एक थे गुलशन नंदा
एक थे गुलशन नंदा
राजकुमार केसवानी
एक थे गुलशन नंदा. हिन्दी में पल्प फिक्शन उर्फ लुगदी साहित्य के सबसे ज़्यादा बिकने वाले लेखक. अपने दौर, 60 से लेकर 80 के दशक तक, की दर्जनों सिल्वर जुबिली, गोल्डन जुबिली फिल्मों के लेखक. हिन्दी साहित्यकारों के बीच एक घृणित नाम और उस दौर की युवा पीढ़ी के आराध्य देव.
यह वह दौर था जब एक तरफ फिल्म ‘मुग़ल-ए-आज़म’(1960) की हीरोइन अनारकली सीना ठोक कर ज़माने के सामने ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ गाकर अपनी मोहब्बत का इज़हार अकेले में आशिक के सामने करती थी और किसी दिन गुलशन नंदा के किसी उपन्यास की हीरोइन की तरह चुपके से उसके साथ भाग भी जाती थी. उस वक़्त के अखबार ऐसी कहानियों से भरे रहते थे. ऐसी ही एक स्टोरी मुझे अब तक याद है. इस खबर में कहा गया था कि जाते समय उसके तेवर थे ‘प्यार किया तो डरना क्या’ और अब लौटकर गा रही है – ‘मोह्ब्बत की झूठी कहाने पे रोये’. दोनो ही गीत फिल्म ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के हैं.
खैर साहब, किस्सा कोत्ताह यह कि नाचीज़ ने भी अपने लड़कपन में गुलशन नंदा की कम से कम दो-एक किताबें तो ज़रूर पढ़ी हैं. इतनी कम इसलिए नहीं कि मुझे उसी उम्र में अछे-बुरे की तमीज़ आ गई और सिर्फ महान लेखकों को ही पढ़ता था बल्कि इसलिए कि मुझे इस नाम से ही खुन्नस थी. उस वक़्त किताबें खरीदकर पढ़ने की हैसियत न थी सो गली-मोहल्ले की छोटी-छोटी लाइब्रेरी से किराये पर लेकर पढ़ते थे. इन लाइब्रेरियों में जिसे देखो गुलशन नंदा की किताब मांगता था. बस इसी बात पर खुन्नस थी. मेरे पसंदीदा लेखक 60 के उस शुरूआती दौर में मुंशी प्रेमचन्द, आचार्य चतुरसेन, गुरुदत्त, कृश्न चंदर, कुश्वाहा कांत, इब्ने सफी बी.ए., वेदप्रकाश काम्बोज वग़ैरह हुआ करते थे. 1967 में हिन्द पाकेट बुक्स की घरेलू लाइब्रेरी योजना और पत्रिका ‘सारिका’ ने इस धारा को पलट दिया. देश-विदेश के महान लेखकों से परिचय हुआ और थोड़ा सा मानसिक विकास भी हुआ. मगर मेरे इस तथाकथित विकास से गुलशन नंदा की सेहत पर ज़रा भी असर न पड़ा. उसकी किताबें पहले से भी ज़्यादा बिक रही थीं. बल्कि इसी वक़्त इन उपन्यासों पर फिल्में भी बनना शुरू हो गई और किताबों की ही तरह हिट भी होने लगी थीं.
आप इन फिल्मों की सूची पर नज़र डालिये. ‘काजल’ (1965), सावन की घटा’ (1966), ‘पत्थर के सनम’(1967), ‘नील कमल’ (1968), ‘खिलोना’ (1970), ‘कटी पतंग’ (1970), ‘शर्मीली’ (1970), ‘नया ज़माना’ (1971), ‘दाग़’ (1973), ‘झील के उस पार’ (1973), ‘जुगनू’ (1973), ‘जोशीला’ (1973), ‘अजनबी’ (1974), ‘भंवर’ (1976), ‘महबूबा’ (1976) वगैरह-वग़ैरह. 1987 में रिलीज़ हुई राजेश खन्ना, श्री देवी की फिल्म ‘नज़राना’ शायद उनकी अखिरी फिल्म थी. 16 नवम्बर 1985 को गुलशन नंदा की मृत्यु हो चुकी थी.
