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एक था चन्द्रमोहन -२

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इंसान को कैसा होना चाहिए ?

इंसान जैसा. और कैसा!

मगर इंसान जैसा होना, कैसा होना होता है ? कितनी बार ख़ुद को ज़माने से सुने, किताबों में पढ़े इंसान की शक्ल से मिलाकर देखा, हर बार कोई खोट निकल ही आता है. अब जैसे आप सब न जाने कबसे मुझे अपनी बेपनाह मोहब्बत से भिगोए जाते हैं, मेरी लम्बी उम्र की दुआएं करते हैं और मैं बदले में सिर्फ बातें किए जाता हूं. वह भी इकतरफा बातें. न ठीक से सारे ख़तों का जवाब और न ठीक से इस जगह आप की बात. यह क्या आपस की बात हुई?

सच्ची बात है. कई बार तो आपकी तरफ से इतनी ख़ूबसूरत बातें मुझ तक पहुंचती हैं कि मैं उसे लेकर ख़ुशी से झूमता फिरता हूं. ग़नीमत है कि हमारे इस दौर में अब तक ख़ुशियों को बैंक में जमा नहीं कराना. वरना हम-आप जैसे छोटी-छोटी ख़ुशियों को गले लगाकर नाचने वालों को परत-दर-परत पत्थर ज़मीन की सख़्ती का अहसास ही मार डालता और हमारी ख़ुशियां बैंक के किसी बचत खाते में पड़ी-पड़ी दर्द में बदल चुकी होतीं.

तो चलिए, बहुत हुआ. अब से मैं एक बार फिर बेहतर इंसान बनने की कोशिश करूंगा. कोशिश करूंगा कि हमारी आपस की बात संवाद बन जाए. सो अब से इस जगह कुछ मैं कहूंगा, कुछ आप कहेंगे.

और हां, अब तक आप कई-कई बार यह सवाल पूछ चुके हैं कि मैं यह सारी जानकारी कहां से जुटाता हूं. मैं चुप था. वजह यह कि यह सब बताने के लिए ख़ुद को बहुत खोलना पड़ता है और मैं यह काम अपने एक आत्म-कथात्मक उपन्यास के ज़रिए करना चाहता था. सो अब यह मुश्किल भी कुछ आसान हो गई है. मंज़िल के करीब हूं सो अब ख़ुद को इस जगह खोलना भी मुश्किल नहीं होगा.

चलिए छोड़िए, अब यह ‘मैं’ पुराण बहुत हुआ. अब मैं आपको बताता हूं कि आप कितनी ख़ूबसूरत बात करते हैं. मुझसे कहीं ज़्यादा अछी बात.

आज की शुरूआत करते हैं एक ख़त से जो कल ही मिला है. इस ख़त में कुछ ऐसी बातें हैं जिनके बारे में मैं ख़ुद भी नहीं जानता था. बल्कि यह ख़त इतनी मोहब्बत और ख़ुलूस से लिखा गया है कि मैने तय कर लिया है कि मैं इन कृष्ण कुमार वातल साहब से मिलने ग्वलियर जाऊंगा.

वातल साहब कौन हैं? क्यों उनका लगभग पूरा का पूरा ख़त आपको सुना रहा हूं? यह बात आपको ख़त सुनकर ही समझ आ जाएगी.

प्रिंस चन्द्रमोहन

‘…कल दिनांक 20 जून 2010 के दैनिक भास्कर (रसरंग) में आपका लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा और थोड़े आंसू भी आंखों में आ गये. मेरे व मेरे परिवार की ओर से आपको बहुत-बहुत बधाई कि आपने एक भूले हुए कलाकार को आजकल के सिनेमा प्रेमियों की नज़र में जो लाया. आज फिल्म इंडस्ट्री उन्हें बिल्कुल भूल चुकी है जबकि मेरे ख़्याल से वे मरणोपरांत दादा साहब फालके अवार्ड के हकदार होने चाहिये. उनकी कला कद्र करने वाले व उनकी याद दिलाने वाले फिल्म व पत्रकारिता जगत में अब इक्का-दुक्का लोग ही बचे हैं.

परिचय देना तो नहीं चाहता था पर उससे शायद आप मेरी बात पर ध्यान दें. मैं चन्द्रमोहन के सगे बड़े भाई स्व. मनमोहन नाथ वातल का पुत्र हूं और मेरी उम्र भी 82 वर्ष की है. आपके इस लेख से सम्बन्धित कुछ बातें जोड़ना चाहता हूं.

1)      चन्द्रमोहन बहुत अच्छी मराठी बोलते थे और उन्होने 3-4 मराठी फिल्मों में भी काम किया था. दो मुझे याद हैं – ‘गीते’ व ‘आप्ले घर’. हिन्दी में बनी फिल्मों का नाम था – ‘गीता’ व ‘अपना घर’.

