , ख़ूब जिए. जितना ख़ुद के लिए जिए, उससे कहीं ज़्यादा समाज के लिए जिए. अपने लिए बस शामें सजाईं. ज़माने को अपनी शायरे दी. ऐसी शायरी जो नौजवानी के अरमानों की बात करती है. ऐसी शायरी जो ज़माने की ख़ुशियों से महरूम लोगों के हक़ की बात करती है. शायरी जो औरत को ख़ुदा का दर्जा देती है.</p>
<p>ज़रा ग़ौर फरमाएं, साहिर जब अपनी बात करते हैं तो कहते हैं ‘मैं पल दो पल का शायर हूं’ अपने दुनियावी व्यवहार में भले ही अखड़पन और अहंकार दिखाते हों लेकिन जब शायर बनकर अपनी बात करते तो कहते ‘<strong>मैं पल दो पल का शायर हूं</strong><strong>, </strong><strong>पल दो मेरी हस्ती है</strong><strong>, </strong><strong>पल दो पल मेरी कहानी है</strong>’ यहां ख़ुदनुमाई से इतनी दूरी कि उनकी ग़ज़लों के मक़्ते में आपको शायद ही कभी उनका तखल्लुस ‘साहिर’ मिले.</p>
<p>दिमाग़ में चाहे जितनी दौलत की गर्मी रहे लेकिन दिल इंसानी अहसास से इस क़दर लबरेज़ कि छलक-छलक पड़ता था. इसकी एक मिसाल निदा फाज़ली के एक किस्से से बख़ूबी समझ आती है. यह उस दौर की बात है जब निदा बम्बई में स्ट्र्गल कर रहे थे.</p>
<p>‘&#8230;अक्सर मेरी रातें जांनिसार अख़्तर के घर या साहिर लुधियानवी की ‘परछाइयां’ में बीततीं. साहिर साहब शाही मिजाज़ के आदमी थे. उनकी यह शहंशाहियत उन्हें विरासत में मिली थी&#8230; (वहां) बड़िया खानो व महंगी शराबों का लुत्फ उठाता था. &#8230;एक रात शायद मुझे नशा ज़्यादा हो गया था, और उस नशे में मैं प्रेक्टीकल होने के बजाय किताबी ज़्यादा हो गया था’.</p>
<p>निदा साहब ने नशे की उसी झोंक में साहिर के सामने ही साहिर की शायरी के मुकाबले फिराक़ गोरखपुरी और फैज़ अहमद ‘फैज़’ की तारीफ कर दी. नाराज़ होकर साहिर ने निदा को दस-बीस सुनाई और बाहर निकल जाने का हुक्म दे दिया. इस बीच साहिर की मां भी बाहर निकल आईं थी. अब मैं फिर से निदा को ही कोट कर रहा हूं, बस ज़रा ग़ौर से सब कुछ देखिएगा और तय कीजिएगा.</p>
<p>“मां जी, देखा. मैने इसकी हालत पर तरस खाया और नतीजे में यह पाया. मेरे सामने ही मेरी बुराई कर रहा है’ दूसरों की तारीफ को वह अपनी बुराई मानते थे.</p>
<p><strong>मैं मेज़ से उठकर दरवाज़े की तरफ बढ़ा ही था कि देखा</strong><strong>, </strong><strong>साहिर मेरे कन्धे पर हाथ रखकर कह रहे हैं</strong><strong>,</strong><strong> ‘</strong><strong>नौजवान</strong><strong>,</strong><strong> इतनी रात को जा रहे हो&#8230;खाना नहीं खा रहे हो</strong><strong>, </strong><strong>तो ये रुपए रख लो.’</strong><strong> वह मुझे कुछ देना चाहते थे लेकिन मैने नहीं लिया और तेज़ क़दमों से नीचे उतर आया”</strong><strong>. </strong></p>
<p>ऐसा था बच्चों की तरह रूठ जाने वाला और इंसानों की तरह इंसानों की सोचने वाला साहिर लुधियानवी.</p>
<p><strong>आस्मां पे है ख़ुदा और ज़मीं पे हम </strong></p>
