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एक था चन्द्रमोहन

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जिसे ज़िंदगी जीने का शऊर था…

राजकुमार केसवानी


कितनी अजीब बात है. जिन लोगों की पर्दे पर जगमगाती ज़िन्दगी देखकर ज़माना उनसे रश्क करता है. उन्हे सजदे करता है. उनमे से अधिकांश सितारों की ज़िन्दगी में न जाने कब और कैसे एक अन्धेरा साया धीरे-धीरे निगल जाता है. हमने-आपने न जाने कितनी ऐसी कहानियां देखी-सुनी हैं.

ऐसी ही एक कहानी की बात आज हम लोग करेंगे. 30 और 40 के दशक के महान अभिनेता चन्द्रमोहन की बात. पर्दे का एक ऐसा सितारा जो अपने अभिनय के दम पर बाकी सितारों के बीच चान्द की तरह अलग से चमकता रहा, लेकिन जब टूटा, तो एक तारे की किस्मत लेकर ही टूटा.

आज की पीढ़ी के लिए चन्द्रमोहन का नाम एकदम से अजनबी नाम है लेकिन फिर भी यह कहानी कहता हूं. वजह यह कि मुझे अपने जवान दोस्तों पर बहुत भरोसा है कि वे एक बार वे इस नाम और इस नाम के साथ जुड़े हुनर से वाकिफ हो गए तो उनकी फिल्मों की सीडी ढूंढ-ढूंढ कर ले आएंगे. उन्हें देखेंगे और मुझे दुआएं देंगे.

चलिए तो शुरू करते हैं. चन्द्र मोहन का जन्म 1904 में मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर में हुआ. यूं तो पित्ता काश्मीरी बृह्मण थे लेकिन उस समय ग्वालियर रियासत की नौकरी में थे सो बचपन का अधिकांश समय उसी इलाके में गुज़रा. पित्ता की मृत्यु के फौरन बाद ही वे घर से निकल पड़े. तरह-तरह की नौकरियां कीं. इन नौकरियों में से एक नौकरी थी एक फिल्म वितरण कम्पनी की नौकरी. इसी नौकरी की बदौलत उनका फिल्मों में प्रवेश हुआ.

हुआ कुछ यूं कि वी.शांताराम जी की एक फिल्म के अनुबन्ध के सिलसिले में चन्द्रमोहन की मुलाक़ात शांताराम जी से हुई. वे चन्द्र मोहन के व्यक्तित्व से इतने प्रभावित हुए कि उन्होने फौरन उन्हें फिल्म में काम करने का आफर दे डाला. कई सारी अनेक फिल्मी कहानियों की तरह यहां भी चन्द्रमोहन ने माफी मांग ली और वापस अपने दफ्तर चले गए.

दो साल बाद वे वापस लौटे. इस बार भी शांताराम जी ने उनका उतनी ही गर्मजोशी से स्वागत किया. इस तरह 1934 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘अमृत मंथन’ में राजगुरू के रूप में पर्दे पर अवतरित हुए. राजगुरू की इस भूमिका का चन्द्रमोहन ने इस तरह निर्वाह किया कि दर्शको और आलचकों के पास सिवाय ‘वाह!’ कहने के कुछ न बचा.

इस एक फिल्म ने ही चन्द्रमोहन को सितारा बना दिया. अगले बरस फिर शांताराम की ही फिल्म रिलीज़ हुई ‘धर्मात्मा’. बाल गंधर्व और रत्न प्रभा की प्रमुख भूमिकाओं के साथ भी चन्द्रमोहन महंत की भूमिका थी.