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2)      ‘अपना घर’ में उन्होने बहुत कम बोलकर सिर्फ आंखों (इशारों) से एक दुष्ट पति की भूमिका में यादगार अभिनय किया था, जिसे बहुत सराहा गया. शांता आप्टे पत्नी बनी थीं.

सन 1945 में दिल्ली में मेरी एक बहन से पृथ्वीराज कपूर जी ने कहा था जो अभिनय हम मुंह,गर्दन और हाथ हिलाकर करते हैं वह चन्द्रमोहन सिर्फ आंख से ही कर लेते हैं.

3)      नानी के लाडले होने के कारण चन्द्रमोहन बचपन से ही बिगड़ेल थे और ज़्यादा पढ़ नहीं पाये, पर फिल्मों में पहुंच कर उन्हें शराब व घुड़दौड के अलावा पढ़ने का ज़बरदस्त शौक लगा था. उनके पास उर्दू की हिन्दी में लिखी व अंग्रेज़ी किताबों की अच्छी खासी लायब्रेरी थी. अंग्रेज़ी भी वह फर्राटेदार बोलते थे.

4)      उनके घुड़दौड़ के दोस्तों में मोतीलाल के अलावा महाराजा काश्मीर हरीसिंह और महाराजा ग्वालियर जीवाजीराव सिन्धिया भी थे. अन्य गहरे दोस्तों में कुमार, के.एन.सिंह, कुन्दनलाल सहगल व पृथ्वीराज थे (पृथ्वीराज शराब के साथी नहीं थे).

उल्हास और राजन हक्सर कश्मीरी ज़रूर थे पर उनके ख़ास दोस्तों में नहीं थे. उल्हास (मनमोहन कौल) अजमेर के थे और चन्द्रमोहन ने ही उन्हें प्रभात फिल्म कम्पनी में नौकर कराया था और पहली बार फिल्म ‘वहां’ (Beyond the Horizon) में रोल दिलाया था. वे चन्द्रमोहन को बड़े भाई की तरह आदर देते थे. उनके बुरे वक़्त में भी वे ही उनके घर (16 बिल्खा हाऊस, चर्च गेट) पर हमेशा आते रहते थे. राजन हाक्सर को भी चन्द्रमोहन दोस्त की बजाय अपना जूनियर ही समझते थे.

5)      मैं इंटर का इम्तहान देकर जून 1948 में उनके पास 1 (एक) महीना रहा था.

तब मिसेज़ शीला जेम्स उनकी हाऊस कीपर थीं (वह ईसाई थीं पर उन पर काली मां की सवारी आती थी. चाचाजी आधी रात तक मां का आव्हान हफ्ते में एक बार करते थे.) मोहम्मद उनका कुक व एक पटेल साहब (वे अपने को एक्स फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर बताते थे. ‘गुलाब’ को हीरोइन लेकर कोई फिल्म भी बनाई थी) प्रायवेट सेक्रेटरी थे.

चाचाजी अन्धेरी में प्रकाश स्टूडियो भी हमे ले गये थे और ‘रामबाण’ की शूटिंग दिखाई थी. विजय भाई भट्ट से भी मिलवाया था. सुरैया उन दिनों टाप हीरोइन थीं. कहने पर फोन कर उसे घर भी बुलाया था. वह उन्हे ‘अंकिल’ कहती थी.

6)      चन्द्रमोहन के पिताजी श्री जगन्ननाथ सहाय वातल (मेरे दादाजी) अपने सगे

ममेरे भाई सर तेज बहादुर सप्रू की महाराज माधवराव सिंधिया(प्रथम) से सिफारिश पर 1900 के आसपास इलाहाबाद से ग्वालियर नौकरी में आये थे. उनका विवाह (तब ब्रिटिश सी.पी. एंड बरार का एक जिला) के एक मालगुज़ार पंडित माधोप्रसाद जी मुशरान की बहन से हुआ था. मां की जल्द मृत्यु के कारण चन्द्रमोहन का लालन-पालन ननिहाल (नरसिंहपुर) में बड़े लाड़ से हुआ.

अब यह तो हुई ग्वालियर के वातल साहब की बात. मैं आपको एक किसी और दिन भोपाल के एक वृद्ध आश्रम आनन्द धाम के आर.के.शर्मा जी की बात भी बताऊंगा. ऐसे तमाम सारे गीत जिनके मुखड़े मुझे याद होते हैं उन्हें वो सारे गीत मुखाग्र याद होते हैं. उन फिल्मों के दृश्य याद होते हैं. उनका इसरार होता है सो मैं भी उनके पास जाकर उनके बाकी साथियों के साथ बैठकर उनकी दर्द भरी आवाज़ में उनसे गीत सुनता हूं. बहुत सुखद अनुभूति होती है लेकिन कभी-कभी वे कोई ऐसा गीत गा जाते हैं कि खुद को सम्हालना मुश्किल हो जाता है.