<p>साहिर ने लिखा था ‘ <strong>आस्मां पे है ख़ुदा और ज़मीं पे हम / आजकल वो इस तरफ देखता है कम</strong>’(फिर सुबह होगी). मुझे यकीन है कि हम सब इस बात को तहे-दिल से मानते हैं. मैं इसे न सिर्फ मानता हूं बल्कि इस बात पर मेरा ‘उससे’ झगड़ा भी है. आख़िर को जिस ज़मीन पर हमें भेज दिया वहां किसी तरह का इंसाफ की पाबंदी वाला  एक निज़ाम तो हो. अगर ये मुमकिन नहीं तो फिर ये जहां क्यों हो ?</p>
<p>साहिर ने तमाम उम्र इसी नाइंसाफी, ग़ैर बराबरी, वहशत और दहशत के ख़िलाफ आवाज़ बुलन्द की. संगीतकार ख़य्याम, जिनके साथ साहिर ने ‘फिर सुबह होगी’, ‘कभी-कभी’ और ‘शगुन’ जैसी फिल्में की, कहते हैं – ‘<strong>क्या हम इस बात की कल्पना भी कर सकते है कि साहिर के अलावा किसी दिन</strong><strong>, </strong><strong>किसी गीत में ‘</strong><strong> मैं देखूं तो सही दुनिया तुम्हे कैसे सताती है / कोई दिन के लिए</strong><strong>, </strong><strong>अपनी निगहबानी मुझे दे दो’</strong><strong>(शगुन) जैसी बात कोई दूसरा कह सकेगा </strong><strong>?</strong><strong> </strong></p>
<p>यह बात इसलिए ज़्यादा मह्त्वपूर्ण है क्योंकि यह बात नायक से उसकी प्रेमिका कह रही है. वह भी उस दौर में जिस दौर में औरत को ‘अबला’ की पहचान दी गई थी. लेकिन साहिर की ‘अबला’ ज़माने को चुनौती देती है कि उसकी निगहबानी में मुश्किल में फंसे ‘मर्द’ को छूकर दिखा दे.</p>
<p>इन्ही वजहों से यश चौपड़ा जैसे फिल्मकार कहते हैं कि ‘साहिर के गीतों से पूरी फिल्म का मय्यार ऊंचा हो जाता था’. यही वजह थी कि बी.आर.चौपड़ा की लगभग सारी फिल्मों के गीतकार साहिर ही रहे, भले ही संगीतकार एन.दत्ता हों, ओ.पी.नैयर हो या फिर रवि.</p>
<p>यश जी ने तो अपनी फिल्म ‘कभी कभी’ (76) में साहिर के गीतों के सहारे बना ली लेकिन 1980 में साहिर की मौत के बाद भी वो उनके दिलो-दिमाग से परे न हुए.सो 1998 में उन्होने साहिर की ज़िन्दगी पर एक फिल्म बनाने का इरादा ज़ाहिर किया था. फिल्म में अमिताभ बच्चन को साहिर की भूमिका, शबाना आज़मी को अमृता प्रीतम की भूमिका के लिए चुन भी लिया था और इस त्रिकोण की दूसरी नायिका का चयन के लिए कई नाम थे. इस दूसरी नायिका का चरित्र गायिका सुधा मल्होत्रा पर आधारित था.</p>
<p>अब मैं आता हूं उस ऊपर वाली बात पर वापस कि ‘&#8230;आजकल वो इस तरफ देखता है कम’. उसने साहिर को फन और कामयाबी दोनो दिए लेकिन उसके बदले में उससे क्या-क्या न छीना गया. बचपन में बाप का साया. जवानी में दर्जन भर नाकाम इश्क़ और तन्हाई. तन्हा-तन्हा सांसों के साथ मां का आंचल थामे-थामे जीते रहे.</p>
<p>1978 में मां के देहांत के बाद साहिर टूट गए. इसी के बाद उन्हें पहली बार हार्ट अटैक हुआ. दो साल बाद वे अपने टूटे हुए दिल के साथ ख़ुद भी इस दुनिया को अलविदा कह चले.</p>
<p>गोया कि जीते जी हुए ज़ुल्म काफी न थे, सो मरने के बाद भी यह सिलसिला बना हुआ है. 1970 में उन्होने बेहद शौक़ से एक विशाल घर बनाया था, जिसका नाम है ‘परछाइयां’. इस नाम की उनकी एक बेहद ख़ूबसूरत नज़्म भी है.</p>