इसी जोड़ी, शंताराम-चन्द्रमोहन की अगली फिल्म थी ‘अमर ज्योति’ (1936). इस फिल्म में दुर्जय की भूमिका निभाकर चन्द्रमोहन ने अपने अभिनय का लोहा मनवा लिया. इसके बाद तो फिर एक से बड़कर एक निर्माताओं की भीड़ लग गई. बाक्स-आफिस पर चन्द्रमोहन का नाम खरे सिक्के की तरह गूंजने लगा. ख़ासकर 1939 की सोहराब मोदी की फिल्म ‘पुकार’ के बाद तो इस नाम को सफलता की गारंटी माना जाने लगा.

फिल्म ‘पुकार’ में इंसाफ के अलमबरदार बादशाह जहांगीर की भूमिका को जिस तरह निभाया उसकी तुलना सिर्फ ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के शंहशाह अकबर , पृथ्वीराज कपूर से ही की जा सकती है. यह भी एक संयोग की बात ही है कि फिल्म ‘मुग़ल-ए-आज़म’ में अकबर की भूमिका के लिए के.आसिफ ने मूलत चन्द्रमोहन को ही लिया था. सलीम की भूमिका में थे सप्रू और अनारकली थीं नरगिस. यह 1945 की बात है.

इसी दौर में देश के बंटवारे का मामला शुरू हो गया. सब कुछ अनिश्चय की गर्त में जा गिरा. इन्हीं हालात में फिल्म की काफी सारी शूटिंग चलती रही. लेकिन हालात ने गम्भीर मोड़ तब लिया जब 1947 में देश का बंटवारा हो गया. फिल्म के निर्माता हकीम शीराज़ अली ने भारत छोड़ पाकिस्तान में जा बसने का फैसला किया. फिल्म अधूरी ही रह गई.

बाद में जब अपनी धुन के पक्के के.आसिफ ने जब दुबारा 1951-52 फिल्म बनाने का विचार किया तब तक चन्द्रमोहन इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे. सप्रू अपना बाज़ार खो चुके थे. लिहाज़ा चन्द्रमोहन की जगह पृथ्वीराज कपूर और सप्रू की जगह दिलीप कुमार आ गए. दिलीप के साथ आई मधुबाला.

ख़ैर, तो चन्द्रमोहन अकबर न बन सके लेकिन उस दौर का इतिहास गवाह है कि चन्द्रमोहन का ऐश्वर्य से भरा जीवन किसी शहंशाह अकबर से कम न था. पैसे को अपनी मुठियों में भरकर रखने की बजाय हवा में पत्तों की तरह उड़ते हुए देखना ज़्यादा पसन्द था.

ज़रूरतमन्दों की चुपचाप मदद करना बहुत पसंद था. रेस के घोड़े खरीदना, दांव लगाना और बेहतरीन स्काच विस्की के शौकीन थे. अभिनेता मोतीलाल भी इसी तबीयत और यही सारे शौक़ उनके भी थे. सो दोनो बहुत गहरे दोस्त थे. चन्द्रमोहन के तीन और करीबी दोस्त थे – अभिनेता कुमार (मुग़ल-ए-आज़म का संगतराश), उल्हास और राजन हक्सर.

घमंड नहीं स्वाभिमान

चन्द्रमोहन ने सफलता को कभी सर चंढ़ने न दिया मगर लोग उसके स्वाभिमान को कभी-कभी घमंड मान बैठते थे. अछा, आपको याद दिलाऊं, कोई तीन साल पहले हम लोग एक बार की बातचीत उनके इस चरित्र का ज़िक्र कर चुके हैं.

याद दिलाऊं ? किस्सा यूं था कि शांताराम जी ने एक शुरू की तीन फिल्मों के बाद एक बार फिर चन्द्रमोहन को याद किया. वे उसे अपनी अगली फिल्म में लेबा चाहते थे. सामने कांट्रेक्ट रखा गया जिस पर वही मेहंताना लिखा था जो उन्हें एक नए कलाकार के तौर पर दिया गया था.