अब जैसे उनका सुरेन्द्र का गाया यह गीत गाना. ‘क्यों याद आ रहे हैं, गुज़रे हुए ज़माने / ये दुख भरे फसाने, रोते हुए तराने’. मैं जानता हूं इस तरह की बातें आम नहीं की जातीं लेकिन दिल से मजबूर हूं. ऐसी जगहों पर, ऐसे हालात में, अपनी ज़बान से कोई कुछ कहता नहीं है लेकिन फिर भी सुनने वाले को सुनाई सब दे जाता है.

चलिए, अब इस बात को बहुत नहीं बड़ाऊंगा. यहां से आगे बड़कर एक और संगीत-सिनेमा प्रेमी इन्दौर के जनाब इमदाद अली महूवाला की बात बताता हूं. यूं तो हर हफ्ते बड़ी मुस्तैदी से अपनी बात करते हैं लेकिन यहां मैं उनके सबसे ताज़ा मेल की बात बताऊं जो उन्होने पिछले हफ्ते हुई अभिनेता कुमार वाली बात को लेकर है.

‘…जब कुमार का आरम्भ से अंत तक ज़िक्र किया तो उनकी अदाकारी के लिहाज़ से एक बेहतरीन फिल्म ‘दायरा’ को क्यो नज़र अंदाज़ कर दिया. जवान, खूबसूरत औरत के बूढ़े बीमार शौहर का किरदार क्या आपको याद नहीं रहा.’

बिल्कुल सही बात. याद करना चाहिये था. नहीं कर पाया. आपने कर लिया. एक ही बात है. आपस की बात है.

अब आपने छेड़ा है तो कुछ छूटा हुआ और कह ही डालूं. कुमार ने अपने दौर की मशहूर अभिनेत्री प्रमिला उर्फ ईस्थर अब्राहम से शादी की थी. प्रमिला हिन्दुस्तान की पहली मिस इंडिया थीं. आगे चलकर उनका तलाक़ हो गया.

कुमार फिल्म निर्माता भी थे. वे सिल्वर फिल्म्स में भागीदार थे. अपने अज़ीज़ दोस्त चन्द्रमोहन के साथ भी भागीदारी में उन्होने इसी बैनर में एक फिल्म ‘झंकार’(1942) बनाई थी. फिल्म में चन्द्रमोहन,प्रमिला और कुमार के साथ कामेडियन गोप भी थे. इस फिल्म के गीत बड़े मज़े के हैं. जैसे आरज़ू लखनवी का लिखा और रहमत और झंडे खान का गाया एक गीत है ‘पड़ोसन का लड़का मोरे मन भाये’. इस फिल्म में कुमार,प्रमिला और गोप के गाए हुए गीत भी हैं. संगीतकार हैं बशीर देहलवी.

और…

और बस यह कि खेल खतम, पैसा हजम. पिछली बार नीयत थी कुछ और हो गया कुछ और. तभी तो कहता हूं कि काहे को ख़्वामखाह बैठकर सोचना कि आज यह कर डालूंगा, कल वो कर डालूंगा. भैये, ये सब तो ‘पिलान’ हैं, ‘पिलान’ का क्या? हुआ-हुआ, नहीं हुआ तो नहीं हुआ. आज नहीं तो कल. है कि नहीं ?

जय-जय.

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  1. shaffkat alam says:

    ये दुख भरे फसाने, रोते हुए तराने’. Sach mein bahut udas karte hain aur sochta hoon top se bottom ki taraf aane mein un kirdaron par kya guzri hogi jinhone (yahan chander mohan sahib)usee bhoga.Watal sahib ka shukreya jinse mile jankari ap ke zariye ham tak pohnchi.
    shaffkat

  2. vijay manohar tiwari says:

    CHANDRAMOHAN PAR BAT KI TO DOOR TAK CHALI GAI….MAZA AA GAYA….YE MUSHRAN FAMILY AJAYNARAYAN MUSHRAN SE TALLUK TO NAHI RAKHTI?

  3. Waah guru! Your article gave me the information which was not available with me. In his autobiography Shantaram has condemned Chandramohan. But the fact was that Shantaram was egoistic and hence he thought that he could produce another Chandramohan. The reply of Chandramohan was a slap on Shantaram. Please let us know more about the forgotton personalities of Bollywood. Regards.

  4. You have unveiled the dark side of Bollywood. I have seen Chandramohan’s only three films, viz Amrit Manthan, Pukar and Shaheed and what you have mentioned in your article is 100% true. His eyes expressed the sense which didn’t need face expression or other activity. His voice was impressive. Only Murad had that kind of voice.

  5. Thanks.

    Chandramohan indeed was a great actor. As regards Murad, I feel he had a good voice and an effective style of dialogue delivery but not really a match to Chandramohan.

  6. Thanks Gupteji. I had no clue about Shantaram condemning Chandramohan in his biography. Why don’t you just send that portion to me, translated either in Hindi or English.

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  1. एक था चन्द्रमोहन | The Bhopal Post - [...] The real ‘Soorma Bhopali’ share ...

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