<p>आज उस घर का कोई वारिस नहीं है सो कई लोगों ने उस पर कब्ज़ा जमा रखा है. साहिर के उस ड्राइंग रूम मेंजहां हर शाम बेहतरीन स्काच और लज़ीज़ ख़ानों की दावतें होती थीं, कुछ बिल्डरों की निगाह में है. सैंकड़ों अप्रकाशित गीत,ग़ज़ल रद्दी में तुलकर बिक चुके हैं.</p>
<p>मौत के बाद उन्हें जुहू के कब्रिस्तान में एक जगह मिली थी वह भी अब बुलडोज़रों की ज़द में आकर मिट चुकी है.</p>
<p>साहिर के लिए यह नया नहीं है. 1947 के बंटवारे के बाद साहिर मां की वजह से लाहौर में रुक गए थे. उस समय वे पत्रिका ‘सवेरा के सम्पादक थे. जब तक वे वापस हिन्दुस्तान आते तब तक कस्टोडियन ने लुधियाना में उनके मकान को भी भारत छोड़कर जाने वालो में शुमार करके राजसात कर किसी और के नाम कर दिया. तमाम कोशिशो के बाद भी साहिर उस मकान को वापस हासिल न कर सके.</p>
<p>और&#8230;</p>
<p>और जाते-जाते, पिछली बार ‘इश्क़-इश्क़’ में ‘कोहे-तूर’ की जगह ‘कोहे-नूर’ छप गया है सो ठीक कर लें. दूसरी बात आपने साहिर के बहुत सारे गीत शामिल करने की फरमाइश की थी पर एक भी नहीं कर पाया. मैं खुद भी उन गीतों के साथ ही साहिर की शायरी, उनकी और ढेरों बातें कहना चाहता था लेकिन वही न कि अपना सोचा हुआ सब होता कहां है.</p>
<p>तीसरी और आज की आख़िरी बात. लगातार चार हफ्ते साहिर की बात करते-करते मैं इतना साहिरमय हो चुका हूं कि अब अगली बार किसी दूसरे गीतकार की बात तो नहीं ही कर पाऊंगा. कुछ एंड-बेंड करके दिमाग को ज़रा हल्का करूंगा. और फिर जब होश में आया तो इस गीतकारों वाले सिलसिले को दुबारा शुरू करेंगे. नहीं, मतलब, अपनी तो आपस की बात है न तो छुपाने की क्या ज़रूरत, खुल के कहो, ख़ुश रहो.</p>
<p>तो बस फिर मिलते हैं अगले हफ्ते. तब तक. जय-जय.</p>
<p>(<strong><em>दैनिक भास्कर</em></strong><em> के रविवारीय परिशिष्ट <strong>रसरंग</strong> में 2 मई 2010 को प्रकाशित</em>)</p>
<h5>&#8216;<a title="Sahir - 2" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-1/" target="_blank">तुम्हारे शहर में आए हैं हम, साहिर कहां हो तुम</a> (साहिर-1)</h5>
<h5>&#8216;<a title="Sahir - 2" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-2/" target="_blank">तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा</a>&#8216; (साहिर-2)</h5>
<h5>&#8216;<a title="Sahir - 3" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir-3/" target="_blank">अल्ला तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम</a>&#8216; (साहिर-3)</h5>
<h5><a title="Sahir-4" href="http://www.thebhopalpost.com/index.php/2010/07/sahir4/" target="_blank">मैं ज़िंदा हूं यह मुश्तहर कीजिये</a>…(साहिर-4)</h5>
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