वो भी इक दौर था
एक लम्बे समय तक देश भक्ति की प्रबल भावनाओं से ओत-प्रोत स्वतंत्रता संग्राम में जुटे भारतीय समाज को 1947 में आज़ादी नसीब हुई. यह एक ऐसी भावुकता का दौर था जो आज़ादी के बाद भी एक लम्बे अरसे तक कायम रहा. बल्कि कहा जाए तो 1991 में शुरू हुई उदारीकरण के दौर तक यह कायम रहा. 1991 के बाद से भावुकता घोषित रूप से मूर्खता है. बाज़ार द्वारा स्थापित व्यवहारिकता ‘आर्डर आफ द डे’ बन गया है.
ख़ैर, मैं यह बता रहा था कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान और आज़ादे के कोई 40-45 साल तक समाज के अधिकांश संस्कार भावुकता से भरे थे. इसी दौर में मद्रास के जेमिनी, ए.वी.एम., प्रसाद प्रोडक्शंस, जैसे फिल्म निर्माण कम्पनियों ने इस देश के लोगों को सिनेमा घरो में रुला-रुला कर इतना पैसा कमाया है कि यह अन्दाज़ लगाना मुश्किल है कि हर आंसूं की कीमत क्या थी.
इसी दौर में हिन्दी के कुछ लेखक सामने आए जिन्होने जमकर आंसुओं का कारोबार किया. इन लेखकों में दत्त भारती, प्रेमशंकर बाजपेयी, कुशवाहा कांत, राजवंश, रानू के नाम याद किये जाते हैं लेकिन इन सबका सरताज था गुलशन नंदा. यह लेखक बकौल उसके पढ़ने वालों के ‘बहुत रुलाता था’. मगर मुझे लगता है कि उनके पास पूरा ‘मसाला फार्मूला’ था जिसमें बहुत ही सरल भाषा में संयमित सेक्स वार्ता, संस्कार की दुहाई, अमीरी-ग़रीबी, न्याय-अन्याय और प्रेम की सर्वोचता का भाव समिलित था.
अब मिसाल के तौर अर उनकी एक पुस्ताक ‘जलत्ती चट्टान’ का यह अंश देखिये, जिसे पुस्तक बेचने को प्रकाशक ने विज्ञापित किया है. ‘नदी के शीतल जल में दोनो बेसुध खड़े एक-दूसरे के दिल की धड़कने सुन रहे थे. पार्वती का शरीर आग के समान तप रहा था. ज्यों-ज्यों नदी की लहरें शरीर से टकरातीं भीगी साड़ी उसके शरीर से और भी लिपटती जाती, राजन को इन लहरों पर क्रोध आ रहा था.’.
अब ज़रा एक और मिसाल देखिये. इस बार पुस्तक का नाम है ‘नीलकंठ’.
‘ संध्या और बेला दोनों रायसाहब की बेटियां…संध्या शांत स्वभाव वाली, जबकि बेला शोख, रंगीन मिजाज। बेला बम्बई में पढ़कर वापस लौटती है तो पाती है कि संध्या और आनन्द एक दूसरे से प्यार करते हैं। लेकिन बेला भी आनन्द को चाहती है। एक दिन बेला को पता चलता है कि संध्या राय साहब की गोद ली हुई पुत्री है तो वह क्रोधित हो यह सब संध्या को बता देती है। संध्या को जब अपनी माँ का पता चलता है तो वह उनसे मिलने गांव पहुँचती है जो कि गरीबों की बस्ती है और संध्या की मां उस गांव में चायखाना चलाती है। इस बीच धोखे से, अपने मोहजाल में फंसाकर बेला आनन्द से विवाह कर बंबई चली जाती है। बंबई में बेला को फिल्मों में काम करने का मौका मिलता है लेकिन आनन्द को यह सब पसन्द नहीं और उसकी हालत पागलों जैसी हो जाती है।
क्या आनन्द का पागलपन दूर हुआ ? क्या बेला एक फिल्म अभिनेत्री के रूप में सफल हो सकी ? क्या संध्या के जीवन में कोई और पुरुष आया ? इन सब जिज्ञासा भरे प्रश्नों का उत्तर आप इस उपन्यास में पा सकते हैं जो कि कलम के जादूगर गुलशन नंदा द्वारा लिखा गया है।‘.