चन्द्रमोहन ने बड़ी विनम्रता लेकिन दृढ़ता से कहा कि उनकी बाज़ार में फीस बहुत ज़्यादा है सो कुछ सम्मानजनक फीस ज़रूर दें. शांताराम जी भड़क गए. कहा – ‘ठीक है. तुम मत करो. अगर मैं एक चन्द्रमोहन पैदा कर सकता हूं तो दूसरा भी कर सकता हूं’

चन्द्रमोहन के आहत स्वाभिमान ने जवाब दिया. ‘माफ कीजिए, मेरे बाप ने भी ऐसी ही कोशिश की कि दूसरा चन्द्रमोहन पैदा कर लें. नतीजे में बृजमोहन पैदा हो गया.अब आप भी एक कोशिश कर के देख लें’

इसी के साथ यह रिश्ता यहीं ख़त्म हो गया. लेकिन चन्द्रमोहन की सफलता का घोड़ा ज़रूर दौड़ता रहा. फिल्म ‘गीता’ (1940) में शंकर और मोहन की दोहरी भूमिका, फिल्म ‘रोटी’( 42) में मक्कार सेठ लक्ष्मीदास की भूमिका जहां गायिका बेगम अख्तर (तब अख्तरी बाई फैज़ाबादी) उनकी ‘डार्लिंग’ बनी थीं.

इसके बाद ‘तक़दीर’(43), ‘शकुंतला’(43), ‘पन्ना दाई’(45), ‘हुमायूं’(45) वग़ैरह रिलीज़ हुईं.

सफलता ने और कुछ भले न किया हो लेकिन इतना ज़रूर हुआ कि चन्द्रमोहन आंख मूंद फिल्में साईन क लीं थीं. नतीजे में कई बुरी फिल्मों में आकर फ्लाप भी हुए. बाद में निर्माता बदले हुए हालात में पहले जैसा मेहंताना चुकाने को तैयार न थे ऐसे चन्द्रमोहन कम लेने को तैयार न थे. इसी के चलते अगले दो साल कोई नया काम नहीं मिला. पैसा कभी बचाकर नहीं रखा था और शाही अंदाज़ की ज़िन्दगी की आदत थी. सो धीरे-धीरे घर का सामान एक-एक कर बिकने लगा. हालत इतनी बिगड़ी कि स्काच से देसी ठर्रे पर आ पहुंची. लेकिन ठर्रा फिर भी स्काच की बोतल में ही पीते थे. इस पर उनका और मोतीलाल का बड़ा मार्मिक प्रसंग भी है जिसे कई बार दोहराया जा चुका है. मोतीलाल ने चन्द्रमोहन को श्रद्धांजली के बतौर एक फिल्म ‘जुआरी’ बनानी की कोशिश की मगर सफल न हुए.

1945-46 के इस मुश्किल दौर में चन्द्रमोहन के जीवन में एकाकेक बहुत परिवर्तन आए. उस दौर के एक पत्रकार ख़ुर्शीद ढूंढी, जो उनके बहुत अछे मित्र भी थे, चन्द्रमोहन के अंतिम दिनों का दिल हिला देने वाला वर्णन किया है.

चन्द्रमोहन हमेशा से ईश्वर को न मानने वाले नास्तिक इंसन थे, वे अचानक अत्यधिक धार्मिक हो गए. उनके घर में चारों तरफ सभी धर्मों के प्रतीक चिन्ह,फोटो और मूर्तियां लग गई. कभी वे चर्च जाते, कभी मस्जिद तो कभी मन्दिर. नशे की हालत में वे कहते – ‘मैने लक्ष्मी को खोकर काली मां को पाया है’.

आगे वे हेलूसीनेशन (मतिभ्रम) का शिकार हो गए. ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ याद है न. डाक्टर संजय दत्त को इसी बीमारी का शिकार बताता है. चन्द्रमोहन सपनों मॆं काली मां से हुई बातीं बताता. एक बार बयान किया कि ‘कल रात मैने शैतानों का फुटबाल मौच देखा. मैं फुटबाल था. अल्ला मियां रेफरी थे’.