तो साहब ऐसे थे गुलशन नंदा. उनकी पैदाइश की सही तारीख तो मालूम नहीं पर तीस के दशक में उनकी पैदाइश मानी जाती है. 60 के दशक में बतौर लेखक दिल्ली के प्रकाशक एन.डी.सहगल एण्ड संस के ज़रिये सामने आए. कहते हैं उस समय उन्हें एक पुस्तक के मात्र 100-200 रुपए ही मिलते थे. मगर उनकी पुस्तकों की कामयाबी के साथ-साथ उनकी कीमत भी बड़ती गई. एक दौर ऐसा आया कि उनके प्रकाशक उनको मुंहमांगे पैसे पेशगी देने लगे.
सहगल के बाद इनका सम्बंध बना स्टार पाकेट बुक्स के अमरनाथ वर्मा से और उनकी 1 रुपए और 2 रुपए वाली पाकेट बूक्स ने धूम मचा दी. प्रकाशक और लेखक दोनो खुश. 6.5 प्रतिशत की दर से बनने वाली हज़ार की रायल्टी लाखों में जा पहुंची. रिश्ते को एक ठोस आधार देने अमरनाथ जी ने गुलशन नंदा से उनकी बेटी का हाथ अपने बेटे के लिए मांग लिया. दोनो समधी हो गए और रिश्ता सदा के लिए पक्का हो गया.
यह गुलशन नंदा का युग था. फिल्म वालों ने भी उन्हें हाथों-हाथ लिया. राम माहेश्वरी और पन्नालाल माहेश्वरी की फिल्म ‘काजल’ से हिट फिल्मों का ऐसा सिलसिला चला कि रुकता ही न था. गुलशन नंदा का नाम फिल्म की हिट होने की ज़मानत बन गया. 20 साल तक चले इस रिश्ते में फिल्मी दुनिया के सारे दिगज निर्माता-निदेशकों ने इनकी कहानियों और पटकथाओं पर सफल फिल्में बनाईं.इनमें शामिल हैं यश चौपड़ा, शक्ति सामंत, प्रमोद चक्रवर्ती, एल.वी.प्रसाद, रामानन्द सागर.
इस सबके बावजूद गुलशन नंदा के मन में एक टीस थी. वह थी हिन्दी साहित्य में अस्वीकृति की. तमाम सामाजिक स्वीकृति के बावजूद वहां उन्हें स्वीकार नहीं किया गया. और तो और हिन्दी की प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्था हिन्द पाकेट बुक्स ने उन्हे अपने स्तरीय प्रकाशनो के बीच स्थान देने से इंकार की पालिसी बना रखी थी.
70 के दशक में आखिर यह दीवार भी टूटी. हिन्द पाकेट बुक्स ने अपनी हार मानते हुए पाठकों के फैसले का समान करते हुए गुलशन नंदा से प्रकाशन के लिए पुस्तक मांगी. इस बार गुलशन नंदा ने प्रसताव अपनी शर्तों पर ही स्वीकार किया. मुंहमागी अग्रिम राशि ली. पुस्तक के प्रचार की शर्ते मनवाईं. मतलब उनकी हर चीज़ मानी और ‘झील के उस पार’ नामक उपन्यास प्रकाशित किया. इसी पुस्तक पर लगभग पुस्तक के रिलीज़ के आसपास ही 1973 में भप्पी सोनी निदेशित, धर्मेन्द्र-मुमताज़ और योगिता बाली के साथ इसी नाम की फिल्म भी रिलीज़ हुई.
हिन्दी पुस्तक प्रकाशन के इतिहास शायद ही इससे पहले या फिर इसके बाद में इस तरह का प्रोमोशन किसी किताब का हुआ हो. देश भर के अखबारों,पत्रिकाओं,रेडियो पर प्रचार के अलावा होटल,पान की दुकान से लेकर सिनेमाघरों तक बड़े-बड़े प्रचार पोस्टर और खास तौर डिज़ाईन किए गए टांगने वाले बाक्स लगाए गए. इन सब में इस बात पर ज़ोर था कि पहली बार हिन्दी में किसी पुस्तक का पहला एडीशन ही 5 लाख रिपीट पांच लाख कापी का छापा गया है.
अब इस सचाई को तो लेखक और प्रकाशक जाने कि सच में कितनी छपीं मगर इतना ज़रूर सच है कि इस प्रचार के नतीजे में यह पुस्तक जिस क़दर बिकी, उसके बाद शायद ही कोई दूसरी हिन्दी किताब बिकी हो. यह गुलशन नंदा की जीवन का शिखर काल था.
यही वह समय था जब उनकी पुस्तकें अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद होकर उसी धड़ले से बिक रहीं थी. अंग्रेज़ी और अन्य विदेशी भाषाओं में धूम मच गई थी. ‘कटी पतंग’ के चीनी भाषा के अनुवाद ने तो वहां बिक्री के रिकार्ड ही कायम कर दिए.
अछा एक और मज़े की बात बताता हूं. गुलशन नंदा को हमेशा हिन्दी का लेखक कहा और माना जाता है लेकिन सचाई यह है कि नंदा साहब को हिन्दी आती ही नहीं थी. वे तो लिखते ही उर्दू में थे. उनके लिखे को हिन्दी में उनके बहनोई बृजेन्द्र स्याल बदलते थे.
और…
और आखिरी बात यह कि दिल्ली में एक चाय बेचने वाला गुलशन नंदा की प्रेरणा से ही खुद भी लेखक बन गया. अब तक उसकी एक दर्जन से ज़्यादा पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और बाकयदा बिकी हैं. इस लेखक का नाम है – लक्ष्मण राव.
मूलत अमरावती रहने वाला 55 वर्षीय लक्ष्मण राव मराठी भाषी है. काम की तलाश में दिल्ली पहुंचा और अब भी दिल्ली में आई.टी.ओ के पास चाय बेचता है. गुलशन नंदा के लेखन से बहुत प्रभावित रहा और 1979 में खुद भी लेखक बन गया. नदी पर नहाने गए एक बचे की डूब जाने से हुई मौत से विचलित इस व्यक्ति ने लेखन को अपनी अभिव्यक्ति का ज़रिया बनाया. जब सारे प्रकाशकों ने पुस्तक छापने से इंकार कर दिया तो खुद ही अपनी प्रकाशन संस्था भारतीय साहित्य कला प्रकाशन के नाम से स्थापित की. अपनी पुस्तकें बेचने वह स्कूल-कालेज में जाता है और उसकी किताबें लोग खरीदते और पढ़ते भी हैं. सो बस लगातार लिखे जा रहा है. इस जज़्बे को सलाम.
अब सच बताऊं चाय का ज़िक्र करते-करते मुझे भी चाय की तलब हो आई है. बहुत देर से नहीं पी. और फिर अपनी बात भी तो पूरी होईच गई न. तो बस फिर क्या है. बोलो बात में बात,हो गई आपस की बात. अगले हफ्ते फिर से होगी, आपस की बात. तब तक.
जय-जय.
(दैनिक भास्कर के रविवारीय परिशिष्ट ‘रसरंग’ में पूर्व प्रकाशित)

















गुलशन नंदा पर अच्छी जानकारी है इस लेख में और आपका लिखने का अंदाज़. सचमुच बल्लीमारान की एक चश्मे की दुकान में काम करनेवाला गुल एक दिन इतना बड़ा लेखक बना कि बाद में उसने मुंबई में बंगला बनवाया, जिसका नाम रखा शीशमहल. पहली बार किसी बड़े पाए के लेखक को मैंने उनके ऊपर लिखते देखा है.