इस सब की शुरूआत उस एक सपने के सच होने से हुई जिसमें उन्होने अपनी एक घोड़ी कांता को रेस में छठे फर्लांग पर गिरते हुए और उसकी टांगे टूटते हुए देखा.अगले दिन पूना की रेस में सचमुच हुआ भी वैसा ही.

आखिर इन सब स्थितियों में एक बहुत सुखद बदलाव आया. चन्द्रमोहन को एक बार फिल्में मिलने लगीं. काम करते समय वे एकदम सामान्य होते जाते थे. इसी दौर में उनकी आख़िरी उलेखनीय फिल्म आई ‘शहीद’ (48). फिल्म में वे दिलीप कुमार के पित्ता राय बहादुर द्वारकादास की अविसमर्णीय भूमिका में थे. अदालत में उनका ज़बरदस्त वक्तव्य फिल्म इतिहास के बेहतरीन कोर्ट रूम दृश्यों में गिना जाता है.

इसी साल फिल्म ‘रामबाण’ और ‘दुखियारी’ भी रिलीज़ हुईं और कोई 3-4 दूसरी फिल्मों की शूटिंग जारी थी. लेकिन 1949 के मार्च के महीने में अचानक से उनकी तबीयत बिगड गई. 15 दिन की बीमारी के बाद जब आखिरी वक़्त आया तो वे जान गए थे. उन्होने अपनी मित्र शीला (चन्द्रमोहन आजीवन कंवारे रहे) जो उस समय भी उनके साथ थी, से कहा कि वो मोतीलाल और कुमार को बुला लें.

कुछ देर बाद काली मां की तस्वीर की ओर देखकर कहा कि – ‘मां बुला रही है’. इसी के साथ उनकी आंखें मुन्द गईं.

घर में एक पैसा न था. अंतिम संस्कार भी फिल्म आर्टिस्ट एसोसियेशन की ओर से ही हुआ.

और…

चन्द्रमोहन ने विजय भट्ट की फिल्म ‘रामबाण’ में रावण का रोल किया था. फिल्म में रावण की मृत्यु के दृश्य को जिस तरह उन्होने अंजाम दिया, विजय भट्ट ने उन पर तारीफों के पुल बान्ध दिए. चन्द्रमोहन का जवाब था – ‘ जो लोग मौत को भी एक शानदार मकाम दे सकते हैं ज़िन्दगी को जीने का शऊर भी उन्हीं को आता है’.

सचमुच. यह जवाब एक ऐसे ही इंसान का हो सकता था जिसकी वजह से खुद ज़िंदगी को अपने आप पर नाज़ हो.

तो ऐसे थे चन्द्रमोहन. इतनी उदास कहानी कहने के बाद मैं कुछ देर ख़ामोश रहना चाहता हूं. तो बस अब सात दिन बाद. जय-जय.

(दैनिक भास्कर के रविवारीय परिशिष्ट ‘रसरंग’ में पूर्व प्रकाशित)

पढ़िए – चन्द्रमोहन -२

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  1. shafkat alam says:

    Rasrag mein bhi CHANDER MOHAN SAHIB ki dardnak kahini padh kar comment ka apko e.mail keya tha.Ab bhi bheegi hain palken aur likhne ko shabd talashne pad rahe hain.Insan ke saath kismat kya kya khel rachti hai aur admi kitna bebas hota hai, asi kahaniyon se mujh jase aam admi ko ibrat milti hai.Safalta jiski sab ko talash hai apni kitne badi kimat mangti hai ki admi ko kafan bhi chande se naseeb hota hai.Galat kon hai Admi Karm ya Kismat pata nahi. Ap ka bahut shukriya udas karte hain to bhi karene se.
    shaffkat

  2. A N gandhe says:

    wonderfull

  3. deepak kumar garg says:

    please write on sohrab modi and his exilent movie bharosa 1940 bharosa is based on wife swapping results why sister and brother love with each other

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