गुलशन नंदा साब शायद पहले भारतीय लेखक थे जिन्होंने सफलतापूर्वक पाठको की नब्ज़ पर हाथ रख अपने लेखन से एक पीड़ी का मनोरंजन करने के साथ खुद की दुनिया भी संवारी.वे एक आम आदमी थे (महान लेखक होने का दावा उन्होंने खुद कभी नहीं किया )आम आदमी की तरह लिखा और आम आदमी का क्रेज बने.भाई साहिब हमारी उस दौर की सारी पीडी उनकी दीवानी थी.आज लिव- इन और रिश्तों को कपड़ों के तरह बदलने के दौर का लेखन जो पाठक को परोसा जा रहा है, में भी गुलशन का मर्यादित रोमांस पढ़ा जा रहा है .यह उस सो -काल्ड पल्प लेखक की महानता है.
गुलशन साब को सभी ने पढ़ा होगा पर आपने अपने ही अंदाज़ में उनके बारे में रोचक जानकारी दी है, जो मेरे ख्याल से काफी कुछ हम आम पाठकों को नहीं थी , उसके लिए शुक्रिया. मैं आपके लिखे जिस प्रसंग पर मुस्कराया उसका अंश , नक़ल करता हूँ- इस खबर में कहा गया था कि जाते समय उसके तेवर थे ‘प्यार किया तो डरना क्या’ और अब लौटकर गा रही है – ‘मोह्ब्बत की झूठी कहाने पे रोये’. दोनो ही गीत फिल्म ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के हैं.
रफत
गुलशन नंदा क्या थे उस दौर में …ये बात इस लेख से ही जाहिर है..भले उन्हें मुख्यधारा के साहित्य में स्थान ना मिला हो मगर जनता के दिलों में तो यही बसे थे….गुलशन नन्दा पर इतना सारगर्भित लेख लिखने के लिए शुक्रिया……………..
शुक्रिया रफत आलम साहब.
शुक्रिया मौर्य जी.
प्रभात जी, आपकी इस मोहब्बत और नवाज़िश के लिए शुक्रिया. एक टिप्पणी में कहा गया है कि आपने भी गुलशन नंदा के बारे में लिखा है. मुमकिन हो तो उसे शेयर करें.
धन्यवाद.
Romani sahitya ke khuda the GULSHAN NANDA JEE..log mane ya n mane..aam pahtak ne unhe hi jyada padha hai…sahityakar kya padhate hain ye our bat hai…pathak tak asani se GULSHAN NANDA hi pahunchte the….
केसवानी साहब, बड़ा रस है आपकी ज़ुवान में. मज़ा आ गया. शुक्रिया.
can you send me the link related to your earlier post on film actor political party to my email malhotracollege@gmail.com
aapka jo beete lamho ko itni mohabbat se chhone ka andaaz hai kaabil e tareef hai……. shukriya
आज दोबारा पोस्ट पड़ा है .आप के लिखे -नंदा साहब को हिन्दी आती ही नहीं थी. वे तो लिखते ही उर्दू में थे.ने उस गंगा जमनी तहज़ीब की याद दिला दी. जिसकी पहली कतार में महान प्रेम चंद साब नज़र आते हैं .कितना वक्त बदल गाया है .उर्दू जों इसी घर में पैदा हुई परवान चढ़ी और आज भी आम जन की बोलचाल भाषा है मगर बदनसीबी एक वर्ग विशेष का तमगा लगवा कर आपने हालत पर रो रही हैऔर बतोर भाषा आखरी सांसे गिन रही है .साहब उर्दू का सूरज ढल गया है.जिन पर नाज़ था(खाकसार को कुछ नाम याद आरहे हैं) राजेद्र सिंह बेदी ,कुवर महेंद्र सिंह बेदी सहर ,ब्रज नारायन चकबस्त ,रघुपति सहाय फ़िराक ,नरेश कुमार शाद ,सुदर्शन फाकिर, आनंद नारायण मुल्ला और अब कुछ समय पहले कृष्ण बिहारी नूर जेसे शैदाई सब सो गए हैं.उर्दू पर रात का अँधेरा है.कल शायद हम से मर्सिया पढ़नेवाले भी ना रहें. आप जेसे ईमानदार तारीख बयान करने वालों के चलते एक उम्मीद है शायद उर्दू का सच अवाम तक पहुँचता रहे की यह अपनी ही बेटी है इसके प्रति हमारी बहुत ज़िम्मेदारी है.नंदा साब की याद के साथ उर्दू का ज़िक्र करने के किये बहुत शुक्रिया .
Mita ji, shayad isi vajah se vo itne popular bhi the.
शुक्रिया अनूप सेठी जी.
Vinayji, let me get some time to and shall do that.
Aapki mohabbat ki shukriya, Satishji.
रफत साहब, उर्दू किसी मज़हब की नहीं हिन्दुस्तान की ज़ुबान है. हिन्दुस्तानियों की ज़ुबान है. उर्दू को मज़हब के साथ जोड़ने वाले ख़ुद उसी की आसरे अपनी बात कह पाते हैं. हां, इस बात का अफसोस ज़रूर है कि उसकी तरफ से हम सब लापरवाह बहुत हैं.
बहरहाल, इतना तय मान लीजिए कि उर्दू कोई मरने वाली चीज़ नहीं है और न कुछ लोगों के भरोसे ज़िन्दा है. उर्दू को मारने से पहले मीर,ग़ालिब और मोमिन को मारना पड़ेगा. सो किसके बस की बात है.
साब, आप जेसे शुभचिंतक मालिक रक्खे सलामत .ग़ज़ल की जुल्फें यूँ ही लहरा कर बल खाती रहें और पैदा होते रहें इस पवन धरती पर किर्शन चंदर और उपेन्द्र अश्क जेसे उर्दू के गेसू सँवारने वाले .अल्लाह रखे उर्दू पे शबाब और ज्यादा .आप सच फरमाते हैं -उर्दू किसी मज़हब की नहीं हिन्दुस्तान की ज़ुबान है. हिन्दुस्तानियों की ज़ुबान है. जब तक यह जज्बा ज़िदा है उर्दू भी जिंदा रहेगी.इक अँधेरी उदासी थी जिसने मुझे रुला दिया था /उजाले का किस्सा सुनाया आपने तो खिल उठा है दिल.
आपका ये लेख बहुत सी जानकारियों से छूता हुआ निकला मसलन,”गुलशन नंदा”लेखन उर्दू में करते थे.सुखद अहसास है ये !(क्यूंकि उर्दू बहुत खुबसूरत भाषा है ,मुझे बेहद पसंद है)!बहरहाल ,एक बात मुझे ये लेख पढ़कर याद आई जो मै आपसे शेयर करना चाहती हूँ!आपने गुलशन नंदा साहब के जिस चमत्कारिक वक़्त और वाकयों का ज़िक्र किया है उस वक़्त हमारे घर में गुलशन नंदा का साहित्य पढना ”अपने प्रेमी से चोरी चोरी मिलने के समतुल्य अपराध माना जाता था (विशेषकर मेरी नानीजी की दृष्टि में)सो ज़ाहिर सी बात थी की जितना ”बैन”उतना ”क्रेज़”,लिहाज़ा बड़े मान मुनौअल और मशक्कत के बाद ”काजल”उपन्यास अपनी दोस्त से इस शर्त पर कि ”कल दोपहर तक वापस कर दिया जायेगा”छिप छिपाकर लाया गया था.ताज्जुब की बात नहीं कि पूरी रात पढ़कर समय से लौटा दिया गया.(याद नहीं पड़ता कि पोस्ट ग्राजुएशन तक इतनी लगन और वक़्त तक कभी कोर्स की पुस्तकें पढी हों.)खैर,”१९९१ के बाद से भावुकता घोषित रूप से मूर्खता है(जानते हैं ये वाक्य पढ़कर हमें पछतावों की उम्र और बढ़ गई सी लगती है .खैर ….लेख पढ़कर अच्छा लगा! निस्संदेह इसमें आपकी प्रवाहपूर्ण भाषा और ;;किस्सागोई”के लाज़वाब अंदाज़ की बराबर की हिस्सेदारी है
वंदना शुक्ल
i have read your articles in bhasker & bombay talkie plaese write articles on satish kaul [prem parbat 1973], shole & chandnichowk by [B.R. chopra], vimmi [humraz] nishi kohli, ravinder kapur, ved rahi, rekha, unmarried & issueless film artistes, movies based on naag nagin, ushakiran and pran. FROM: DEEPAK KUMAR GARG [JOURNLIST] HIRA SINGH NAGAR KOTKAPURA 151204 PUNJAB MOB 09872025607
please write on ved prakash sharma bahu ki awaaz
Execellent article. Any thing on Hameed Vinod(Ibne Safi BA)? I am not able to get Hindi Novels of same Though Urdu versions are avalable on net.There is a web sit also on him.He was an urdu writer and what we have read are transaltions. In urdu it used to be Imaran instead of Col vinod Rest of characters were same
It is time that the genius of Gulshan Nanda be finally recognized by the World.
Gulshan Nanda has been one of the greatest influences on Indians that grew up in the decades of 70s to 80s
I would appreciated if any more information is forthcoming, including pictures of the great one.
Aap ka 5-7 saal purana pathak hun…………..ke do bar e-mail bhi kiya he……….DB-RASRANG ka niyamit/bilanaga pathak (5-6 saal) se hun………Retired abhi abhi hua hun……….kis kis ke tarif kerun…….
Es lekh ka para:
खैर साहब, किस्सा कोत्ताह यह कि नाचीज़ ने भी अपने लड़कपन में गुलशन नंदा की कम से कम दो-एक किताबें तो ज़रूर पढ़ी हैं. इतनी कम इसलिए नहीं कि मुझे उसी उम्र में अछे-बुरे की तमीज़ आ गई और सिर्फ महान लेखकों को ही पढ़ता था बल्कि इसलिए कि मुझे इस नाम से ही खुन्नस थी. उस वक़्त किताबें खरीदकर पढ़ने की हैसियत न थी सो गली-मोहल्ले की छोटी-छोटी लाइब्रेरी से किराये पर लेकर पढ़ते थे. इन लाइब्रेरियों में जिसे देखो गुलशन नंदा की किताब मांगता था. बस इसी बात पर खुन्नस थी. मेरे पसंदीदा लेखक 60 के उस शुरूआती दौर में मुंशी प्रेमचन्द, आचार्य चतुरसेन, गुरुदत्त, कृश्न चंदर, कुश्वाहा कांत, इब्ने सफी बी.ए., वेदप्रकाश काम्बोज वग़ैरह हुआ करते थे. 1967 में हिन्द पाकेट बुक्स की घरेलू लाइब्रेरी योजना और पत्रिका ‘सारिका’ ने इस धारा को पलट दिया. देश-विदेश के महान लेखकों से परिचय हुआ और थोड़ा सा मानसिक विकास भी हुआ. मगर मेरे इस तथाकथित विकास से गुलशन नंदा की सेहत पर ज़रा भी असर न पड़ा. उसकी किताबें पहले से भी ज़्यादा बिक रही थीं. बल्कि इसी वक़्त इन उपन्यासों पर फिल्में भी बनना शुरू हो गई और किताबों की ही तरह हिट भी होने लगी थीं.
Legta he hu be hu meree kaiphiyat ho kishora avstha ki…….itani samanta……….he khuda………Sarika,Dharmyug……..Bachchan ki atmketha Keya Bhulu keya yaad keru..Mohan Rakesh,Dushiyan kumar,Kameleshwer,Mannu Bhandari,Dharmveer Bhartee……..ke samne ye lugdi sahitya he lagta tha…be suwaad……….
Aaap me apne ko khojta hu……..
SADHUWAD
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